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गुरुवार, दिसंबर 20

मुस्कान अश्कों की


               
   दर्द - ए -ज़िंदगी   की  सौग़ात,   मिला  दर्द का  मक़ाम, 
    ग़मों  की  आड़  में   खिली,   अश्कों   की   मुस्कान। 

   मुहब्बत  के  लिबास  में,  दर्द -ए -ग़म   से   हुई   पहचान,
  ग़मों  का  सितम  क्या  सितम ,अश्कों  में  खिले  मुस्कान। 

 कुछ   ज़ख़्म    वक़्त   का,   वक़्त   का    रहा   गुमान,
    वक़्त   की   पैरवी   में,  खिली  अश्कों   की  मुस्कान। 

   ख़ामोश    ज़िंदगी ,  हाथ    में   दर्द     का   जाम,
 सिसक  रही   साँसें  सीने   में  अश्कों   की  मुस्कान। 

    ख़ता  और  ख़तेवार  कौन  ,वक़्त  को  खंगालता  मन ?
   सीने   में  दफ़न  दास्ताँ ,  नम  आँखों   की  मुस्कान। 

  # अनीता सैनी 

मंगलवार, दिसंबर 18

ख़ामोश होते रिश्ते


                                                   
 सिसक    रहा    सन्नाटा, 
ख़ामोशियों  की गुहार  यही , 
रिक्त   हो  रही   साँसों  का ,
 क्या  यही    हिसाब    दोगे ? 

  बेज़ुबान   शब्दों   को ,
 कब जुबान दोगे ? 
 जल रहे अंहकार में  रिश्ते   , 
 मानवता  की  ममता  क्या,  
यही   सिला    दोगे  ?

  ठिठुर  रहे  जज़्बात ,
सपनों  का    जला   अलाव , 
स्वार्थ   का   जामा  पहन  ,
 ऊष्ण   की  करे  पुकार, 
ठिठुर  रहे   ममत्त्व   को  क्या, 
 यूँ   हीं  ठुकरा  दोगे  ?

रजत   मेखला   की  कालिख ,
मन   में   मचाये  उत्पात, 
अंजानी  अँगुली   ढूंढ  रहा  मन ,
खुलवा  सकू   रिश्तों    का  बंद ,
ओझल-सी इन  राहों  में   क्या, 
 यूँ   ही   ठुकरा    दोगे ? 

उफान  आते  आदतन  से,  
रिश्तों    को  चखकर   देखा, 
व्यवहार  की  लवणता  परखे ,
 दीन  की  हालत  देख  क्या, 
 यूँ  ही  ठुकरा  तो  न   दोगे ? 

 © अनीता सैनी 

शनिवार, दिसंबर 15

अदब-ए-जहाँ


                                                         
ज़िंदगी   ने  की  ज़िंदगी  से  वफ़ा,  
नाम  इश्क़ और मोहब्बत  कह गया, 
समा न  सका  जब   दिल   में,   
  अदब  से  बेवफ़ा  कह गया। 

सफ़र कुछ वक़्त का राह बदल गयी 
तन्हा  सफ़र  में  तन्हाइयों  का हो गया, 
सोख लिए अश्क़  धूप ज़िंदगी ने 
    बेदर्दी   बेवफ़ा  कह  गया। 

वक़्त  के  साथ  चला  राही  हमसफ़र बन  गया, 
ज़िंदगी  हसीं    महबूब  हमदम  बन गया , 
मिल  न   सकी   क़दमों   की  ताल,     
    बेअदवी  से   बेअदव   कह गया। 

   मक़ाम  ज़िंदगी  
  राह  में  मरघट  आ गया, 
 खोज  रहा  इज्ज -ओ -जहां ,  
वो खाली  हाथ आ गया, 
 इस जहां  का  दयानतदार , 
    बिन  इन्फाज   आ गया 
 मरघट में  बैठा अकेला, 
जहां  को अदब से देखता  रह  गया। 

   # अनीता सैनी 


शुक्रवार, दिसंबर 14

ऋतुराज शिशिर


                                                                                            
निशा   निश्छल   मुस्कुराये  प्रीत  से, 
विदा    हुई   जब   भोर   से। 


तन्मय   आँचल   फैलाये   प्रीत का , 
पवन  के   हल्के   झौकों    से। 


कोयल    ने   मीठी    कूक  भरी, 
जब   निशा   मिली   थी   भोर   से। 


ऊषा     स्नेह    में    डूब    गई, 
जब   बरसी   बदरी   धूर   की। 


 प्रीत   धरा    की   मुग्ध   हुई ,
कुसुमों   ने   ताज  सजाया   है। 


गूँज    रही   पायल   प्रीत   की , 
शिशिर    के   नंगे    पाँव   की। 


सिहर    उठा   जनमानस   भी ,
शिशिर    की   शीतल    छाँव   से। 

              #अनीता सैनी 

शनिवार, दिसंबर 8

घनाक्षरी छंद



                                       
 8,8,8,7,वर्णो  का विधान 16, 15 पर यति 
         31, वा वर्ण दीर्घ  |

मोहब्बत से सराबोर आँखें बरस  रही ,
लफ़्ज  ख़ामोश  रहे  धड़कन कह रही  |

जज़्बात  मोहब्बत के  उर  से  उफ़न रहे, 
आँखों  में  तैरते  सपनें  दास्तां  कह  रहे |

