सोमवार, 26 अक्तूबर 2020

परिवर्तन सब निगल चुका था


हमने शब्दों का व्यापार करना चाहा 
परंतु वे शब्द भी खोखले प्रभावरहित थे 
हमारा व्यवहार संवेदनारहित 
भाव दिशा भूल ज़माने से भटक चुके थे 
शुष्क हृदय पर दरारें पड़ चुकी थी 
अब रिश्ते रिश्ते नहीं पहचान दर्शाने हेतु 
मात्र एक प्रतीक बन चुके थे 
जीवन ज़रुरतों का दास बन चुका था 
घायल सांसों से आँखें चुराता इंसान 
इंसानीयत का ओहदा छोड़ चुका था 
अबोध बालकों की घूरतीं आँखें 
बालकनी से झाँकते कोरे जीवंत चित्र थे 
माँ की ममता पिता का दुलार 
अपनेपन का सुगढ़  एहसास  
सप्ताह में एक बार मिलने वाली 
मिठाई बन चुका था 
मास्क में मुँह छिपाना 
हाथों पर एल्कोहल मलना 
परिवर्तन पहनना अनिवार्य बन चुका था 
अकेलापन शालीनता की उपाधि
मानवीय मूल्य मात्र बखान 
फ़्रेम में ढलती कहानी बन चुके थे 
देखते ही देखते बदलाव सब निगल चुका था।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 25 अक्तूबर 2020

अभिलाषा



मन दीये में नेह रुप भरुँ  
बैठ स्मृतियों की मुँडेर पर।
समर्पण बाती बन बल भरुँ 
समय सरित की लहर पर।
प्रज्वलित ज्योति सांसों की 
बन प्रिय पथ पर पल-पल जलूँ।

भाव तल में तरल तरंग 
मृदुल अनुभूतियाँ बन छाया ऊठूँ ।
किसलय-दल मैं सजल भोर बनूँ 
पथिक पथ तपन मिटे दूर्वा रुप ढलूँ।
शाँत पवन मिट्टी की महक बनूँ 
 नयनन स्वप्न प्रिय प्रीत बन जलूँ ।

सूनेपन में  मुखर आभा 
उदास मन में उम्मीद बन निखरुँ।
आरोह-अवरोह सब मैं सहूँ 
जीवन-लय में लघु कण बन बहूँ ।
हताश मन में साथी संबल बनूँ 
प्रिय मन दीप्ति हृदय आँगन जलूँ ।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, 19 अक्तूबर 2020

अनभिज्ञता है पूर्णता


तुम्हें ये जो पूर्णता का बोध
 हर्षाए जा रहा है 
ये अनभिज्ञता है तुम्हारी 
थकान नीरसता छिछलापन है 
तुम्हारे मन-मस्तिष्क का 
उत्सुकता उत्साह पर 
अनचाहा विराम चिन्ह है 
अपूर्णता अज्ञानता मिथ्या है जो 
 झाँकतीं है समझ की दीवार के 
 उस पार नासमझ बन 
समर्पण को हाँकता अधूरापन 
 तुम्हारे  विनाश का है  प्रारब्ध।
पूर्णता के नशे में 
तुमने ये जो ज़िंदा पेड़ काटे हैं 
जूनून दौड़ेगा इनकी नसों में 
जड़े  ज़िंदगी गढ़ेगी दोबारा  
 इन पेड़ों की टहनियों को 
ज़िद पर झुकाईं हैं तुमने ये टूटेगी नहीं 
लहराएगी नील गगन में स्वछंद ।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 18 अक्तूबर 2020

जब भी मिलती हूँ मैं



जब भी मिलती हूँ मैं 
शब्दों से परे एक-एक की ख़ामोशी 
आँखों के झिलमिलाते पानी में पढ़ती हूँ।

कोरी क़िताब के सफ़ेद पन्ने 
पन्नों में हृदय के कोमल भाव 
भावों के बिखरे मोती शब्दों से चुनती हूँ।

सूरज की रोशनी चाँद की आभा 
कृत्रिमता से सुदूर प्रकृति की छाँव  में 
निश्छल बालकों का साहस पढ़ती हूँ।

गर्व में डूबा मन इन्हें सेल्यूट करता 
पैरों में चुभते शूल एहसास सुमन-सा देते 
आत्ममुग्धता नहीं जीवन में त्याग पढ़ती हूँ ।

परिवर्तन के पड़ाव पर जूझती सांसें 
सेवा में समर्पित सैनिक बन सँवरतीं हैं  
समाज के अनुकूल स्वयं को डालना पढ़ती हूँ।

समय सरहद सफ़र में व्यतीत करती आँखें 
आराम  आशियाने  में  ढूँढ़तीं  
गैरों से नहीं अपनों से सम्मान की इच्छा पढ़ती हूँ।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2020

क्षितिज पार दूर देखती साँझ


 
फिर पथ पीड़ा क्यों हाँक रहा?
ले गोद चला भाव सुकुमार
एक-एक रोटी को पेट पीटता  
करुण कथा में सिमटा संसार।

मौन करुणा कहे बरसे बरखा 
शीतलता को धरणी तरसती।
मनुज सरलता डायन बन लौटी 
चपला बुद्धि काया को छलती।

ठठेरा बन बैठा है यहाँ कौन ?
गढ़ता शोषण साम्राज्य मौन।
मिटाना था अँधेरा आँगन का   
विपुल वेदना अधिकारी कौन?

