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गुरुवार, मई 12

विरह



समय का सोता जब 
धीरे-धीरे रीत रहा था 
मैंने नहीं लगाए मुहाने पर पत्थर
न ही मिट्टी गोंदकर लगाई 
भोर घुटनों के बल चलती 
दुपहरी दौड़ती 
साँझ फिर थककर बैठ जाती 
दिन सप्ताह, महीने और वर्ष
कालचक्र की यह क्रिया 
 स्वयं ही लटक जाती 
अलगनी पर सूखने 
स्वाभिमान का कलफ अकड़ता 
कि झाड़-फटकार कर
रख देती संदूक के एक कोने में
प्रेम के पड़ते सीले से पदचाप  
वह माँझे में लिपटा पंछी होता 
विरक्ति से उनमुख मुक्त  करता
मैं उसमें और उलझ जाती 
कौन समझाए उसे 
सहना मात्र ही तो था 
ज़िंदगी का शृंगार
विरह मुक्ति नहीं 
इंतज़ार का सेतु चाहता था।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


16 टिप्‍पणियां:

  1. बढिया रचना शुभकामनाएं

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  2. प्रेम के पड़ते सीले से पदचाप
    वह माँझे में लिपटा पंछी होता
    मुक्ति से अनजान मुक्त स्वयं से करता


    बेहतरीन रचना

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  3. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति, अनिता दी।

    जवाब देंहटाएं
  4. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १३ मई २०२२ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  5. कमाल की अभिव्यक्ति।

    जवाब देंहटाएं
  6. कौन समझाए उसे
    सहना मात्र ही तो था
    ज़िंदगी का शृंगार
    विरह मुक्ति नहीं
    इंतज़ार का सेतु चाहता था।---सुंदर रचना

    जवाब देंहटाएं
  7. मन न जाने कहाँ कहाँ भटकता है । धैर्य ही रख कर इंतज़ार करना होता है । गहन अभिव्यक्ति ।

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  8. बहुत सुन्दर रचना👌👌

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  9. सुन्दर एवं भावपूर्ण गद्य-गीत !

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  10. डॉ विभा नायक14/5/22, 1:54 pm

    👌👏👏👏🌹🌹🌹

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  11. अंतर के दर्द को उकेरती हृदय स्पर्शी पंक्तियाँ

    विरह मुक्ति नहीं
    इंतज़ार का सेतु चाहता था।

    गज़ब !
    आद्रता समेटे विरह श्रृंगार।

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  12. बेनामी15/5/22, 8:51 am

    ब्लॉग पर मिले विरह में पगे भाव। उत्कृष्ट रचनाओं का तांतां।
    भावों से उबरे जीवन वैराग्य में डूब जायेगा।
    बधाई स्वीकारे आदरणीया।

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  13. शायद कभी राधा और मीरा ने भी यही कहा हो.... हृदह को भेदती हुई ....बहुत ही सुन्दर सृजन।

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