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गुरुवार, 17 अक्तूबर 2019

एक नज़्म टूट रही होती है



 तुम्हें मालूम है उस दरमियाँ, 
ख़ामोश-सी रहती कुछ पूछ रही होती है, 
मुस्कुराहट की आड़ में बिखेर रही शब्द, 
तुम्हारी याद में वह टूट रही होती है |

बिखरे एहसासात बीन रही, 
उन लम्हात में वह जीवन में मधु घोल रही होती है, 
 नमक का दरिया बने नयन,  
तुम्हें अब भी मीठी नज़रों से हेरती, 
धीरे-धीरे वह टूट रही होती है  |

बे-वजह रुठने से तुम आहतित न होना,  
वह दर्द अपना छुपा रही होती है, 
फ़रेब-सा फ़रमान लिख, 
 पहन लिबास-ए-हिम्मत,  
वक़्त से टकरा वह टूट रही होती है |

साज़िश रचते सपने, 
दृग अपने खोलते हैं उन्हें समझा रही होती है, 
ज़िंदगी की ज़िल्द पर जमे जाले झाड़ती, 
छूटी एक नज़्म टूट रही होती है |

©अनीता सैनी 

मंगलवार, 15 अक्तूबर 2019

करवा-चौथ के चाँद को निहारती



पावन प्रीत के सुन्दर सुकोमल सुमन, 
सुशोभित स्नेह से करती हर साल, 
अलंकृत करती हृदय में प्रति पल ,  
यादों का कलित मंगलमय थाल | 

  अखंड ज्योति प्रिये-प्रीत में सुलगती साँसों की,  
जीवन के प्रति दिन,दिन के प्रति पहर, 
फ़ासले सहेजती सीने में ,   
करती प्रज्वलित दिलों के दरमियाँ, 
प्रीत की राह में प्रेम के उजले दीप |

 कोमल कामना चिरायु की सजाये सीने में शिद्द्त से, 
करवा-चौथ के चाँद को निहारती,  
चाँद-चाँदनी बिछाये क़दम-क़दम पर राह में,  
 यही फ़रियाद करती सितारों से |

निर्जल देह से सिंचती प्रिये-पथ, 
 प्रति पहर करती पल्लवित,
आस्था के पनीले पत्तों की पावन बेल |

 टांगती पल-पल पात-पात पर, 
मधुर शब्दों में गूँथें विश्वास के मनमोहक गुँचे, 
 पावन प्रेमल प्रसून वह प्रार्थना में तुम्हारे |

© अनीता सैनी 

रविवार, 13 अक्तूबर 2019

उस मोड़ पर



 उस मोड़ पर
 जहाँ 
 टूटने लगता है
 बदन 
छूटने लगता है 
हाथ  
देह और दुनिया से
उस वक़्त 
उन कुछ ही लम्हों में 
उमड़ पड़ता है 
सैलाब 
यादों का 
 उस बवंडर में उड़ते  
नज़र आते हैं 
अनुभव
 बटोही की तरह राह नापता 
वक़्त 
रेत-सी फिसलती 
साँसें 
विचलित हो डोलती हैं 
तभी 
अतीत की 
 उजली धूप में   
उसी पल हृदय थामना 
चाहता है  
हाथ 
भविष्य का 
 अँकुरित हुए उस 
परिणाम के 
साथ
 र्तमान करता है 
छीना-झपटी 
एक पल के अपने अस्तित्त्व के 
साथ |

