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गुरुवार, सितंबर 1

स्वेटर



” औरत हो! कभी अपने हृदय में झाँककर

अपने अंदर की औरत से भी मिल लिया करो 

पूछ लिया करो! दुख-दर्द उसके भी।”


कहते हुए-

उसांस के साथ हाथ बढ़ाएँ 

 और सीने से लगा लिया।


कुछ समय पश्चात चुपचाप उठकर चला गया।

कहते हुए-

”ख़याल रखना, जल्दी मिलते हैं।”


वह नहीं बोलता कभी

आँखें ही बोलती हैं उसकी

 एक छोर भी न पकड़ा और 

वर्षों से बुना

शिकायतों का स्वेटर एक पल में उधेड़ गया।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

26 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! संवेदना से सराबोर सुंदर रचना।

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २ सितंबर २०२२ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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    उत्तर
    1. हृदय से आभार मंच पर स्थान देने हेतु।

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  3. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार 02 सितंबर 2022 को 'रोता ही रहता है मेरे घर का नल' (चर्चा अंक 4540) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। 12:01 AM के बाद आपकी प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

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    उत्तर
    1. हृदय से आभार सर मंच पर स्थान देने हेतु।

      हटाएं
  4. 'शिकायतों का स्वेटर एक पल में उधेड़ गया' - यह पंक्ति लाजवाब है। भावों से भरी इस रचना के लिए आपको बहुत-बहुत बधाईयां।

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  5. वाह ! कोमल भावनाओं से बुनी सुंदर रचना !

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  6. शिकायतों का स्वेटर ...... अप्रतिम उपमा । संवेदनशील रचना ।।

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    1. हृदय से आभार आदरणीया संगीता दी जी।
      सादर

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  7. कोमल भावों से सजी संवेदनशील रचना । बहुत सुन्दर सृजन ।

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  8. बेहतरीन अभिव्यक्ति

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  9. बेनामी13/9/22, 10:54 pm

    वाह! जी वाह! कमाल की लेखनी है।

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  10. बस एक प्रेमिल स्पर्श .… सब उघड़ जाता है। सुन्दर अभिव्यक्ति।

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    1. जैसे मर्म को छू लिया हो बहुत सुंदर एहसास।
      हृदय से आभार दी

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