हृदय मधु भरा मानस मन में 
ज्यों पराग सुमन पर ठहरा।
ज्ञात है बदली में अंजन वास 
 निधियाँ का चितवन पर पहरा।

उन्मादी मन उलझा उत्पात में 
क्षितिज पार दूर  देखती साँझ। 
निर्निमेष पलक हैं भावशून्य 
अंतस में रह-रह उभरे झाँझ।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2020

मैं और मेरा मन


मैं और मेरा मन 
सभ्यता के ऐंद्रजालिक अरण्य में 
भटके नहीं विचरण पर थे 
दृश्य कुछ जाने-पहचाने  
सिमटी-सी भोर लीलाएँ लीन 
बुझते तारे  प्रभात आगमन 
मैं मौन मन लताओं में उलझा 
अस्तित्व ढूँढ़ता सुगबुगाया 
निश्छल प्रकृति का है कौन ?
देख वाक़या धरणी पर 
शंकित आहान बिखरे शब्द 
वृक्ष टहनियों में  स्वाभिमान  
पशु-पक्षी हाथ स्नेह के थाल  
सुंदर सुमन क्रीड़ा में मग्न 
प्रकृति कर्म स्वयं पर अडिग  
सूरज-चाँद पाबंद समय के
शीतल नीर सहज सब सहता 
पर्वत चुप्पी ओढ़े मौन वह रहता 
अचरज आँखों में उपजा मन के 
निकला लताओं के घेरे से 
मानव नाम का प्राणी देखा !
सींग शीश पर उसके चार 
काया कुपित काजल के हाथ 
नींद टाँग अलगनी पर बैठा 
आँखों में आसुरी शक्ति का सार  
वैचारिक द्वंद्व दिमाग़ पर हावी 
 भोग-विलास में लिप्त इच्छाएँ अतृप्त 
काज फिरे कर्म कोसता आज 
धड़कन दौड़ने को आतुर 
नब्ज़ ठहरी सुनती न उसकी बात 
हाय ! मानव की यह कैसी ज़ात 
मन सुबक-सुबककर रोया 
आँख का पानी आँख में सोया।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, 12 अक्तूबर 2020

इंद्रजाल


ऐन्द्रजालिक की भाँति छाया रहता है
घर के कोने-कोने में माया का ओढ़े गुमान।
माया महकती है सदृश्य हर पहर  
हरशृंगार के पावन पुष्प के समान
  
बाँधता नाज़ुक श्वेत धागा अंतस पर 
व्यवहार का हल्की गठान के साथ
मौन साधे आँखों से कुछ कहता 
अहसास संग जोड़ता परिवार का हाथ

नीरवता में भाव बिखेरता हँसता जैसे 
 लहरों को छिपाता आग़ोश में समंदर
भावभीनी चुप्पी में सतरंगी स्वप्न बीनता 
पैरों की जलन बिसराता तपती रेत पर।

कैसे गढ़ता है ज़िंदगी की हवा में जादू 
निश्छल निरीह जीवन पर ऋतुएँ हर्षाईं। 
यादों की एक गठरी उठाए कंधों पर 
चल पड़ा जाने-पहचाने पथ पर हरजाई

दृढ़ शक्ति अथाह विश्वास के बोता बीज 
मन में नेह अँकुरित करता जैसे छलिया
अनंत परिभाषाओं से गढ़ूँ नाम उसका 
 शीतल हवा-सा खिला देता मन कलियाँ

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2020

आदरणीया कुसुम दीदी द्वारा लिखी मेरी पुस्तक 'एहसास के गुँचे' की समीक्षा

आदरणीया कुसुम दीदी का अपार स्नेह मुझे प्राप्त है। मेरे प्रथम काव्य-संग्रह 'एहसास के गुंचे' की आदरणीया कुसुम दीदी ने अपनी चिर-परिचित शैली में समीक्षा लिखी है।आदरणीया दीदी किसी भी रचना का मर्म स्पष्ट करने और भाव विस्तार करने में सिद्धहस्त हैं। आपका स्नेह और आशीर्वाद पाकर मैंने ब्लॉग जगत के साथ साहित्य के क्षेत्र में अपना सफ़र तय करने का निश्चय किया है। साहित्य क्षेत्र में क़दम-क़दम पर वरिष्ठ जनों के मार्गदर्शन एवं सहयोग की ज़रूरत पड़ती है।आदरणीया दीदी सदैव रचनाकारों को प्रोत्साहित करतीं नज़र आतीं हैं।
लीजिए पढ़िए आदरणीया कुसुम दीदी द्वारा लिखी मेरी पुस्तक 'एहसास के गुंचे' की समीक्षा-

अनीता सैनी "दीप्ति" जी का 'एहसास के  गूँचे' मेरे हाथ में है ।
ये उनका पहला काव्य संग्रह है,
वैसे  ब्लाग जगत का ये दैदीप्यमान तारा फेसबुक और काव्य प्रेमियों के लिए अंजान नहीं है ,उनकी सतत और सशक्त लेखनी निर्बाध गति से साहित्य पथ पर अग्रसर है।
पूर्ण समीक्षा कर सकूं ऐसा अभी तक स्वयं में सामर्थ्य नहीं पाती पर पुस्तक पढ़ कर कुछ उदगार
जो सहज ही मेरे मानस पर आते वो व्यक्त कर रही हूं।

'एहसास के  गूँचे' क्या है मेरी नज़र में----
भावों की अवरुद्ध यवनिका को हटा कर, कुछ असंगत वर्जनाओं को तोड़ कर,  जीवन की अनेकों संवेदनाओं से ओतप्रोत रंग  सहज गति से शब्दों के रूप में श्वेत पन्नों की विथिका में विचरण कर रहें हैं ।
प्रेम ,आस्था, विश्वास,समर्पण
सामायिक, सामाजिक,चिंतन समस्याएं,कुंठा ,विश्वानुभूति सभी विषय समाहित है इसमें।
जगह जगह साबित करती है इनकी रचनाएं कि कवियत्री संवेदनशील,कोमल हृदय,सामाजिक और मानवीय मूल्यों के प्रति अगाढ़ आस्था के भाव रखती है जो उनकी कविताओं में स्वत: ही उभर कर पाठक को गहरा जोड़ लेती है । 

