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गुरुवार, जून 30

तुम्हें पता है?



तुम्हें पता है?

उधमी बादलों का यों

गाहे-बगाहे उधम मचाना 

सूरज को हथेली से ढकना 

ज़िद्दीपन ओढ़े गरजना 

संस्कारहीनता है दर्शाता

चहुँ ओर फैले अंधकार के

स्वर कोंधते हैं कानो में 

वृक्षों का मौन मातम

कोंपलें करता है कलुषित

आँखों से बहता हाहाकार

धड़कनों पर रहता है सवार 

अवचेतन की गोद में क़लम

 स्थूल पड़े शब्दों का ज्वर

आशंकाओ में उलझी बुद्धि 

 घोंसले में दुबके पखेरू 

अँधेरा बुझाता पहेलियाँ 

चेतना टटोलती उजाला 

दीपक हवाओं की क़ैद में हैं!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, जून 26

जीवण जेवड़ी


जीवण जेवड़ी रहट घूमे 

चौमासे री रात गळे।।

नाच नचावै म्रग तिसणा।

ताती माटी पैर तळे।।


राग अलापे पंछी भोळा 

मूक-बधिर पाहुण ठहरा।

झंझावात जंजाळ बुणावै

धी  बूंटा काडे गहरा।

प्रेम आभै रै पगती बुई

आभ निरखे आपे ढळे।।


लौ लपट्या झूलस्य धरती 

लुट्य तरवर रौ सिणगार।

पून सुरमो सारया थिरके 

काग सिळगावै अंगार।

छाँव रूँख री रूँख रै मथै

दो सूरज अक साथ जळे।।


ओढ़ ओढ़णी चाले टेडी

 रंग बुरकावै नुआँ-नुआँ।

दिण दोपहरी सूरज ढळता 

धूणी सिळगे धुआँ-धुआँ।

काळी-पीळी सज सतरंगी

फिरती-घिरती हिया छळे।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्दार्थ

जेवड़ी /रस्सी, रहट/ कुएँ से पानी निकालने का एक ऐसा यंत्र, जिस से रस्सी से पानी निकाल जाता है, ताती/गर्म,तळे/नीचे,लौ लपट्या/ आग की लपटे,सुरमो/ काजल,रूँख/वृक्ष,मथै/ऊपर,अक/एक,बुरकावै/बरसाना,नुआँ-नुआँ/नया-नया, बुई / छोटा मरुस्थली पौधा होता है जो बदल जैसा सफ़ेद दिखता है।

बुधवार, जून 22

नेह बाखळ रौ

 

टळ-टळ टळके पळसा पाणी 

नीम निमोळ्या पान झड्या।।

नैणां नेह बाखळ रौ उमड्य

दुबड़ हिवड़ा जाल गढ्या।।


बादळ मुठ्या जल सागर रौ 

जीवण सुपणा बौ रौ है।

रोहीड़ रा रूड़ा फूलड़ा

मनड़ा उठ्य हिलोरौ है।

कांगारोळ काळजड़ माथै

सुर-ताळ परवाण चड्या।।


 प्रीत च्यानणा जळे पंतगा

दिवलौ पथ रौ काज करे।

रात चाले ओढ्या अंधेरों

 ताख खूद पै नाज करे।

 समय सोता सिणधु स्यूं गहरा  

 जग नीति रौ पाठ पढ्या।।


ओल्यूं घुळै दूर दिसावरा 

 जोग रूळै ताज जड्यो।

चाँद-चाँदणी मांड-मांडणा 

धुरजी देख्य ठौड़ खड्यो।

गाँव गळी बदळा घर झूपां 

 पँख पसार पखेरू उड्या।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्दार्थ 

पळसा/पोळ के भीतर का स्थान, मुख्य द्वार के अंदर का स्थान, निमोळ्या/नीम के फल,बाखळ/घर के सामने खुली जगह या धोरीमोडा के बाहर का स्थान, रूड़ा/रूखा,कांगारोळ/कौवे के ज्यों चिल्लाना, माथै/ऊपर,सिणधु/ सिंधु, च्यानणा/उजाला, घुळै/घुलना या मिश्रित होना, रूळै/मिटी में मिलना, धुरजी/धुर्व तारा, ठौड/एक ही स्थान पर खड़े रहना 

