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रविवार, जून 12

धरती धोरा री



वीर भूमि धरती धोरा री

 सोन्य बरगो भळके रूप।

भाळ रै पैर घुँघरू बंध्या 

पाणी प्यासा कुआँ कूप।।


शूरवीर बेटा अण जाया

बेटियाँ जाई  प्रतिमाण।

देव लोक ईं गाथा गावै

मरु सो दूजो न बलवाण।

धीर-गंभीर  पाठ पढ़ावै

प्रीत छाया अणद अरूप।।


दादू-कबीर सबद सुणाया 

 वीराणे सूं उपजे बोल।

 मीरां प्रीत सुणावै भाटा

लगन कान्हा री अनमोल।

मरू धरा रौ कण-कण गावै

जीवण माटी रौ स्तूप।।


कुल-कुणबा काणयाँ सुणावै

रूँख जड्या है अभिमाण।

रेत समंदर साहस सीपी

हिया सोवै है सम्माण।

मोती मिणियाँ चमक चाँदणी 

सतरंगी-सी बरस धूप।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्दार्थ 

बरगो-जैसा 

भाळ-हवा 

अणद अरूप-अत्यंत सुंदर, आनंद से भरा या आनंदित

 वीराणे-वीराना 

भाटा-पत्थर 

कुणबा -कुटुंब, बाल-बच्चे, परिवार।

काणयाँ-कहानियाँ 

रूँख-पेड़ 

सतरंगी-सात रंग 


18 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामी12/6/22, 9:57 am

    आपरा नवगीत सरावणजोग हैं। राजस्थानी साहित्य रै मांय नवगीतां री अबार दरकार ईं हैं। आप लगोलग लिख रैया हो ,आ चोखी बात। इण गीत रा भाव अर सबद इणरै चावै हुवण री साख भरै, म्हारी शुभकामनावां सा।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपरी प्रतिक्रिया नवगीत रौ सम्माण, शुभकामनाएँ बादळ री छाया। हिम्मत बधाण खातर घणों घणों आभार 🙏
      सादर

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  2. आ धरती गोरा धोरां री, आ धरती मीठा मोरां री।
    इण धरती रो म्हाने अभिमान हो, इण पे वारां प्राण हो।
    मरूधरा की माटी में जन्मने पर हमें अभिमान है अनीता जी। आप स्तुत्य कार्य कर रही हैं। ऊपर शुद्ध राजस्थानी भाषा में जो टिप्पणी की गई है,वह समीचीन है। उन टिप्पणीकार के साथ-साथ आपको मेरी भी हार्दिक शुभकामनाएं।

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    1. सादर नमस्कार सर।
      सारगर्भित प्रतिक्रिया हेतु हृदय से आभार।
      राजस्थानी में लिखे मेरे नवगीतों पर आपकी प्रतिक्रिया हृदय को ऊर्जावान बनता है।
      सादर

      हटाएं
  3. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (15-06-2022) को चर्चा मंच     "तोल-तोलकर बोल"  (चर्चा अंक-4462)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'    
    --

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    उत्तर
    1. हार्दिक आभार आदरणीय शास्त्री जी सर मंच पर स्थान देने हेतु।
      सादर

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  4. बचपन में स्कूल में आदरणीय कन्हैया लाल सेठियाजी की ..आ धरती गौराँ धौराँ री ..बहुत गाया करते थे .....
    आपकी रचना पढकर बरबस स्मरण हो आया ..।
    प्रिय अनीता ,आपकी कलम बस यूँ ही खूबसूरत सृजन करती रहे यही शुभेच्छा है । हमारे पुण्य धरा , हमारा गौरव ।

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    उत्तर
    1. प्रिय शुभा दी, स्नेह में पगी आपकी प्रतिक्रिया अनमोल है आप आए उत्साह द्विगुणित हुआ।
      सादर स्नेह

      हटाएं
  5. दादू-कबीर सबद सुनाया
    वीराणे सूं उपजे बोल।
    मीरां प्रीत सुणावै भाटा
    लगन कान्हा री अनमोल।
    वाह ! बहुत ख़ूब !
    धरती धोरां री की खूबियों को बड़ी ख़ूबसूरती से दर्शन करवाती सुन्दर कृति ।

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    उत्तर
    1. हृदय से आभार आदरणीय मीना जी दी मरू प्रदेश का चित्रण आपको भाया, एक छोटा सा प्रयास मरू की खूबी समेटने का।
      सादर स्नेह

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  6. वाह वाह!सुंदर अभिव्यक्ति

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  7. जितने सुन्दर शब्द, उनसे भी सुन्दर भावना और अभिव्यक्ति

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    उत्तर
    1. हृदय से आभार आदरणीय सर सृजन सार्थक हुआ।
      सादर

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  8. अनीता, अपनी माटी से तुम्हारा प्यार और अपनी संस्कृति पर, अपने इतिहास पर, तुम्हारा अभिमान प्रशंसनीय है.
    मेरी सलाह है कि इस रंग-रंगीलो राजस्थान की कमियां भी तुम अपने गीतों में उजागर करो. बाल-विवाह, स्त्रियों की दयनीय दशा और जातिवाद की विषाक्त परंपरा पर कभी प्रहार भी किया करो.

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    उत्तर
    1. आदरणीय गोपेश जी सर आपका आशीर्वाद सुकून से हृदय भर देता है। सराहना शीतल झोंके सी होती है। आपने सही कहा सर विषाक्त परम्परा न जाने कितने ही जीवन लील रही न मैं इससे अछूती रही, परंतु जब गहरे में डूबती हूँ तब लगता है किसे फटकार लगाऊं, उस समाज को जिसने धारण कर रखा है या उस समूह को जो इन्हें छोड़ना नहीं चाहता या उस मानसिकता को सभी कितने उलझे है और शिक्षा लेश मात्र, मैं कोशिश करुँगी अपने उठते भावों के साथ न्याय करूँ किसी पर दोषारोपण न हो ...परंतु आपने बहुत सराहनीय विचार मेरे हाथों में दिया।
      अनेकानेक आभार मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु।
      सादर प्रणाम

      हटाएं
  9. राजस्थानी भाषा मे बहुत ही सुंदर गीत।

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