विषय में गहरे तक डूबने की क्षमता साथ ही हर दर्द को महसूस कर उस से जूड़ जाना,
कुछ रचनाओं में उनके व्यक्तित्व का ये गुण स्पष्ट सामने आ रहा है।
कुछ जगह भाव गूढ़ और रहस्यात्मक हो जाते हैं जो आम पाठक को कुछ विचलित करते होंगें, पर रचनाओं के नजदीक जाकर ये महसूस होता है कि यह उनका अपना स्वाभाविक अंदाज है।
मुझे पुरा संकलन पठनीय लगा तो किसी भी अलग अलग रचना पर अपने भाव नहीं रखकर पुरी पुस्तक पर सामूहिक भाव रख रही हूं ।
भाषा सहज मिश्रित, बोलचाल में व्यवहार होते फारसी, उर्दू शब्दों का हिंदी के साथ तालमेल करता सुंदर प्रयोग।
अनीता जी को उनके पहले एकल  काव्य संग्रह के लिए अनंत शुभकामनाएं और बधाई,वे सदैव अपनी काव्य यात्रा में नये आयाम स्थापित करें ।
उनका अगला काव्य संग्रह और भी परिमार्जित होकर शीघ्र ही काव्य प्रेमियों के हाथ में आये।
शुभकामनाओं सहित ।

कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'।

भद्रता


भद्रता ! 
तुम भद्रता नहीं रही हो !
बदल गई हो !
अपनी-सी नहीं रही हो आज!
भटक गई पथ के प्रवाह से या 
ऊँटों के कारवाँ  से कुचली गई हो 
तेज़ धूप में जली 
अनमने स्वरुप में ढल गई  हो आज 
भावों से 
आचरण में उतर प्रभाव को ढोती 
रेत में धँसा
 मात्र एक शब्द बन गई हो आज 
स्वयंसिद्धता दर्शाती 
विचारों में उलझी 
द्वंद्व में पीसी सापेक्ष पीड़ा हो!
मानवीय मूल्यों की 
टूटी कड़ी बन गई हो आज 
भावों का अभाव  
निरंकुशता का दाव 
मानव जीवन गर्हित 
मूर्छित पड़ा राह में 
पैरों से पीसती 
 मौन साधे क्यों बैठी हो आज ?
फूल पत्ते 
नव किसलय में कोरा कंपन 
शुष्क संवेदना 
कृत्य करुणा में क्रंदन 
जीवन आचरण से
 भटक तुम भर्मित हो !
अतृप्त चित्त 
रुष्ट आस्था में रुदन क्यों ? 
परिवर्तन दिशाविहीन खंडित हो !
आख्यान मात्र एक शब्द क्यों?
नहीं रही मानव मन में 
कहाँ है तुम्हारा आधार जीवंत ?
ममता मनः स्थिति 
भाव बन  बिसराई नहीं लाज 
व्यर्थ सुमन कुमोद को संचित जग 
भद्रता !
तुम भद्रता नहीं रही भटक गई हो आज !

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2020

मनोज्ञ रश्मियाँ


मनोज्ञ रश्मियाँ 
समेटने लगी हैं स्वयं को 
भू पर बिखरे 
अतिशयोक्तिपूर्ण आभामंडल से 
विरक्त हो 
ज़िंदगी की दरारें 
वक़्त बे वक़्त चाहती हैं भरना  
जीवन की ऊहापोह से थक 
आज ख़ामोश हैं  
संकुचाई-सी मुरझाई-सी 
दायित्वबोध का करती भान 
कहती हम पाहुन हैं  
  निशा की गोद में सिमटी-सी 
सांसों में  ढूँढ़ती हैं सुकून 
यायावर रुप में ढला जीवन  
क़दमों का चाहती हैं ठहराव
अनमने मन से  हैं  उदास  
सुबह से शाम तक स्वयं में उलझी
यामिनी से मिलने पर भी  
समेटे शब्दों को मौन में 
चिंताग्रस्त स्वयं से क्रुद्ध 
समय पैंतरों से अनजान 
दुखांत हृदय को थामे पलकों से 
पूछती कौन हैं हम ?

@अनीता सैनी  'दीप्ति'

सोमवार, 5 अक्तूबर 2020

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी द्वारा लिखी गई मेरी पुस्तक 'एहसास के गुंचे' की समीक्षा

आजकल मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं है क्योंकि मेरे प्रथम काव्य-संग्रह 'एहसास के गुंचे' की लगातार दो समीक्षाएँ प्रकाशित हुईं हैं।पहली समीक्षा जाने-माने साहित्यकार डॉ. दिलबाग सिंह विर्क जी ने लिखी जो अपने आप में विशिष्ट समीक्षा है। दूसरी समीक्षा वरिष्ठ साहित्यकार एवं अनेक पुस्तकों के लेखक डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी ने लिखी जो समीक्षा लेखन का एक ख़ूबसूरत उदाहरण है। आदरणीय शास्त्री जी एवं आदरणीय दिलबाग सर का बहुत-बहुत आभार मेरे ऊपर साहित्यिक आशीर्वाद की बारिश करने के लिए। मुझे आशा है आपका सहयोग एवं स्नेह मुझे निरंतर मिलता रहेगा।

समीक्षा किसी रचनाकार के लिए आत्ममंथन के साथ प्रोत्साहन एवं आत्मावलोकन का आधार बनती है। भावी लेखन के लिए अनेक प्रकार के सबक़ समीक्षा में निहित होते हैं। निस्संदेह पुस्तक की समीक्षा पाठक को पुस्तक के प्रति उत्सुक बनाती है। साहित्यिक समीक्षाएँ अनेक मानदंडों के मद्देनज़र लिखीं जातीं हैं जिनमें रचनाकार, पाठक और समाज को बराबर अहमियत दी जाती है। 

