रविवार, 2 दिसंबर 2018

उलझन धरा की




मुद्दतों  बाद निकली जब घर से, 
ख़ामोशी में सन्नाटा पसरा पड़ा,  
वट वृक्ष अश्रु बहा रहे,  
धरा भी  उलझन  में  खड़ी |

मोहब्बत से आबाद जहां,  
तिनका तिनका बिख़र रहा,  
कभी हरा भरा रहा आँचल,  
बेबसी में  आज  सूखा पड़ा |

मानव  बन हमदर्द,  
दर्द को आग़ोश में भर, 
कुछ क़दम भी न चला,  
सज़दे में झुका सर और रो पड़ा,  
बिछा दर्द का दरिया,  
धरा को बहला रहा,  
प्रेम की आड़ में 
गुनाह अपना छुपाये  खड़ा | 

- अनीता सैनी 

8 टिप्‍पणियां:

अमित निश्छल ने कहा…

मोहब्बत से आबाद जहाँ
तिनका तिनका बिख़र रहा
कभी हरा भरा रहा आँचल
बेबसी में आज सूखा पड़ा
अपरिमित दर्द का अहसास कराती पंक्तियाँ।

लोकेश नदीश ने कहा…

बहुत उम्दा अभिव्यक्ति

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय
सादर

Sweta sinha ने कहा…

अरे वाहह्हह... अति सुंदर..सार्थक सृजन👍👍

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार प्रिय श्वेता दी
सादर

मन की वीणा ने कहा…

हृदय स्पर्शी रचना बहुत गहरा प्रभाव छोड़ती रचना।

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार प्रिय कुसुम दी जी
सादर