राजस्थानी शब्द एवं उनके अर्थ मैं अपनी स्मृति के आधार पर लिखती हूँ।

बाखळ घर के सामने खुली जगह को कहते हैं। आज-कल न बाखळ रहे न वह बचपन, उमड़ आया हृदय में वह घर, आँगन उम्मीद है आप भाव और भाषा को अवश्य समझेंगे।

जब कोई लिखता है तब वह उस कविता का बहुत ही वृहद रूप जीता है।  एक-एक भाव को शब्दों में गढ़ता है। उसे अनुवाद में कैसे समेटे? मुझे कुछ समय दे मैं प्रयास करुँगी।

सारांश... 'बाखळ जीवन और प्रेम का प्रतीक है' 'बाखळ' घर के बाहर का स्थान है जहाँ बच्चे खेला करते हैं घर के बुजुर्ग बैठे रहते हैं। घर आँगन की स्मृतियों में खोई नायिका के भाव ऐसे हैं जैसे बारिश के समय पळसे से पानी टपकता है यादें हृदय में दूब के ज्यों  जाळ गढ़ रही है। सब कुछ छूटने के बाद नायिका अपने जीवण की कल्पना करती है कि  उसके जीवन ऐसे है जैसे बादल अपनी अंजूरी में पानी लिए खड़ा है और वह स्वप्न बौ रही। रोहिड़े के रूखे फूलों के जैसे स्मृतियाँ हृदय में हिलोरे-सी उठ रही है ये घटनाएँ ऐसे है जैसे कागा, कागारोळ मचा रहा है सुर ताल सातवें आसमान को छू रहें हो।

इसके बाद नायिका कहती है दीपक तो अपने काम में व्यस्त है वह तो पथ पर उजाला कर रहा है प्रीत में  पतंगा अपना जीवन स्वतः गवा रहा है

स्वयं पर व्यंग्य साधती नायिका कहती है रात अंधेरा ओढ़े चलती है परंतु वहीं एक ताख स्वयं पर कितन नाज़ करता है कि मेरे पास उजाला है। वैसे ही वह कहती है जग पग पग पर नीति का पाठ पढ़ाता है परंतु किसने देखा समय का सोता कितना गहरा है अगले ही पल उसकी कोख़ में क्या छिपा है।

यह सभी स्मृतियाँ दूर बैठी नायका के हृदय में घुल रही हैं वह स्वयं के भाग पर हँसती है। रात के इस पहर में वह देखती है चाँद चांदनी कल्पनाओं के सुंदर फूल गुंथ रहें है और धुर्व तारा यह दृश्य चुप चाप खड़ा देख रहा है। वह कहती है समय के साथ सब बदल जाता है गाँव गळी घर…बाखळ में खेलते पंछी को तो एक दिन उड़ना ही होता है वह बाखळ में कितने दिन रुकेगा।


शुक्रवार, जून 17

नेम प्लेट



मुख्य द्वार पर लगी

नेम प्लेट पर उसका नाम है 

परंतु वह उस घर में नहीं रहता

 माँ-बाप,पत्नी; बच्चे रहते हैं 

हाँ! रिश्तेदार भी आते-जाते हैं 

 कभी-कभार आता है वह भी 

नेम प्लेट पर लिखा नाम देखता है 

नाम उसे देखता है 

 दोनों एक-दूसरे को घूरते हैं 

कुछ समय पश्चात वह 

मन की आँखों से नाम स्पर्श करता है 

तब माँ कहती-

”तुम्हारा ही घर है, मैं तो बस रखवाली करती हूँ। "

पत्नी देखकर नज़रें चुरा लेती है 

और कहती है -

”एक नाम ही तो है जो आते-जाते टोकता है।”

वह स्वयं को विश्वास दिलाता है 

हाँ!  घर मेरा ही है

बैग में भरा सामान जगह खोजता है 

साथ ही फैलने के लिए आत्मविश्वास

ज्यों ही परायेपन की महक मिटती है 

फिर निकल पड़ता है उसी राह पर

सिमट जाना है सामान को उसी बैग में 

कोने, कोनों में सिमट जाते हैं 

 दीवारें खड़ी रहती हैं मौन  

 चप्पलें भी  करती हैं प्रश्न 

 नेम प्लेट पूछती है कौन ?