© अनीता सैनी 

बुधवार, 9 अक्तूबर 2019

प्रबल प्रेम का पावन रुप



थाईलैंड का  एक हिस्सा  
खाओ याई नेशनल पार्क  
बहता है वहाँ एक झरना नरक का 
स्थानीय लोगों ने दिया यह नाम  
 निगल रहा है वह 
 ज़िंदगियाँ मासूम हाथियों की 
सिहर उठा मन देख ज़िंदगी की जंग
नन्हें नाज़ुक हाथी के बच्चे की 
आह से आहतित 
आवाज़ में मर्म ममता का लिये  
 टपकते आँसू पाकीज़ा नन्हीं  आँखों से  
ठहर गयीं धड़कनें बिखर गयीं साँसें 
कूद पड़े प्रबल प्रेम के प्रतापी 
परिवार के सात अन्य हाथी 
अर्पित की सभी ने साँसें अपनी 
बचाने अपना एक नन्हा प्यारा साथी 
प्रखर प्रेम को सजोये सीने में  
सदियों से सहेजते और समझाते आये  
सबल समर्पण साँसों में लिये 
मसृण रस्सी से जीवनपर्यन्त बँधे आये   
अंतरमन को उनके 
उलीचती सृष्टि स्नेह की स्निग्ध धार से 
प्रेम के वाहक कहलाये 
करुणा के कोमल कलेवर कुँज के 
कृपाधार रहे ममता के
वशीभूत सस्नेह के गजराज 
दुरुस्त दिमाग़ के नहीं है दावेदार
कहलाये कोमल मन,विशाल तन
माँ के प्रथममेश्वर पहरेदार 
 पावन प्रेम से पल्लवित स्वरुप  
शाँत चित्त 
मानव मित्रता के सच्चे हक़दार 
 कविता कही न गढ़ी कल्पना 
मुखर हुआ यथार्थ के  मंथन से 
 प्रबल प्रेम का पावन रुप |

© अनीता सैनी 

सोमवार, 7 अक्तूबर 2019

दमे का शिकार चिन्तनशील पीढ़ी होने लगी




विश्वास के हल्के झोंकों से पगी 
 मानव मन की अंतरचेतना
 छद्म-विचार को खुले मन से
 धारणकर स्वीकारने लगी, 
हया की पतली परत 
 सूख चुकी धरा के सुन्दर धरातल पर 
जिजीविषा पर तीक्ष्ण धूप बरसने लगी |

 अंतरमन में उलीचती स्नेह सरिता
 बेज़ुबान सृष्टि 
बेबस-सी नज़र आने लगी, 
सुकून की चाँदनी को छिपाती निशा 
ख़ामोशी से आवरण
 उजाले का निगलने लगी |

हवा में नमी द्वेष की 
मनसूबे नागफनी-से पनपने लगे 
दमे का  शिकार
 चिन्तनशील पीढ़ी  होने  लगी, 
मूक-बधिर बन देख रहा
 शुतुरमुर्गी सोच-सा ज़माना 
 अभिव्यक्ति वक़्त की ठोकरें खाकर 
ज़िंदा शमशान पहुँचने लगी |

©अनीता सैनी 

शनिवार, 5 अक्तूबर 2019

वो चेहरा चिलमन में छिपाने लगे



फटी क़मीज़ की बेतरतीब तुरपन, 
आलम मेहनत का दिखाने लगे, 
देख रहे  गाँव के गलियारे, 
वो हालत हमारी भरी चौपाल में सजाने लगे |


सिमटने लगी कोहरे की चादर, 
उनके चेहरे भी नज़र आने लगे,  
जल्द-बाज़ी में जनाब ने की थी लीपापोती, 
अब वे दर्द की सिसकियाँ गिनाने लगे |

 समय की सख़्त समझाइश पर, 
बर-ख़ुरदार ने बहुतेरे पानी के बुलबले बनाये, 
सजा दिया गुलदान में उन्हें,
श्रेय की महफ़िल सजाने  लगे | 

ठहाकों  में  ठिठुरी संवेदना, 
इंसानियत को जामा रुपहला पहना दिया,   
चाल मद्धिम मन मकराना-सा, 
गुले-से पैंतरे अपने पैरों से दिखाने लगे |