आदरणीय डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी द्वारा लिखी गई मेरी पुस्तक 'एहसास के गुंचे' की समीक्षा आपके समक्ष प्रस्तुत है-

एहसास के गुंचे की रचयिता को मन मिला है एक कवयित्री काजो सम्वेदना की प्रतिमूर्ति तो एक कुशल गृहणी और एक कामकाजी महिला है। ऐसी प्रतिभाशालिनी कवयित्री का नाम है अनीता सैनी "दीप्ति" जिनकी साहित्य निष्ठा देखकर मुझे प्रकृति के सुकुमार चितेरे श्री सुमित्रानन्दन पन्त जी की यह पंक्तियाँ याद आ जाती हैं-

"वियोगी होगा पहला कविहृदय से उपजा होगा गान।
निकल कर नयनों से चुपचापबही होगी कविता अनजान।।"

     आमतौर पर देखने में आया है कि जो महिलाएँ अपनी भावनाओं को मूर्त काव्य का रूप दे रही हैं उनमें से ज्यादातर चौके-चूल्हे और रसोई की बातों में ही अपना समय व्यतीत करती हैं या अपने ब्लॉग पर अपनी रचना को लगाकर इतिश्री कर लेती हैं। किन्तु अनीता सैनी ने इस मिथक को झुठलाते हुएसदैव साहित्यिक सृजन ही अपने ब्लॉग 

गूँगी गुड़िया और "अवद्त् अनीता"  में किया है।

       चार-पाँच दिन पूर्व मुझे डाक द्वारा एहसास के गुंचे”  काव्य संकलन प्राप्त हुआ। पुस्तक के नाम और आवरण ने मुझे प्रभावित किया और मैं इसको पढ़ने के लिए स्वयं को रोक न सका। जबकि इससे पूर्व में प्राप्त हुई कई मित्रों की कृतियाँ मेरे पास समीक्षा के लिए कतार में हैं।

     एहसास के गुंचे काव्य संकलन की भूमिका विद्वान साहित्यकार रवीन्द्र सिंह यादव ने लिखी है। जिसमें उन्हों ने कहा है-

"एहसास के गुंचे" काव्य संग्रह को पढ़ते हुए सामाजिक सरोकारों के विभिन्न पहलुओं पर कवयित्री का गहन चिन्तन पृथक-पृथक विषयों पर स्पष्टता के साथ नजर आया। प्रत्येक खण्ड की रचनाओं में अनेक सवाल खड़े होते हैं जिनके उत्तर हमें और भावी पीढ़ी के खोजने हैं क्योंकि सामाजिक मूल्यों का सतत ह्रास पतन का मार्ग है।...सामाजिक-राजनीतिक परिवेश को कविता में समेटना एक चुनौतीभरा कार्य है जिसे कवयित्री ने निष्पक्ष रहते हुए आम जन की पीड़ा से जुड़े विषयों के साथ बखूबी अभिव्यक्ति का जरिया बनाया है....।"

      कवयित्री अनीता सैनी ने अपनी बात में लिखा है-

"कविता में लोक-संस्कृति, आंचलिकता के सांस्कृतिक आयाम, समसामयिक घटनाएँ, पर्यावरण के समक्ष उत्पन्न खतरे, जीवन दर्शन, सौन्दर्य बोध के साथ भाव बोध, वैचारिक विमर्श को केन्द्र में रखते हुए सम्वेदना को समाहित करना मुझे आवश्यक लगता है।....आशा है कविताएँ आपके मर्म को छूने का प्रयास करेंगी।"

       छन्दबद्ध काव्य के सौष्ठव का अपना अनूठा ही स्थान होता है जिसका निर्वहन कवयित्री ने इस संकलन का प्रारम्भ करते हुए गुरु की महत्ता के दोहों में कुशलता के साथ किया है-

गुरु की महिमा का करें, कैसे शब्द बखान।
जाकरके गुरु धाम में, मिलता हमको ज्ञान
--
कठिन राह में जो हमें, चलना दे सिखलाय।
गुरू की भक्ति से यहाँ, सब सम्भव हो जाय।।

      अनीता सैनी ने अपने काव्य संग्रह एहसास के गुंचे  में यह सिद्ध कर दिया है कि वह न केवल एक कवयित्री है बल्कि शब्दों की कुशल चितेरी भी हैं। उदाहरणस्वरूप "गलीचा अपनेपन का" रचना के कुछ अंश देखिए-

"क्यों न हम बिछा दें
एक गलीचा अपनेपन का
प्रखर धूप में
अपने अशान्त चित्त पर
स्नेह करुण और बन्धुत्व का"

        कवयित्री ने प्राची डिडिटल द्वारा प्रकाशित 180 पृष्ठों के अपने काव्यसंग्रह की मंजुलमाला में एक सौ अट्ठाइस रचनाओं के मोतियों को पिरोया है जिनमें विरह, आँसू, अदब-ए-जहाँ, सावन, बोल चिड़िया के, बोलता ताबूत, स्मृति, ढूँठ, सर्द हवाएँ, क्षितिज, साँझ, व्यथा, वेदना नारि की, धरती पुत्र, माँ, गरीबी, अनुभूति, दीप प्रेम का, दर्द दिल्ली का, बटोही, द्वन्द्व, प्रस्थान, मानवता, वक्तआस्था आदि अमूर्त मानवीय संवेदनाओं पर तो अपनी संवेदना बिखेरी है साथ ही दूसरी ओर प्राकृतिक उपादानों को भी अपनी रचना का विषय बनाया है।

      प्रेम के विभिन्न रूपों को भी उनकी रचनाओं में विस्तार मिला है। देखिए संकलन की रचना "दीप प्रेम का" का यह अंश-

