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शनिवार, मई 7

संकेत


यों ही अकारण, अकस्मात 

चैत्र-बैसाख महीने के अंबर में

दौड़ती बिजली का कौंधना

गरजते बादलों का झुंड में बैठ

बेतुकी बातों को तुक देते हुए

भेद-भाव भरी तुकबंदियाँ गढ़ना 

यही खोखलापन लीलता है

खेजड़ी के वृक्ष से सांगर

उनकी जगह उभरती गठानें 

खेजड़ी का  ठूँठ में बदलना 

शक्ति प्रदर्शन का अति विकृत रूप 

दरख़्त की छेकड़ से फूट-फूटकर बहना 

प्रकृति का असहनीय पीड़ा को

भोगी बन भोगते ही जाना 

संकेत हैं धरती की कोख में 

मानवता की पौध सूखने का।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

16 टिप्‍पणियां:

  1. प्रकृति का असहनीय पीड़ा को

    भोगी बन भोगते ही जाना

    संकेत हैं धरती की कोख में

    मानवता की पौध सूखने का।
    बहुत सुंदर और सार्थक सृजन सखी।

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  2. प्रकृति का असहनीय पीड़ा को
    भोगी बन भोगते ही जाना
    संकेत हैं धरती की कोख में
    मानवता की पौध सूखने का।
    वाह !! बहुत सुन्दर संदेश ! सुन्दर और सार्थक सृजन ।

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  3. बेनामी7/5/22, 5:59 pm

    चैत्र-बैसाख महीने के अंबर में
    दौड़ती बिजली का कौंधना... वाह! इसी से सांगर के फूलों में गठानें पड़ जाती है।
    शक्ति प्रदर्शन के अति विकृत रूप... से समाज दलदल में समाता है... गहन भावों की अभिव्यक्ति।
    सराहनीय ब्लॉग।

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  4. ओह ह्रदय स्पर्शी गहन भाव,सुंदर सन्देश देती रचना |

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  5. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (8-5-22) को "पोषित करती मां संस्कार"(चर्चा अंक-4423) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    ------------
    कामिनी सिन्हा

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  6. गहरे अर्थों को समेटे धरती माता की व्यथा को स्वर देती कविता।

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  7. सही कहा आपने। धरती की कोख में मानवता की पौध सूखने देने से बचना है तो प्रकृति को समझना ही होगा।

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  8. गहरा चिंतन। बहुत अच्छी कविता है चैत्र-बैसाख के गरजते बादलों से समाज में घटने वाली घटनाओं से जोड़ना बढ़िया रहा। बाक़ी आप जानो।

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  9. सही चिंतन जो चिंता का विषय है न जाने प्रकृति की पीड़ा कब हमारे अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह बंध जाएं।
    गहन भाव, संवेदनाओं से ओतप्रोत।

    शक्ति प्रदर्शन का अति विकृत रूप
    दरख़्त की छेकड़ से फूट-फूटकर बहना
    प्रकृति का असहनीय पीड़ा को
    भोगी बन भोगते ही जाना ।
    अप्रतिम सृजन।

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  10. बंध को बन पढ़े कृपया।

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  11. बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति

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  12. ह्रदय स्पर्शी सुंदर सन्देश देती रचना |

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  13. कौन सोचता है प्राकृति की पीड़ा को ...
    असंवेदनशील हो गए हैं सब ... स्वार्थ हावी है हर चीज़ पर ...

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  14. प्रकृति की असहनीय पीड़ाओं को सार्थक शब्द दिया है। मर्मस्पर्शी सृजन।

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  15. मानवता अगर जड़ से सूखेगी नहीं तो दरिंदों का चमन कैसे फल-फूल पाएगा?

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  16. भावों का शब्दों में बढ़िया रूपांतरण।

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