सोमवार, 7 अक्तूबर 2019

दमे का शिकार चिन्तनशील पीढ़ी होने लगी




विश्वास के हल्के झोंकों से पगी 
 मानव मन की अंतरचेतना
 छद्म-विचार को खुले मन से
 धारणकर स्वीकारने लगी, 
हया की पतली परत 
 सूख चुकी धरा के सुन्दर धरातल पर 
जिजीविषा पर तीक्ष्ण धूप बरसने लगी |

 अंतरमन में उलीचती स्नेह सरिता
 बेज़ुबान सृष्टि 
बेबस-सी नज़र आने लगी, 
सुकून की चाँदनी को छिपाती निशा 
ख़ामोशी से आवरण
 उजाले का निगलने लगी |

हवा में नमी द्वेष की 
मनसूबे नागफनी-से पनपने लगे 
दमे का  शिकार
 चिन्तनशील पीढ़ी  होने  लगी, 
मूक-बधिर बन देख रहा
 शुतुरमुर्गी सोच-सा ज़माना 
 अभिव्यक्ति वक़्त की ठोकरें खाकर 
ज़िंदा शमशान पहुँचने लगी |

©अनीता सैनी 

28 टिप्‍पणियां:

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

एक शानदार रचना जो हालिया वक़्त की पेचीदगियों में उलझे जीवन संघर्ष को सशक्त आवाज़ देती हुई जगाती है.
दुनिया आज सृष्टि के प्रति उदासीन नज़र आती है. पेड़ कट रहे हैं तो इसका विरोध करने वालों को गिरफ़्तार किया जा रहा है. हरेक छोटी- बड़ी समस्या के लिये शीर्ष अदालतों में गुहार लगाने का वक़्त अब समाज के पास कहाँ है.
समाज को स्वयं ही तय करना होता है भविष्य का यथोचित मार्ग ताकि भावी पीढ़ी हमें कोसती हुई अपना विकास अवरुद्ध न कर ले.
बहुत बेहतरीन सृजन जो अंतरमन में अनेक सवालों के तूफ़ान उत्पन्न करता है.
बधाई एवं शुभकामनाएँ.
लिखते रहिए.

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति

richa shukla ने कहा…

एक शानदार प्रस्तुति.. सुंदर विवेचना
http://prathamprayaas.blogspot.in/-सफलता के मूल मन्त्र

विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा…

मंत्रमुग्ध हो जाती हूँ आपके लेखन से
साधुवाद

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (08-10-2019) को     "झूठ रहा है हार?"   (चर्चा अंक- 3482)  पर भी होगी। --
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
-- 
श्री रामनवमी और विजयादशमी की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Meena Bhardwaj ने कहा…

पर्यावरण संरक्षण पर मन्त्रमुग्ध करती अनुपम कृति ।

रेणु ने कहा…

हवा में नमी द्वेष की
मनसूबे नागफनी-से पनपने लगे
दमे का शिकार
चिन्तनशील पीढ़ी होने लगी,
मूक-बधिर बन देख रहा
शुतुरमुर्गी सोच-सा ज़माना
अभिव्यक्ति वक़्त की ठोकरें खाकर
ज़िंदा शमशान पहुँचने लगी |
सार्थक सृजन प्रिय अनीता | नए प्रतीक , बिम्ब रचना को प्रभावी बना रहे हैं |
मौन रह ताकते जमाने की शुतुरमुर्गी सोच का सही आंकलन !! रचना के लिए बधाई और दशहरा की हार्दिक शुभकामनायें |

Jyoti khare ने कहा…

जीवन की विडंबनाओं की पड़ताल करती बहुत सुंदर रचना

दिगंबर नासवा ने कहा…

विश्वास के इस झोंकों को कास के पकड़ना अच्छा होता है ...
मन बहुत चंचल होता है ... अविश्वास पहले पकड़ता है ... नयी पीड़ी को समझना होगा ... विजयदशमी की बहुत शुभकामनायें ...

मन की वीणा ने कहा…

सारगर्भित सृजन,
सामायिक परिवेश में सटीक चिंतन देता विषय।

हवा में नमी द्वेष की
मनसूबे नागफनी-से पनपने लगे
दमे का शिकार
चिन्तनशील पीढ़ी होने लगी,
मूक-बधिर बन देख रहा
शुतुरमुर्गी सोच-सा ज़माना
अभिव्यक्ति वक़्त की ठोकरें खाकर
ज़िंदा शमशान पहुँचने लगी |।
अभिनव भाव रचना ।

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया कविता रावत जी
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया आप
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय चर्चामंच पर स्थान देने के लिए
प्रणाम
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

तहे दिल से आभार प्रिय मीना दी सुन्दर समीक्षा हेतु
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सादर नमन आदरणीया विभा दी जी। आपकी समीक्षा मेरे लेखन को जवाबदेह बनाती है। आपसे मिला उत्साहवर्धन मुझे और बेहतर लिखने को प्रेरित करता है आप का स्नेह और सानिध्य हमेशा बना रहे।
आभार
सादर।

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार आदरणीय सर रचना का मर्म स्पष्ट करती समीक्षात्मक सुन्दर प्रतिक्रिया के लिये।
प्रणाम
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार आदरणीय दिगंमर नासवा जी,रचना का मर्म समझते हुये सुन्दर समीक्षा हेतु,और रचना की गहन व्याख्या करते हुए स्पष्ट संदेश देने के लिये बहुत- बहुत शुक्रिया आपका।
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

आदरणीया रेणु दी आपकी प्रतिक्रिया ने मन मोह लिया है 😊😊। रचना का मान बढ़ाने के लिये बहुत शुक्रिया दी।
सादर।

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय आप का सुन्दर समीक्षा हेतु |आप का प्रोत्साहन लेखनी को सुन्दर प्रवाह प्रदान करता है आप का आशीर्वाद हमेशा बना रहे |
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

रचना का मर्म इतनी गहराई से स्पष्ट करती सुंदर मोहक समीक्षा के लिये ढेर सारा आभार दी। अपना स्नेह यों ही बनाए रखियेगा।
सादर।

Neeraj Kumar ने कहा…

धुंध हटाती रचना !

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा ने कहा…

अंतरमन में उलीचती स्नेह सरिता
बेज़ुबान सृष्टि
बेबस-सी नज़र आने लगी,
सुकून की चाँदनी को छिपाती निशा
ख़ामोशी से आवरण
उजाले का निगलने लगी |
-बहुत ही सुंदर रचना। शुभकामनाएं ।

Anuradha chauhan ने कहा…

हवा में नमी द्वेष की
मनसूबे नागफनी-से पनपने लगे
दमे का शिकार
चिन्तनशील पीढ़ी होने लगी,
मूक-बधिर बन देख रहा
शुतुरमुर्गी सोच-सा ज़माना अद्भुत लेखन सखी👌 बेहतरीन रचना

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया सर
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार बहना
सादर

Sudha devrani ने कहा…

अंतरमन में उलीचती स्नेह सरिता
बेज़ुबान सृष्टि
बेबस-सी नज़र आने लगी,
सुकून की चाँदनी को छिपाती निशा
ख़ामोशी से आवरण
उजाले का निगलने लगी |
वाह!!!
कमाल का लेखन ...बहुत ही सुन्दर, सार्थक एवं लाजवाब।

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया दी
सादर