झूम उठी खामोशी
हवाओं ने सन्देश दिया
चौखट ने दीदार किया
आँगन ने रूप शृंगार
कोना-कोना बतिया उठा
गुम हुई खामोशी
खुशियाँ चौखट पार उतरीं
आओ प्रेम दीप जलायें

     एहसास के गुंचे” काव्यसंग्रह में कवयित्री ने "आखिर क्यों" नामक रचना में व्यथा को कुछ इस प्रकार अपने शब्द दिये हैं-

विचारों का प्रलय हृदय को क्षुब्ध,
मार्मिक समय मन को स्तब्धता के,
घनघोर भँवर में डुबो बैठा,
गुरूर की हिलोरे मार रहा मन,
स्वाभिमान दौड़ रहा रग-रग में,
झलकी आँखों से लाचारी,
न जिन्दगी ने भरा दम.
न लड़खड़ाये कदम

      एहसास के गुंचे” काव्य संकलन में अनीता सैनी ने छंदो को अपनी रचनाओं में अधिक महत्व न देकर भावों को ही प्रमुखता दी है और सोद्देश्य लेखन के भाव को अपनी रचनाओं में हमेशा जिन्दा रखा है। देखिए उनकी एक अतुकान्त रचना "बोलता ताबूत" का एक दृश्य-

"अमन का पैगाम लहू से लिख दिया
दिया जो जख्म सीने में छिपा दिया
.....
शहीद का दर्जा,
चोला केसरिया का पहना दिया
खेल गये थे वे राजनीति,
मुझे ताबूत में सुला दिया"

     भावों से सिक्त सारगर्भित रचना जन्मदात्री "माँ" में कवयित्री ने लेखनी से कुछ इस प्रकार रचा है-

अन्तर्मन में बहे करुणा
माँ स्नेह का संसार
निःशब्द भावों में झलके
माँ मौन,
माँ मुखर हृदय का उद्गार

    "गरीबी" नामक कविता में कवयित्री ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए लिखा है-

"हवा ही ऐसी चली जमाने की
अमीरी बनी सरताज,
गरीबी मुहताज हो गयी
सदा रौंदी गयी कुचली गयी
गरीबी मिटाने की कोशिशे भी
नाकाम हो गयीं"

       एहसास के गुंचे” काव्यसंकलन को पढ़कर मैंने अनुभव किया है कि कवयित्री अनीता सैनी ने शब्द सौन्दर्य के अतिरिक्त संयोग और वियोग शृंगार की सभी विशेषताओं का संग-साथ लेकर जो निर्वहन किया है वह अत्यन्त सराहनीय है।

      मुझे पूरा विश्वास है कि पाठक एहसास के गुंचे” काव्यसंकलन को पढ़कर अवश्य लाभान्वित होंगे और यह कृति समीक्षकों की दृष्टि से भी उपादेय सिद्ध होगी।

एहसास के गुंचे” काव्यसंकलन को
आप कवयित्री के पते-
अनीता सैनी
करघनी स्कीम, गोविन्दपुरा (झोटवाड़ा)
जयपुर (राजस्थान) से प्राप्त कर सकते हैं।
Email-anitasaini.poetry@gmail.com
ब्लॉग का नाम- गूँगी गुड़िया
BLOG U.R.L. https://www.gungigudiya.com/
पुस्तक का मूल्य मात्र रु. 240/- है।
दिनांकः 05 अक्टूबर, 2020

                                  (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक’)
                         कवि एवं साहित्यकार
                          टनकपुर-रोडखटीमा
                 जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262 308
E-Mail .  roopchandrashastri@gmail.com
Website.  http://uchcharan.blogspot.co



  

रविवार, 4 अक्तूबर 2020

नेह का बँधन


पीपल की शीतल छाँव में बैठ 
फ़ुरसत से गढ़ा है विधाता ने 
नेह का है पवित्र बँधन हमारा 
हम मिलेंगे जीवन डगर पर 
क़दम ख़ुद व ख़ुद तय करेंगे सफ़र 
हर्षाते विश्वास का है सहारा।

मैं समय दीप में उड़ेल समर्पण 
पलकें बिछाए राह तकूँगी तुम्हारी 
बेचैनियों भरा बिछाया है ग़लीचा 
सांसें बुनने लगीं हैं स्वप्न तुम्हारा 
तमस छटेगा उजाला होगा पथ पर 
हँसता हुआ  दिवस होगा हमारा।

धड़कनों ने पहनी है ख़ुशी की पायल 
प्रतीक्षा में मैं चौखट निहारने लगी हूँ 
कोना-कोना प्रीत से सजाऊँगी 
कोमल पैरों को मैं हाथों पर रखूँगी 
स्नेह की मिट्टी से महकेगा आँगन  
मैं तुझे  माँ कहकर बुलाऊंगी ।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, 3 अक्तूबर 2020

'एहसास के गुंचे' की समीक्षा-

जाने-माने साहित्यकार आदरणीय डॉ.दिलबाग सिंह विर्क जी ने मेरे प्रथम काव्य-संग्रह 'एहसास के गुंचे' की समीक्षा लिखी है।
अपनी पुस्तक की विस्तृत व्याख्या के साथ समीक्षा पढ़कर बहुत आनंदित हुई। समीक्षा लेखन सचमुच एक कठिन कार्य है क्योंकि संपूर्ण पुस्तक के अध्ययन के उपरांत ही समीक्षक किसी निष्कर्ष पर पहुँचता / पहुँचती है और अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए लेखनी चलती है।
आदरणीय डॉ. दिलबाग सर का तह-ए-दिल से शुक्रिया इतनी बेहतरीन समीक्षा के लिए।
लीजिए आप भी पढ़िए 'एहसास के गुंचे' की समीक्षा-