तेरी  यादों  का करवा दिल में दफ़न रहा, 
टूटे  दिल की दरारों में  वही   झाँक रहा  |

मोहब्बत -ए -पैगाम दिल में दफ़न किया, 
हवाओं  को सीने  से लगा राज कह दिया |

  कैसे अदा करुँगी  मोहब्बत का नज़राना, 
  तेरे  सीने  से लग भूल जाती हूँ जमाना  |

शुक्रवार, दिसंबर 7

गूँज शहनाई की...


                                                  
पुरवाइ   संदेश  लाई, 
   उपवन   महका, 
सूरज ने किरनें  बरसाई  ,
खग  ने  मीठी  राग  सुनाई,  
गूँज  उठी   मीठी   शहनाई ,

पीली  हल्दी ,  चमके  कंगना, 
लाल   चुनरियाँ,  सुर्ख   जोड़ा,  
सिंदूरी   मंद -मंद  मुस्काई 
सप्त   फेरों  की  रस्म  निभाई, 
रिश्तों   का  गंठबंधन  सुहाना,
अश्रु   से  भीगी   खुशियाँ, 
पुरवाई   संदेश     लाई ,
गूँज   उठी   मीठी   शहनाई, 


तङपता  ह्रदय , बेचैन  आँखें, 
माँ  के  मन  से  झलके  अश्रु , 
पिता   के  ह्रदय  ने  बात  बताई , 
    जग  ने  ऐसी  रीत  बनाई ,
चिड़ियाँ   मेरी   हुई   पराई ,
गूँज   रही   मीठी  शहनाई  ,

आँगन,  पीपल,  खेल,   खिलौने , 
सजें  द्वार  पर  आम  के   पात, 
विदा   गीत  अब  गाते  है, 
पुरवाई    संदेश    लाई, 
गूँज   रही    मीठी   शहनाई  ,

गुरुवार, दिसंबर 6

माँ...


कुछ तो कहेगें लोग.....


                              


समंदर की लहरों पर हमनें  भी  पैगाम लिखा, 
दर्द को छुपाया ,मोहब्बत को सरे आम लिखा !!

जंग  जिंदगी  की , क़त्ल   अरमानों   का   हुआ, 
सुर्खरु जनाजे में  नाम,दफ़न  प्यार का अफ़साना हुआ  !!


जिंदगी पर  तोहमत  कैसी , उम्र -ए -दराज़ मिले दिन चार ,
दो  में   बुनते  रहे  सपनें ,  दो  में  किया  इंतजार  !!

ज़माने   का  ये   हुनर,  अपनों    ने   आज़माया   है 
किसी  का  तीर,  किसी  की  कमान  से  चलाया  है  !!

हो  सितम की  इंतहा ,  रो   रही   जिंदगी , 
कहाँ   मिलेगा परवरदिगार , यही  कह रही बंदगी ? 

बुधवार, दिसंबर 5

मीम की दौड़


                                           

मनु मन की एठी   निगाहें 
ह्रदय  में  उफ़न रहा दर्द ,
मीम की दौड़ में शामिल,
ह्रदय की असीम वासना !!

लहरों सी ओझल मंजिल, 
गंतव्य की ओर डगमगाते, 
न बढ़ने वाले क़दमों  की गति  !!

विचारों  की थाह में , 
गुमराह हुआ अपनत्व,   
कामयाबी की सीढ़ी से,
 कुचल रहा  ममत्व  !!

नजर आ रहे धुआँ में, 
मायूसी के काले धब्बे,
जहा कभी उजालों ने, 
अंधेरों  को  दी  पनाह   !!

क्षण भर खुशियों का ठहराव, 
वही पीङा का रुबाव ,
ठिठुर रहा ह्रदय में, 
तृष्णा का असीम भाव बना, 
मीम से मनु का गहरा लगाव  !!

