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रविवार, मार्च 31

पाती


पाती / अनीता सैनी 

३०मार्च २०२४

……

उस दिन पथ ने 

पथिक को पाती लिखी 

बेमानी लिखी न झूठ  

सावन-भादो के गरजते बादल 

सुबह की गुनगुनी धूप लिखी 

मीरा के जाने-पहचाने पदचाप 

 बाट जोहती आँखें 

वही विष  के प्याले लिखे

पनिहारिन के पायल की आवाज़ 

कुछ काँटे कुछ पत्थर लिखे

थोड़े फूल और थोड़ी छाँव लिखी 

और लिखा 

स्मृतियों का पाथेय प्रतीक्षा को

प्रेम के गहरे रंग में रंग देता है 

तुम प्रमाण मत देना

क्योंकि जितनी झाँकती है प्रीत

किवाड़ों और खिड़कियों से 

उतनी ही तो नहीं होती

मौन ने भी लिखे हैं कई गीत 

कई कविताएँ लिखी हैं अबोलेपन ने भी।

शुक्रवार, मार्च 1

खरोंच


खरोंच /  कविता / अनीता सैनी

…….

हम दोनों ने

उदय होते सूरज को प्रणाम किया

दुपहरी होते-होते वहाँ से निकल गए 

हमारा चले आना उनके लिए वरदान था 

साँझ सफ़र में कई-दफ़'आ मिली 

 हमने रात नहीं देखी

रात के लुभावने रेखाचित्र देखे

उसने कहा-

“कभी मिलना हो रात्रि से

तब तुम ठहर जाना

शीतलता की गोद 

उजाले का प्रमाण है वह।”

रात का भान भूल चुकी  मैं 

हमेशा उससे दुपहरी का ज़िक्र करती 

दुपहरी मेरे रग-रग में बसी थी 

जैसे बसा था मेरे हृदय में देहातीपन

मैंने कहा-

“देहाती स्त्रियाँ धतूरे-सी होती हैं 

वह सिर्फ़

कविता-कहानियों में तलाशी जाती हैं।”

धतूरे के ज़िक्र से उसे

महाशिवरात्रि का स्मरण हो आया

समर्तियों की उड़ती धूल, किरकिरी

उसकी आँखों में रड़कने लगी 

सहसा मुझे ख़याल आया

वह मरुस्थल में रहने का आदी नहीं था।