पहली दस्तक से उम्मीद जगाता विविधता भरा कविता-संग्रह
कविता-संग्रह - एहसास के गुँचे
कवयित्री - अनीता सैनी
प्रकाशन - प्राची डिजिटल प्रकाशन, मेरठ
पृष्ठ - 180
मूल्य - ₹240
प्राची डिजिटल पब्लिकेशन से प्रकाशित "एहसास के गुँचे" अनीता सैनी का प्रथम संग्रह है। इस संग्रह में 128 कविताएँ हैं। पहली कविता गुरु वंदना के रूप में है, जिसमें 5 दोहे हैं। कवयित्री के अनुसार गुरु के ध्यान से ज्ञान की राह संभव होगी, उनके अनुसार गुरु महिमा का बखान संभव नहीं -
"गुरु की महिमा का करें, कैसे शब्द बखान
जाकर के गुरुधाम में, मिलता हमको ज्ञान।" (पृ. - 19)
इसके बाद की 127 कविताओं को वर्ण्य-विषय के आधार पर 6 विषयों में विभक्त किया गया है।
       पहले भाग "प्रेम / श्रृंगारिक रचनाएँ" में 18 कविताएँ हैं, जो श्रृंगार के संयोग-वियोग पक्ष को बयान करती हैं। मिलन के चित्र कम हैं। यादों की बहुतायत है। याद में टूटने का जिक्र है। यादें वीणा की धुन-सा सुरम्य साज़ बजाती हैं। वह खुद के मन को बहलाती, सुलाती, गुमराह करती है। विरह गीत गाते हुए कहती है-
"अब पधारो पिया प्रदेश / गोरी थारी बोल रही" ( पृ. - 35)
पीड़ा नयनों में सूख रही है। सावन मनोहारी न होकर पीड़ादायक है -
"कुछ बुझा-सा / कुछ ना-उम्मीदी में जला /
डगमगा रहे कदम / फिर खामोशी से चला /
जीवन के उस पड़ाव पर / सिसकियों ने सहलाया/
हाँ! ता-उम्र जला यह वही सावन है।" (पृ. - 26)
इसके अतिरिक्त वह सावन को संबोधित करके उसे साथ निभाने, लौट आने को भी कहती है। कवयित्री ने प्रियतम को भी संबोधित किया है। प्रिय भी कहता है-
"मैं जी रहा हूँ तुझमें" (पृ. - 29)
वह खुद ताड़ के पेड़-सी अडिग रहने की बात करते हुए प्रेमी को विचलित न होने की सलाह देती है। वह खुद को अभिव्यक्त कर पाने में असफल पाती है। उसका मन समय के भँवर में उलझ गया है, लाज-शर्म में डूब गया है , जीवन पथ पर हार गया है, लेकिन वह कहती है -
"थामो मन का हाथ / ज़रा-ज़रा सी बातों पर न रूठो /
न छोड़ो मन का साथ" (पृ. - 33)
एहसास के मोतियों को कोहेनूर बना दिया जाए, इसकी आकांक्षा है। उसे मंजिल पाने का जुनून है। वह पिया के रंग में भी रंगी जाती है और उसकी दहलीज मुद्दतों बाद मुस्करा रही है।
       प्रेम का ही एक रूप है - देश प्रेम और इस शीर्षक के अधीन कवयित्री ने 13 कविताएँ रखी हैं, जिनमें कारगिल युद्ध, अब्दुल कलाम और स्वतंत्रता दिवस आदि को याद किया गया है। इन कविताओं में वीर शहीदों को याद किया गया है। उनके अदम्य साहस को दिखाया गया है। अटारी बॉर्डर के दृश्य का चित्रण है। कवयित्री का बॉर्डर को अटारी बॉर्डर कहना सुखद लगा, अन्यथा लोग इसे वाघा बॉर्डर कहते हैं, जो पाकिस्तान का हिस्सा है। भारतीय बॉर्डर अटारी ही है और एक साहित्यकार का कर्त्तव्य है कि वह सही तथ्यों को प्रस्तुत करे, जिसमें कवयित्री सफल रही है।
      कवयित्री अब्दुल कलाम को भारत का महान सपूत बताती है, जिसने अपने कृतित्व से दुनिया को महकाया, उनका जीवन आचरण बुलंदियों की राह दिखाता है और कर्त्तव्यनिष्ठा का पाठ उनकी छवि में झलकता है। आजादी पर्व पर वह शहीदों की अमर गाथा लिखना चाहती है -
"पावन पर्व आज़ादी का, मिला जिनके बलिदान से
अमर गाथा लिखूँ लहू से अपने, हाथों में ऐसी क़लम थमा दे" (पृ. - 47)
यूँ तो देश अहिंसा का पुजारी है, जो शांति का बिगुल बजाता है,लेकिन जवान भारत माँ को किए वादे को निभाना नहीं भूलता। कारगिल पर फतेह के दिन शहीदों की शहादत को याद कर उसकी आँखें नम हो जाती हैं। कवयित्री के सीने में 3900 जवानों की शहीदी का दर्द उभरता है, लेकिन देश के हालात देख वह कह उठती है -
"जिस देश के लिए हुए कुर्बान / उस देश की ऐसी हालत देख /
वे अपने बलिदान पर क्षुब्ध हुए होंगे" (पृ. - 46)
सैनिकों की बेबसी को बयान किया गया है -
"घर में बैठे आतंकी, मुझे पहरेदार बना दिया
हाथों में थमा हथियार, लाचार बना दिया।"
(पृ. - 51)
       कविता का तीसरा भाग "प्रकृति-परिवेश" है, जिसमें 16 कविताएँ हैं, जिनमें प्रकृति के मनोहारी चित्र प्रस्तुत किए गए हैं। जिस प्रकार दिन की शुरूआत प्रभात की पहली किरण से होती है, उसी प्रकार इस भाग की शुरूआत भी प्रभात की पहली किरण से हुई है। यह किरण पैरों में हिम्मत की पायल पहनाकर हृदय में विश्वास का दीप जला देती है। प्रभात के साथ-सा सांझ, क्षितिज, ठूँठ का भी चित्रण है। कुदरत का कोमल कलेवर कण-कण में स्पंदित हुआ है। सृष्टि सात सुरों में सुंदर जीवन संजो रही है। सृष्टि ने भावों का श्रृंगार किया है, जिससे मन पुलकित हो उठा है। ओस से आँचल सजाने को मंगल बेला में सर्द हवाएँ चली हैं। तुलसी का नन्हा-सा पौधा उसके मन के कोने में पनपा है। वह प्रिये का आह्वान करते हुए कहती है -
"शुष्क मरु की तपती काया / झुलसा तन तलाशे छाया /
आओ प्रिये! / प्रीत संग,/ भाव-सरिताएँ उलीचें" (पृ. - 59)
कवयित्री ने कावेरी की करुण पुकार को भी बयान किया है। मानवकृत प्रदूषण को भी दिखाया है। धरा धैर्य धारण किए असीम पीड़ा सह रही है। इसमें कवयित्री नारी की व्यथा को भी अभिव्यक्त करती है। प्रकृति की और नारी की वेदना एक-सी है। वह आशावादी भी है -
"बनूँ प्रीत पवन के पैरों की / इठलाऊँ इतराऊँ गगन के साथ" (पृ. - 72)
इस भाग में कुछ लघु कविताएँ भी हैं।
