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रविवार, नवंबर 24

यों न सितारों की माँग कर



तल्ख़ियाँ तौल रहा तराज़ू से ज़माना,  
नैतिकता क्षणभँगुर कर हसरतें हाँकता रहा,    
 समय फिर वही दौर दोहराने लगा,  
हटा आँखों से  वहम की पट्टी,
 फ़रेब का शृंगार जगत् सदा करता रहा |

 संस्कारों में है सुरक्षित आज की नारी,  
 एहसास यही वक़्त को लगता है भारी,  
वर्जना को बेड़ियाँ बता वो तुड़वाता रहा,  
संभाल अस्मिता अपनी ऐ वर्तमान की नारी |

स्वार्थ के लबादे में लिपटी है  हर साँस,  
धुन प्रगति की है उस पर  सवार, 
मिलकर तो देख एक पल  प्रकृति से,
 किया कैसे है उसे नीस्त-नाबूद, 
प्रपंच प्रखर हैं इस लुभावने सन्नाटे के,
इसके प्रभाव को परास्तकर, 
तलाश स्थिर अस्तित्त्व अपना, 
संघर्ष में छिपा है तुम्हारा वजूद  |

आत्मबल से बढ़कर न कोई साथी, 
राह सृजितकर हाथों में रख कर्म की पोथी ,  
मिली है जीवन में संस्कारों की जो विरासत, 
 नादानी में उसे न ग़ुमनाम कर,  
मिला है जो अनमोल ख़ज़ाना संस्कृति से हमें ,
सहेज जीवन मूल्यों की समृद्ध सुन्दर थाती,   
यों न सितारों की माँग कर |

©अनीता सैनी