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शुक्रवार, अक्तूबर 8

ताखा रो दिवलो


ताखा माही धधके दिवलो 

पछुआ छेड़ मन का तार।

प्रीत लपट्या जळे पतंगा 

निरख विधना रा संसार।।


रुठ्यो बैठो भाव समर्पण 

नयन कोर लड़ावे  लाड़।

खुड बातां का काढ़ जीवड़ो

टेड़ी-मेडी बाँध बाड़।

 विरह प्रेम री पाट्टी पढ़तो 

चुग-चुग आँसू गुँथे हार।।


 बूझे हिय रो मोल बेलड़ी

 यादा ढोव बिखरा पात।

जीवन क्यारी माँज मुरारी

 रम्या साँझ सुनहरी रात।

अंबर तारा बरकी कोंपल

 चाँद हथेल्या रो शृंगार।।


धवल चाँदनी सुरमो सारा 

 जागी हिय की पीर रही।

 थाल सजाया मनुवारा में 

आव भगत की खीर रही। 

हलवो पूरी खांड खोपरो

 झाबा भर-भर दे उपहार।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्द =अर्थ 

ताखा -आला, ताक़

दिवलो -दीपक 

लपट्या -लौ 

बेलड़ी-बेल 

हथेल्या -हथेली 

झाबा-बाँस या पतली टहनियों का बना हुआ गोल और गहरा पात्र, टोकरी


10 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-10-21) को "पढ़ गीता के श्लोक"(चर्चा अंक 4213) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    ------------
    कामिनी सिन्हा

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  2. वाह बहुत बहुत बहुत ही उम्दा प्रस्तुति

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  3. मन को छू गया यह गीत अनीता जी।

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  4. बहुत सुन्दर सृजन

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  5. सुंदर भावभरा गीत अनीता जी, आपको नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई ।

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  6. बढ़िया अभिव्यक्ति

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  7. हृदय स्पर्शी विरह गीत राजस्थान की सौंधी माटी की सौंधी खुशबू बिखेरता गीत ,भाव प्रणव सुंदर शब्द चयन।
    खुड बातां का काढ़ जीवड़ो
    टेड़ी-मेडी बाँध बाड़।
    जबरदस्त 👌 विरहन के भावों में पिघलता संसार।
    सौणों गीत।

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  8. अनीता, तुम्हारे विरह-गीत दिल को छू लेते हैं.
    इस गीत में तो तड़प-कसक की पराकाष्ठा है.
    मेरे अनुरोध पर गीत के नीचे कठिन शब्दों के हिंदी अर्थ भी दे दो.

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  9. बहुत सुंदर रचना,अनिता।

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