     संग्रह के चौथे भाग में समाज की समस्याओं को उद्घाटित करती 43 कविताओं को "सामाजिक सरोकार" शीर्षक के अंर्तगत रखा है। समाज का साहित्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। साहित्यकार समाज की हर घटना के प्रति सचेत रहकर कलम से अपनी भूमिका अदा करता है, यही कारण है कि कवयित्री ने सबसे ज्यादा कविताएँ इसी भाग में रखी हैं। इस भाग की कुछ कविताओं में समाज का स्थायी रूप वर्णित है, तो कुछ में घटित घटनाओं पर त्वरित प्रतिक्रिया है। त्वरित प्रतिक्रिया रूप में लिखी कविताओं में चन्द्रयान-2 के अभियान का वर्णन भी शामिल है, जिसमें इसरो को हार न मानने का संदेश दिया है। 2019 के अंतिम दिनों के घटनाक्रम को चित्रित किया है। थाइलैंड के नेशनल पार्क की घटना का वर्णन है। नए मोटर व्हीकल एक्ट को कविता में पिरोया है। जलमग्न हुए आशियानों की स्थिति दिखायी है। करवा चौथ के चाँद को निहारती सुहागिन का चित्रण है।
            कवयित्री ने बदलते दौर का सार भी लिखा है। जमाने की आबोहवा बदल रही है। गाँव की पगडंडियों को शहर की सड़कों ने खा लिया है। हालात बद से बदतर हुए हैं और वह आईना देखने की बात करती है। वह शोषण की परिभाषा बताने में खुद को असमर्थ पाती है। धरती-पुत्र की पीड़ा को बयां किया है। गरीबों की दशा को दिखाया गया है, लेकिन चुनाव के दिन हालात बदलते हैं, आम आदमी उस दिन खास हो जाता है। बदलते मानव को देखजर वह लिखती है -
"तुम देख रहे हो साहेब! /
कितना बदल गया है / इंसान" (पृ. - 118)
प्रदूषण से पस्त दिल्ली को दिखाया है। माँ के बारे में कहा गया है -
"क्या माँगती है माँ? / चंद शब्द प्यार के /
दो जून की रोटी" ( पृ. - 106)
बेटियों की नृशंस हत्या को मानवीय मूल्यों की मृत्यु कहा गया है। संस्कारों के पतन पर वह लिखती है -
'सजी संकीर्णता सपनों में / सड़ने लगे सब संस्कार" ( पृ. - 100)
चिंतनशील पीढ़ी को दमे का शिकार बताया है। संसार को कर्कश कहा है, जिसमें नारी जीना चाहती थी, लेकिन भाग्य ने माँ-सी मासूम साँसों को जकड़ लिया है। यह दुर्भाग्य हर नारी का है। हाँ, वह नारी को कहती है -
"नारी हो तुम नारी को नहीं लजाओ तुम" (पृ. -119)
पिता का प्यार पति की आँखों में नहीं मिलता, लेकिन हौसले की बात करते हुए वह शिकायत न करने की बात करती है, हालांकि इंसान अच्छे दिनों के दर्श को तरस गया है।
      इस भाग की कविताओं में कवयित्री कई प्रश्न उठाती है। वह सवाल पूछती है -
"हम स्वतंत्र हैं! / क्या यह जनतंत्र है?" (पृ- 88)
वह कहती है -
"वक़्त को मेरे ईश्वर यह हुआ क्या है /
इंसान अब इंसान नहीं धर्म का दरोगा बन गया है" (पृ. - 78)
बदतर हालातों का चित्रण करते हुए वह पूछती है -
"तोड़ इसका बतलाओ साधो! /
गर्दिश में जनता सारी" (पृ. - 92)
वह प्रश्नों के साथ-साथ सुझाव भी देती है -
"हे मानव! / पश्चिम पथ का /
कर परित्याग" (पृ. - 99)
      कवयित्री का आशावाद इन कविताओं में भी झलकता है। पुरखों का वर्णन है। माँ को शक्ति का अवतार कहा गया है। दादा-दादी देवदूत हैं। वह संसार को शतदल-सा सलौना मानते हुए कहती है -
"मुग्ध होती / मधुर धुन में मानवता सारी" (पृ. - 94)
वह अपनेपन का गलीचा बिछाने का संदेश देती है ताकि -
"गलतफहमी की जमी धूल / वक़्त-बेवक़्त झाड़ ले /
न जमे द्वेष / द्वेष के एहसास को मिटा दें" (पृ. - 95)
नियति से उम्मीद करती है -
"शब्द मधुर हों जनमानस के / दिखा नियति ऐसा कोई खेल /
करुण हृदय से सींचे प्रीत को / फूले-फले प्रीत की बेल" (पृ. - 109)
      इस कविता-संग्रह का पाँचवां भाग "नारी-विमर्श" है, जिसमें 8 कविताएँ हैं। कवयित्री का नारी विमर्श उस तथाकथित आधुनिकतावाद से अलग है, जिसमें स्वच्छंदता का समर्थन होता है। कवयित्री रस्मो-रिवाज में बंधकर परिवार को अपना पहला दायित्व बताती है, क्योंकि उसकी दृष्टि में यही अच्छी लड़की की परिभाषा है। वह नए दौर की स्त्री के बारे में कहती है-
"प्रेम का लबादा ओढ़कर / दमित इच्छाओं को हवा देकर /
स्वेच्छाचारिता की नवीन राहें तलाशती नारी /
जीवन के अमृत-घट में / ज़हर की बूँदें क्यों डाल रही है? (पृ. - 136)
बेटी की महत्ता को दोहों के माध्यम से दिखाया गया है-
"बेटी सुख का सार है, बेटी ही श्रृंगार
बेटी के कारण बसे, छोटा-सा संसार।" (पृ. - 137)
वह स्त्री-पुरुष की बजाय जीवन मूल्यों की बात करती है। वह सीता, अहिल्या, यशोधरा का जिक्र करती है। वह समाज के उस कुरूप पहलू को भी दिखाती है, जिसमें नारी जाति को पुरुष रूपी गिद्ध नोचते हैं।
     संग्रह का अंतिम भाग "जीन दर्शन" है और इस भाग में 29 कविताएँ हैं। हर विचारशील प्राणी जीवन के बारे में सोचता है। कवयित्री भी इससे अछूती नहीं। कवयित्री ज़िंदगी, धर्म, विज्ञान, मानवता, आस्था, रिश्ते आदि अनेक विषयों पर अपने चिंतन को इन कविताओं में पिरोती है। वक्त से बढ़कर कोई गुरु नहीं होता इस सोच को दिखाते हुए वह कहती है -
"ज़िंदगी को बखूबी पढ़ाती है जिंदगी" (पृ. - 155)
धर्म को कर्म से जोड़ते हुए कहा गया है -
"में धर्म / दौड़ रहा युगों-युगों से /
कर कर्म को धारण" (पृ. - 169)
वह कविता पर भी विचार करती है उसके अनुसार -
"कविता स्वयं की पीड़ा नहीं / मानव की पर-पीड़ा है" ( पृ. - 151)
कवयित्री कविता को जीती है।
     भाव पक्ष से विविधता भरपूर यह संग्रह कला पक्ष से भी समृद्ध है। भाषा संस्कृतनिष्ठ कही जा सकती है, हालांकि भाषा पर राजस्थानी के प्रभाव को देखा जा सकता है -
प्रीत री लौ जलाए बैठी / धड़कन चौखट लाँघ गयी /
धड़क रहो हिवड़ो बैरी / हृदय बेचैनी डोल रही" (पृ. - 35)
प्रकृति का चित्रण करते मानवीकरण के मनोहारी चित्र प्रस्तुत किए गए हैं-
"पेड़ों की फुनगी पर बैठी / आज सुनहरी शाम" (पृ. - 64)
प्रश्न, उपमा, रूपक अलंकारों का भी भरपूर प्रयोग हुआ है। ज्यादातर कविताएँ मुक्त छंद में हैं, लेकिन दोहे भी कहे गए हैं, जो छंद के नियमों पर खरे उतरते हैं। मुक्त छंद कविताओं में भी तुकांत का प्रयोग हुआ है। वर्णात्मक शैली की प्रधानता है, हालांकि संबोधन का भी अच्छा प्रयोग हुआ है।
     संक्षेप में, अनीता सैनी अपने पहले संग्रह से उम्मीद जगाती है कि वे अपनी लेखनी से साहित्य को समृद्ध करेंगी।
दिलबागसिंह विर्क
95415-21947