दौलत का फ़लक तोड़, 
जमाने भर के जुगनू उसमें चमकाने लगे, 
 मज़लूमों का मरहम दर्द को बता, 
वो दर्द का पैमाना झलकाने लगे, 
ओझल हुई हया पलकों से देखो !
वो बरबस चेहरा चिलमन में छिपाने लगे | 

©अनीता सैनी 

गुरुवार, 3 अक्तूबर 2019

क़ुदरत की कही कहानी



उसकी ख़ामोशी खँगालती है उसका अंतरमन,  
वो वह  नहीं है जो वह थी, 
उसी रात ठंडी पड़ चुकी थी देह उसकी, 
ठहर गयीं थीं एक पल साँसें, 
हुआ था उस रात उसका एक नया जन्म,    
देख चुकी थी अवाक-सी वह, 
एक पल में जीवन का सम्पूर्ण  सार, 
उस रात मंडरा रहे थे बादल काल के, 
हो चुकी थी बुद्धि क्षीण व मन क्षुब्ध,  
विचार अनंत सफ़र के राही बन दौड़ रहे थे,  
कोई नहीं था साथ उसके, 
तब थामा था क़ुदरत ने उसका हाथ, 
प्रत्येक प्रश्न का उत्तर तलाशती थी जिस में,  
  भूल चुकी थी उसका साथ,  
पवन के हल्के झोंकों संग बढ़ाया,  
क़ुदरत ने अपना हाथ, 
 समझाया गूढ़ रहस्य अपना,
सिखाया जीवन का सुन्दर सार, 
त्याग की परिभाषा अब पढ़ाती है, 
क़ुदरत उसे हर बार, 
समझाती है सम्पूर्ण जीवन अपना, 
 दिखाती है अपना घर-द्वार और कहती है, 
खिलखिलाती धूप भी सहती हूँ,  
सहती हूँ सूरज की ये गुर्राहट भी, 
देख रही अनेकों रंगों में जिंदगियाँ, 
जीवन के सुन्दर रुप भी, 
गोद से झर रहे रुपहले झरने की झंकार भी, 
तपते रेगिस्तान की मार भी, 
त्याग की अनकही कहानी, 
क़ुदरत सुनाती है अपनी ही ज़ुबानी,  
क्यों बाँधना मन आँचल से, 
कहाँ छिपाया मौसम मैंने,कहाँ  छिपाया पानी |

© अनीता सैनी 

बुधवार, 2 अक्तूबर 2019

एक नन्हा-सा पौधा तुलसी का पनपा मेरे मन के कोने में



एक नन्हा-सा पौधा तुलसी का, 
पनपा मेरे मन के एक कोने में, 
प्रार्थना-सा प्रति दिन लहराता, 
सुकोमल साँसों का करता दान
सतत प्राणवायु बहाता आँगन में   
 संताप हरण करता हृदय का,   
संतोष का सुखद एहसास सजा,  
पीड़ा को पल में हरता वह हर बार |

मूल में मिला मुझे इसके अमूल्य सुख का,  
सुन्दर सहज सुकोमल सार,  
पल-पल सींच रही साँसों से, 
मन की मिट्टी में बहायी स्नेह की स्निग्ध-धार |

नमी नेह की न्यौछावर की, 
अँकुरित हुए पात प्रीत के, 
करुण वेदना सहकर बलवती हुआ,  
मन-आँगन में वह पौधा हर बार |

मनमोही मन मुग्धकर लहराता, 
पागल पवन के हल्के झोंकों संग,  
तब मुखरित हरित देव ने पहनाया, 
प्रेम से पनीले पत्तों का सुन्दर हार |

खनका ख़ुशी का ख़ज़ाना आँगन में, 
खिली चंचल धूप अंतरमन में,  
चित्त ने किया सुन्दर शृंगार, 
महका मन का कोना-कोना,  
 तुलसी का पौधा लहराया जब मन में हर बार |

© अनीता सैनी