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शनिवार, 16 नवंबर 2019

आहट हुई थी उजली आस पर




हृदय पर अनहोना आभास सीये, 
यथार्थ के नर्म नाज़ुक तार पर, 
दबे पाँव दौड़ती है दावाग्नि-सी, 
ख़ुशबू-सी उड़ती है विश्वास पर, 
आहट हुई थी उजली आस पर  |

चलती है एहसास की थामे अँगुली,  
अचल अंबर-सा लिये हाथ में हाथ, 
सवार रहती है पलकों के कोरे कोर पर,  
 सुलगती है सुरम्य ताल लिये विरहनी-सी, 
एक पल के जंजाल पर, 
आहट हुई थी उजली आस पर  |

 मर्म की मोहक सौग़ात पर,  
बिखरती है समय की अकुलाहट पर, 
संग एक पल के सुकूँ के साज़ पर, 
अमूर्त मन की मूर्त  सजावट पर     
 चित्त के चैन पर डोलती है 
समय-सी यादों की सरसराहट पर, 
स्वाति नक्षत्र की बूंदों-सा आवरण गढ़े, 
कर्म की बदलती राह पर, 
आहट हुई थी  उजली आस पर  |

धड़कती है धड़कनों की सीढ़ियों पर, 
मन के छज्जे पर रहती है सवार, 
 उम्मीद का झरना लिये साँसों पर, 
कर्म का कोमल कलेवर लिये, 
अपनी ही बिसात पर, 
आहट हुई थी उजली आस पर  |

© अनीता सैनी 

बुधवार, 13 नवंबर 2019

मुद्दतों बाद आज मेरी दहलीज़ मुस्कुरायी



बरसी न बदरिया न मुलाक़ात बहारों से की,  
न तितलियों ने ताज पहनाया न फुहार ख़ुशियों ने की,  
 मिली न सौग़ात सितारों की, 
ढलती शाम में वह कोयल-सी गुनगुनायी,   
 मुद्दतों बाद आज मेरी दहलीज़ मुस्कुरायी | 

 अनझिप पलकों पर सुकूँन उतर आया, 
प्रतीक्षारत थे घर के कोने-कोने,   
  आज वह उजाला आँगन का लौट आया, 
वीरानियों में हलचल सुगबुगायी,  
 ज़िंदगी में एहसासात उभर आये,   
आहटों को तरसती दर्दीली दास्तां,  
 तमन्नाओं की लता पल्लवन-सी इठलायी,     
 मुद्दतों बाद आज मेरी दहलीज़ मुस्कुरायी | 

रुस्वाइयों में सहमी-सी सिमटती रही,  
आज चंचल पवन-सी लहरायी,  
मौन में मुखर हुआ सुरम्य संगीत,  
वह पागल पुरवाई-सी इतरायी,  
 खिली चाँदनी धरा पर पूनम का चाँद उतर आया, 
चौखट पर हसरतों ने चुपके से थाप लगायी,
 मुद्दतों बाद आज मेरी दहलीज़ मुस्कुरायी  | 

 © अनीता सैनी 

सोमवार, 11 नवंबर 2019

मुख पर वो मुस्कान कैसे लाऊं ?



अपने ही दायरे में सिकुड़ रही अभिव्यक्ति, 
पनीली कर सकूँ ऐसा नीर कहाँ से लाऊँ ? 
कविता सृजन की आवाज़ है चिरकाल तक जले,  
कवि हृदय में वो अगन कैसे लजाऊँ ? 

समझा पाऊँ शोषण की परिभाषा,  
ऐसा तर्क कहाँ  से लाऊँ ? 
स्वार्थ के लबादे में लिपटा है इंसान, 
जगा सकूँ इंसानियत को वो परवाज़ कहाँ से लाऊँ ? 

सत्ता-शक्ति का उभरता लालच, 
 राजनीति की नई परिभाषा जनमानस को कैसे समझाऊँ ?  
शक्ति प्रदर्शन कहूँ या देश के भविष्य पर डंडों से करते बर्बर वार,  
 मरघट बनी है दुनिया इसे होश में कैसे लाऊँ ? 