रविवार, दिसंबर 2

उलझन धरा की




मुद्दतों  बाद निकली जब घर से, 
ख़ामोशी में सन्नाटा पसरा पड़ा,  
वट वृक्ष अश्रु बहा रहे,  
धरा भी  उलझन  में  खड़ी |

मोहब्बत से आबाद जहां,  
तिनका तिनका बिख़र रहा,  
कभी हरा भरा रहा आँचल,  
बेबसी में  आज  सूखा पड़ा |

मानव  बन हमदर्द,  
दर्द को आग़ोश में भर, 
कुछ क़दम भी न चला,  
सज़दे में झुका सर और रो पड़ा,  
बिछा दर्द का दरिया,  
धरा को बहला रहा,  
प्रेम की आड़ में 
गुनाह अपना छुपाये  खड़ा | 

- अनीता सैनी 

शनिवार, दिसंबर 1

उसूल


                                   


 परत दर परत नसीब पर बिछाते रहे , 
   ख़ामोशी भरी निगाहों से उसूल, 
       कहीं  हालात के  ,
   कहीं मन के रहे  उसूल   ,
      कुछ कर्म  से उपजे ,
     रहे  भाग्य की देन, 
      न  सह  पाई , 
     न  कह  पाई ,
समय के हाथों  उभर रहा ,
  खेला  हुआ यही  खेल !!

     दिल  कहें  यही  खेल,  
  ख़ामोशी  से  बैठी चौखट पर, 
  देख रही  कर्मो का खेल ,
     अहसास हुआ,
     मिला न कोई मेल !!

   एक पड़ाव और  गुज़रा , 
   ख़िला  एक नायाब फूल ,
      हर दिन  एक ख़्वाब 
     जिंदगी बनी  नायाब ,
  दोहरा  रही  हूँ वही  हिसाब, 
  जो बोया  मैं ने  हाथों  से, 
  निकले बन किस्मत के फूल, 
  क्यों  कहु  जिंदगी ने चुभोई कोई शूल  ?   


  

सोमवार, नवंबर 26

वो दो आँखें......


                                      
ख़ामोशी से एकटक ताकना,
उत्सुकताभरी निगाहें ,
अपनेपन से  धड़कती, 
 धड़कनों की  पुकार,
और कह रही  कुछ पल मेरे पास   बैठ  !
 एक कप चाय का बहाना ही क्यों न हो,
कुछ पल सुकून से उसके पास बैठना, 
उसकी ज़िदगी का अनमोल पल बन जाता, 
 उसका अकेलापन समझकर भी  नहीं समझ पायी !
उसकी वो आँखें तरसती रहीं ,
धड़कन धड़कती  रही, 
ख़ामोश शब्द बार-बार पुकार रहे, 
मैं व्यस्त थी, 
या एक दिखावा ,
  बड़प्पन के लिये 
 व्यस्तता का दिखावा लाज़मी था !
क्या माँगती  है माँ ? 
चंद शब्द  प्यार के, 
 दो जून की रोटी, 
ज़िदगी में लुटायी  मुहब्बत का कुछ हिस्सा  !
उसकी ज़िदगी के इस और उस,
दोनों छोर पर हम हैं, 
और हमारी ... 
वो कहीं  नहीं...
हमारी ज़िंदगी  में हर वस्तु का अभाव...
प्यार  कर नहीं पाते.. 
पैसे होते नहीं.. 
और मकान छोटा लगता..
और माँ. ...
एक चारपाई  पर पूरा परिवार समेट लेती है !


रविवार, नवंबर 25

मन ने थामी तृष्णा की डोर..


                
                             दिन को सुकून न रात को चैन , 
                              कुछ पल बैठ क्यों  है बेचैन  ?


                              मन  बैरी  रचता  यह  खेल, 
                                तन  बना   कोलू  का  बैल 


                                मन की दौड़ समय का खेस ,
                             ओढ़  मनु  ने  बदला  है वेश  !


                          मन की पहचान मन से छिपाता, 
                          तिल-तिल मरता,वेश बदलता !


                                 मनु को मन ने लूट लिया, 
                                जीवन उस का छीन  लिया !


                            बावरी  रीत परिपाटी का झोल, 
                             तन   बैरी   बोले   ये    बोल !


                                     तन  हारा  !
                            समय ने उसको  ख़ूब  लताड़ा,
                           बदल वेश जीवन को निचोड़ा !

                                          मन चंचल !
                                  सुलग रही तृष्णा की कोर , 
                                 थका मनु  न छूटी   डोर !