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2020

राम राज्य इसी का नाम है?

गिरोह गिरोह बस जुबाँ पर 
एक ही नाम गिरोह 
कौन बनाता है?कहाँ पनपता है?
पनाह कौन देता है?
जाती समुदाय का टिकट 
दिमाग़ के पिछले हिस्से में
चिपकाए घूमता है सदियों से 
शून्य विचारों में विलीन
हाँकता प्रभुत्त्व को 
उषा तेज मुखमंडल पर
धारण करता कहलाता 
उजाले का पार्थ
शक्ति गढ़ता स्वयं शब्दों में 
आज अँधरे में मुँह 
छिपाए ख़ामोश क्यों है?
न वाहवाही के पोस्टर 
अगुवाओं की अँगुली ने गढ़े 
अंधभक्ति का भार क्यों 
कुछ क्षण में झड़ा है ?  
मौन है बिकाऊ मीडिया
 उठी न न्याय की आवाज़ 
औरतों के सीने में वर्तमान का कैसा
  प्रभाव गढ़ा है ?
 शिक्षा के नाम पर क्रूरता लादे 
  प्रगतिपथ मिथक लिबास में 
 अहंकार के बढ़ते क़दमों से 
 मानवता की बर्बर हत्या 
  क्या राम राज्य इसी का नाम है ?

@अनीता सैनी 'दीप्ति'