हैवानियत की इंतिहा हो चुकी, 
इंसानियत की  बदलती तस्वीर कैसे दिखाऊँ ? 
मर रहा मर्म मानवीय मूल्यों  का,   
स्वार्थ के  खरपतवार को कैसे जलाऊँ ? 

अंजुरी भर पीने को भटकता है समाज,  
परमार्थ की शरद चांदनी को,  
सिहरती  सिसकती मासूम बालाओं के मुख पर 
  वो नैसर्गिक मुस्कान कैसे लाऊँ ?

©  अनीता सैनी 

शनिवार, 9 नवंबर 2019

मौन में फिर धँसाया था मैंने उन शब्दों को



 कुछ हर्षाते
 लम्हे 
अनायास ही
 मौन में मैंने 
धँसाये  थे  
आँखों  के
 पानी से भिगो
 कठोर किया उन्हें  
साँसों की 
पतली परत में छिपा
 ख़ामोश
 किया था जिन्हें 
फिर भी 
 हार न मानी उन्होंने 
 उसे 
 अतीत की 
दीवार में चिनवा चुप्पी साधी थी 
मैंने  
उन लम्हों में 
बिखर गये थे कुछ शब्द  
कुछ लिपट गये
 भविष्य के पैरों से   
वक़्त की
उजली कच्ची 
 धूप सहते हुए 
 ज़िंदगी
 के गलियारे में 
अपने
 अस्तित्त्व 
की नींव गढ़ते
  राह में मुखर हो 
 समय की 
दहलीज़ पर 
इतिहास के पन्नों में 
बरगद 
की छाँव बन 
भविष्य की अँगुली 
थाम
 जीवन की 
राह में मील के 
पत्थर बन  
पूनम की साँझ में 
मृदुल मौन बनकर वे 
पराजय का
 दुखड़ा भी न रो पाये 
तीक्ष्ण असह वेदना 
से लबालब 
अनुभूति का जीवन 
 जीकर  
पल प्रणय में भी नहीं खो पाये 
तभी उन्हें  
मौन में फिर धँसाया था 
मैंने  |


© अनीता सैनी 

बुधवार, 6 नवंबर 2019

जनाब कह रहे हैं ख़ाकी और काला-कोट पगला गये हैं


जनाब कह रहे हैं 
 ख़ाकी और काला-कोट पगला गये हैं  
और तो और सड़क पर आ गये हैं  
 धाक जमा रहे थे हम इन पर 
सफ़ेद पोशाक  पहन 
पितृ देव का रुतबा दिखा 
भविष्यवाणी कर रहे थे 
शब्दों का प्रभाव क्या होता है 
ख़ाकी और काले-कोट को 
अँगुली पर नचा रहे थे 
नासपीटे धरने पर बैठ गये 
पहले काला-कोट अब यह ख़ाकी  
परिवार सहित सड़क पर जाम लगाये बैठे हैं  
बुद्धि भिनभिना रही है हमारी 
ये  होश  में  कैसे आ रहे हैं ? 
जागरुकता का यह क्या झमेला है ? 
ख़ामोश करो इन सभी को 
कोई नई सुरँग खोदो  
नया उजला चोगा बनवाओ 
नया अवतार गढ़ो 
 एक बार फिर उजाले का 
देवता और मसीहा मुझे कहो 
सफ़ेद पोशाक के पीछे 
मेरी हर करतूत छिपाओ
हुक्म की अगुवाही नहीं हुई 
बौखला गये जनाब
वहम की पट्टी खुलती है और 
मंच पर पर्दा गिरता है
क़दम डगमगाते हैं 
साँसें गर्म हो
 शिथिल पड़ जाती हैं 
जनाब यह 
२०२० की पैदाइश हैं  
एक बच्चा कान में फुसफुसाता है !

