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रविवार, दिसंबर 2

उलझन धरा की




मुद्दतों  बाद निकली जब घर से, 
ख़ामोशी में सन्नाटा पसरा पड़ा,  
वट वृक्ष अश्रु बहा रहे,  
धरा भी  उलझन  में  खड़ी |

मोहब्बत से आबाद जहां,  
तिनका तिनका बिख़र रहा,  
कभी हरा भरा रहा आँचल,  
बेबसी में  आज  सूखा पड़ा |

मानव  बन हमदर्द,  
दर्द को आग़ोश में भर, 
कुछ क़दम भी न चला,  
सज़दे में झुका सर और रो पड़ा,  
बिछा दर्द का दरिया,  
धरा को बहला रहा,  
प्रेम की आड़ में 
गुनाह अपना छुपाये  खड़ा | 

- अनीता सैनी 

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत उम्दा अभिव्यक्ति

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  2. सहृदय आभार आदरणीय
    सादर

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  3. अरे वाहह्हह... अति सुंदर..सार्थक सृजन👍👍

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  4. हृदय स्पर्शी रचना बहुत गहरा प्रभाव छोड़ती रचना।

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    1. सस्नेह आभार प्रिय कुसुम दी जी
      सादर

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