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शुक्रवार, अक्तूबर 8

ताखा रो दिवलो


ताखा माही धधके दिवलो 

पछुआ छेड़ मन का तार।

प्रीत लपट्या जळे पतंगा 

निरख विधना रा संसार।।


रुठ्यो बैठो भाव समर्पण 

नयन कोर लड़ावे  लाड़।

खुड बातां का काढ़ जीवड़ो

टेड़ी-मेडी बाँध बाड़।

 विरह प्रेम री पाट्टी पढ़तो 

चुग-चुग आँसू गुँथे हार।।


 बूझे हिय रो मोल बेलड़ी

 यादा ढोव बिखरा पात।

जीवन क्यारी माँज मुरारी

 रम्या साँझ सुनहरी रात।

अंबर तारा बरकी कोंपल

 चाँद हथेल्या रो शृंगार।।


धवल चाँदनी सुरमो सारा 

 जागी हिय की पीर रही।

 थाल सजाया मनुवारा में 

आव भगत की खीर रही। 

हलवो पूरी खांड खोपरो

 झाबा भर-भर दे उपहार।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्द =अर्थ 

ताखा -आला, ताक़

दिवलो -दीपक 

लपट्या -लौ 

बेलड़ी-बेल 

हथेल्या -हथेली 

झाबा-बाँस या पतली टहनियों का बना हुआ गोल और गहरा पात्र, टोकरी


शनिवार, अक्तूबर 2

ट्रेंड



बारिश की बूँदों का 

फूल-पत्तों की अंजुरी में 

 सिमटकर बैठना

बाट जोहती टहनियों का 

हवा के हल्के झोंके के

स्पर्श मात्र से ही 

निश्छल भाव से बिखरना

डाल पर डोलती पवन का 

समर्पण भाव में डूबना

बिन बादल बरसी बरसात का

यह रुप

कभी  ट्विटर पर

 ट्रेंड ही नहीं करता।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'