©अनीता सैनी 

मंगलवार, 5 नवंबर 2019

दर्द दिल्ली का



ज़िंदगियाँ 
निगल रहा प्रदूषण  
क्यों पवन पर प्रत्यंचा
चढ़ायी है ? 
कभी अंजान था मानव 
इस अंजाम से 
आज वक़्त ने
 फ़रमान सुनाया है 
चिंगारी 
शोला बन धधक रही 
मानव !
किन ख़्यालों में खोया है
वाराणसी 
सिसक-सिसक तड़पती रही 
आज दिल्ली 
 नाज़ुक हालत में पायी है 
 देख !
कलेजा 
 मुँह को भर आया 
क्यों गहरी नींद में स्वयं को सुलाया है 
सल्फ़ाइड का धुँआ खुले आसमान में 
उड़ रहा 
 क्यों मौत को हवा में मिलाया 
चंद सिक्कों का मुहताज बन दर्द का 
दरिया क्यों बहाया है 
इतिहास गवाह है
 सदियों से 
सहती आयी 
 हर दौर का जख़्म सहलाया   
न टपका आँख से पानी न नमी पलकों को  
छू पायी है 
वक़्त का सुनाया फ़रमान 
इसकी हिम्मत में
 न कमी पायी   
आज न जाने क्यों 
बेबस और लाचार नज़र आयी है 
उम्र ढल गयी या 
अपनों ने यह रोग 
थमाया है 
साँसों में घोल रहा क्यों ज़हर 
तड़प रही प्रति पहर है 
आँखों पर क्यों धुंध छाई है |

© अनीता सैनी

शनिवार, 2 नवंबर 2019

शिकवा करूँ न करूँ शिकायत तुमसे



शिकवा करूँ न करूँ तुमसे शिकायत कोई, 
बिखर गया दर्द, दर्द का वह मंज़र लूट गया,  
समय के सीने पर टांगती थी शिकायतों के बटन, 
राह ताकते-ताकते वह बटन टूट गया |

मज़लूम हुई मासूमियत इस दौर की,  
 भटक गयी राह, 
इंसान अच्छे दिनों के दरश को तरस गया,  
सुकूँ सजाता है मुसाफ़िर मंज़िल के मिल जाने पर, 
वह मंज़िल की राह भटक गया |

दीन-सी हालत दयनीय हुई जनमानस की, 
वो अब निर्बोध बन गया, 
उम्मीद के टूटते तारों से पूछता है वक़्त जनाब, 
हिचकियों का मतलब भूल गया |

बहका दिया उन चतुर वासिंदों ने उसे,  
बौखलाकर वनमानुष-सा बदहवास हो हमें भूल गया, 
हालात बद से बदतर हुए, 
बदलाव की परिभाषा परोसते-परोसते, 
लहू हमारा सोखता गया |

परवान चढ़ी न मोहब्बत खेतिहर की , 
जल गयी पराली और बिखर गयी आस्था खलिहान में, 
खिलौना समझ खेलता रहा ज़ालिम, 
डोर अब किसी और के हाथों में थमाता गया |

© अनीता सैनी 

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

क्यों नहीं कहती झूठ है यह



क्यों नहीं कहती झूठ है यह,  
तम को मिटाये वह रोशनी हो तुम,  
 पलक के पानी से जलाये  दीप,  
ललाट पर फैली स्वर्णिम आभा हो तुम,  
संघर्ष से कब घबरायी ? 
मेहनत को लाद कंधे पर, 
 जीवन के हर पड़ाव पर मुस्कुरायी तुम |

बाँध देती हो पलभर में प्रलय-सी, 
मायूसी की पोटली को तुम,  
फिर ढलती शाम संग, 
जी उठती हो, 
 नव प्रभात नव किरण के साथ तुम,  
हौसले को रखती हो साथ, 
मंज़िल की तलबगार हो तुम |

नारी हो तुम, 
 नारी-शक्ति ख़ुद में एक हथियार हो तुम, 
हिम्मत संग डग भरो, 
शौर्य से करो फिर मुलाक़ात तुम, 
इंदिरा गाँधी को याद करो, 
नयन से नहीं नीर बहाओ तुम, 
अबला बन हाथ न जोड़ो, 
सबला बन अधिकारों को अपने पहचानो,   
नारी हो तुम नारी को नहीं लजाओ तुम |

बेटी बोझ नहीं कंधे का, 
जनमानस को यह दिखलाओ  तुम,  
 कर्मठ कर्मों का दीप जला, 
परिस्थितियों को पैनीकर राह जीवन में बना,  
हालात का बेतुका बोझ नहीं दिखलाओ तुम,  
कफ़न का उजला रंग शर्माएगा, 
सूर्य-सी आभा घर-आँगन में,  
धरा के दामन में फैलाओ तुम |

© अनीता सैनी