                                      -अनीता सैनी 






मंगलवार, नवंबर 20

आस्था

                          
    मासूमित  के  स्वरुप   में  सिमटी
   प्रेम के लिबास में लिपटी 
     होले  से  क़दम  बढ़ाती
      आँखों  में  झलकती 
        ह्रदय में  समाती 
     स्नेहगामिनी 
    मनमोहिनी 
   अपनत्त्व सहेजती 
     तुलसी-सी पावन 
     मन-मंदिर  में विराजित 
                             सहेज माम्तत्व  
                            अपनत्त्व  की बौछार 
                           शालीनता की मूरत 
                               ऐसी रही 
                          आस्था की सूरत |

                           समय की मार ने 
                           अपनों के प्रहार ने 
                          जल रही द्वेष की दावाग्नि में 
                           दोगले स्वार्थ ने 
                         अपना शिकार बनाया !
                          सोच-समझ के भंवर में गूँथी 
                           आज बिखर रही आस्था |

                          तपता रेगिस्तान 
                            जेठ की दोपहरी 
                              खेजड़ी के ठूँठ की 
                                  धूप न छाँव 
                               दुबककर बैठी आस्था 
                            उम्मीद के दामन को लपेटे 
                           दोपहरी ढलने का इंतजार 
                            चाँदनी रात की मनुहार 
                            चंद क़दम अस्तित्त्व का छोर  
                              मन में सुलग रही यही कोर 
                             महके गुलिस्ता हो एक नई  भोर |
             
                                        - अनीता सैनी 

                                

               

सोमवार, नवंबर 19

दुआ बन जाती है माँ


                         
                                  
                    
                          सज्दे  में  झुका  शीश,
                          दुआ  बन  जाती  है माँ
                          ज़िंदगी   के  तमाम  ग़म, 
                          सीने  से लगा  भुला  देती माँ
                         चोट  का  मरहम,  दर्द  की  दवा,
                         सुबह की  गुनगुनी  धूप  है माँ
                         वक़्त-बे-वक़्त  हर  गुनाह  धो  देती, 
                         नाजुक़  चोट  पर  रो  देती  है  माँ
                         नाज़ुक  डोरी  से   रिश्तों   को  सिल  देती,
                        उन्हीं  रिश्तों  में  सिमट  जाती  है  माँ 

                                           -अनीता सैनी

गुरुवार, नवंबर 15

मैं अपने घर का मेहमान

                           
  मुस्कुराता  चेहरा,आँखें  बोल  गयीं  
    वक़्त का मेहमान,तुम्हारा ग़ुलाम  बन गया 

    दहलीज़  का  सुकून,मेरे  नसीब  से खेल गया
   घर  अनजान, सरहद  जान  बन  गयी

   तेरी यादों  का धुआँ ,मेरी  पहचान  बन  गयी  
   तरसती  हैं  निगाहें,  ऐसे  मेहमान  बन  गया 

   समेट ली सभी  हसरतें, दिल  के सभी जल गये
  जिंदगी  ख़ाली  मकान, तन्हाइयाँ  जान  बन  गयी | 

   घर  के  मेहमान, ज़िंदगी  के  मुसाफ़िर बन गये,
 तुम्हारा गुनहगार, देश का  पहरेदार  बन गया |

  -अनीता सैनी 

शनिवार, नवंबर 3

ख़्वाहिश - ए - ताबीर

                                          
                                              
                         

ख़्वाबों  की  नगरी, ख़ुशियों   की   बौछार ,
जहाँ   हो   ऐसा,  न  हो  ग़मों  का  किरदार |

आँगन   की   ख़ामोशी,   चौखट  की  पुकार , 
ना -मुराद इश्क़  करवाता रहा इंतज़ार |


ख़्वाहिशों   की    ताबीर   में   बसर   हुआ   हर   पहर ,
आँखों  में  तैरते  ख़्वाब  झलकते   दिल  के  पार |

फ़ौला  फ़ज़ा   में  प्यार ,   मौसम   भी   ख़ुशगवार, 
ज़िंदगी   में  रही  मायूसी, नसीब में  नहीं तुम्हारा प्यार |

नील   वियोग  में   फ़ज़ा ,   नीलाअंबर  भी   हारा ,
ताक    रही    टहनियाँ,   वादियों   ने    पुकारा |

                           -अनीता सैनी 

सोमवार, अक्तूबर 29

व्याकुल मन कि पुकार

                                                

कण-कण  में   गूँज  रही,
व्याकुल  मन  की   पुकार |

हर   पत्थर   सुना   रहा,  

प्रेम   भक्ति   का    सार |

अविरल   बहती   भक्ति,

जग   का   करे   उद्धार |

उर   से    उलझी    पीड़ा, 

सुलझी   कान्हा   के  द्वार |

प्रीत  पथ  पर   झूमे  जीवन, 

छिटका   द्वेष   का   द्वार |

सुख   वैभव  परित्याग  किया,

मिला   प्रेम   भक्ति   का   द्वार |

वक़्त    में    सिमटी   गाथा,
तड़पती    हृदय    के   पार  |

       -अनीता सैनी