पहचानता क्यों नहीं कोई ?

डाकिया न दूधवाला और न ही अख़बारवाला 

कहते हैं - "सर मैम को बुला दीजिए।"

स्वयं को दिलाशा देता 

"हाँ! मेरा नाम चलता है न। "

सभी नाम से पहचानते हैं मुझे 

स्वयं पर व्यंग्य साधता

 हल्की मुस्कान के साथ 

 कहता-”घर तो मेरा ही है!

 हाँ! मेरा ही है! परंतु मैं हूँ कहाँ ?"


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, जून 12

धरती धोरा री



वीर भूमि धरती धोरा री

 सोन्य बरगो भळके रूप।

भाळ रै पैर घुँघरू बंध्या 

पाणी प्यासा कुआँ कूप।।


शूरवीर बेटा अण जाया

बेटियाँ जाई  प्रतिमाण।

देव लोक ईं गाथा गावै

मरु सो दूजो न बलवाण।

धीर-गंभीर  पाठ पढ़ावै

प्रीत छाया अणद अरूप।।


दादू-कबीर सबद सुणाया 

 वीराणे सूं उपजे बोल।

 मीरां प्रीत सुणावै भाटा

लगन कान्हा री अनमोल।

मरू धरा रौ कण-कण गावै

जीवण माटी रौ स्तूप।।


कुल-कुणबा काणयाँ सुणावै

रूँख जड्या है अभिमाण।

रेत समंदर साहस सीपी

हिया सोवै है सम्माण।

मोती मिणियाँ चमक चाँदणी 

सतरंगी-सी बरस धूप।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्दार्थ 

बरगो-जैसा 

भाळ-हवा 

अणद अरूप-अत्यंत सुंदर, आनंद से भरा या आनंदित

 वीराणे-वीराना 

भाटा-पत्थर 

कुणबा -कुटुंब, बाल-बच्चे, परिवार।

काणयाँ-कहानियाँ 

रूँख-पेड़ 

सतरंगी-सात रंग 


गुरुवार, जून 9

आख्यां



आख्यां हैं ऊणमादी ढोला 

ढ़ोळै  खारो पाणी।

मुंडो मोड़ै टेढ़ी चाल्ये 

खळके तीखी वाणी।।


काळै कोसां आया बादळ 

भाळा छेकड़ा छिपे।

रूंख उकसे पगडंडिया जद

गळयां बीजड़ा बिछे।

कै जाणे बरसती छाट्या

आखर हिवड़ा साणी।।


कुआँ पाळ मरवा री ओटा 

घट गढ़ती घड़ी-घड़ी।

बात सगळी जाणे जीवड़ो 

 अज सूखै खड़ी-खड़ी।

पीर पिछाणे टेम चाल री

ओल्यूं घाल्ये घाणी।।


बेगा-बेगा घर आइज्यो 

काळज रा पान झड़ै।

ओज्यूँ बिखरी धूप आँगणा 

लू दुपहरी रै गड़ै।

पून पूछे पुन्याई बैरण

 गीणावै जग जाणी।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्दार्थ

उणमादी- मानसिक संभ्रांति, नटखट 

ढ़ोळै- ढुलना,गिराना 

खळके- घूमना 

काळै कोसां-बहुत दूर से 

भाळ -पून, हवा 

छेकड़ा-सुराख़

घट - घड़ा 

रूंख- पेड़ 

उकसे- बढ़ना

गळया- भीग हुआ 

छाट्या-छांट 

पाळ-जगत,कुएँ के ऊपर चारों तरफ़ बना हुआ चबूतरा

सगळी-सभी

मरवा -कुएँ के बुर्ज

सूखै-सूखे 

पिछाणे-पहचानना 

ओल्यूं-याद 

घाल्ये- करना 

घाणी-बार-बार घूमना 

बेगा-बेगा-जल्दी -जल्दी 

आइज्यो -आना 

काळज रा -कलेजा 

पान-पत्ता 

ओज्यूँ-फिर, दुबारा 

पूछे- हालचाल पूछना 

पुन्याई- पुण्य 

गीणावै-गिनवाना