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शनिवार, नवंबर 27

तर्कशील औरतें

वक़्त-बेवक़्त
समय को बारंबार 
स्मरण करवाना पड़ता है 
कि तर्कशील औरतों ने
भटकाव को पहलू में
बिठाना छोड़ दिया है। 

लीक पर चलना
सूरज के इशारे पर
छाँव की तलाश में 
पेड़ की परिक्रमा करना 
सामाजिक वर्जनाओं को
धारण करना भी छोड़ दिया है। 

रहस्य में डूबी
संस्कार रुपी रंगीन पट्टियों का 
 आँखों पर आवरण नहीं करती 
अंधी गलियों में
लकड़ी के सहारे विचरती रूढ़ियों ने 
तर्कशील औरतों को 
बातों में उलझना भी छोड़ दिया  हैं।

उपेक्षाओं के परकोटे को तोड़ 
रिक्तता की अनुभूति उन्हें 
ऊर्जावान
और अधिक ऊर्जावान बनाती है।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

28 टिप्‍पणियां:

  1. उपेक्षाओं के परकोटे को तोड़
    रिक्तता की अनुभूति उन्हें
    ऊर्जावान
    और अधिक ऊर्जावान बनाती है।
    वाह !!
    सुन्दर कृति ॥

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    उत्तर
    1. आभारी हूँ आदरणीय मीना दी जीनोबल बढ़ाती सरगर्भित प्रतिक्रिया हेतु। स्नेह आशीर्वाद बनाए रखें।
      सादर

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  2. आपने इस कविता के माध्यम से औरत के जुझारू रूप का सुंदर चित्रण किया है।

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    उत्तर
    1. आभारी हूँ आदरणीय नितीश जी आपकी प्रतिक्रिया सर मेरा उत्साह द्विगुणित हुआ।
      सादर

      हटाएं
  3. वाह!बहुत सुंदर।
    हवा के एक झोके के साथ बरसी बुँदे बहुत कुछ कह गयी।
    तर्क जरूरी है।

    जवाब देंहटाएं
  4. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (29 -11-2021 ) को 'वचनबद्ध रहना सदा, कहलाना प्रणवीर' (चर्चा अंक 4263) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। रात्रि 12:01 AM के बाद प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

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    उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया सर चर्चा मंच पर स्थान देने हेतु।
      सादर

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  5. बहुत सुंदर सटीक।
    अब नारियों को भाव अभिव्यक्त करने का साहस आ गया है, बुद्धिजीवी तर्क भी नारी उत्थान और समाज की उन्नति के लिए संजीवनी हैं।
    सस्नेह सार्थक सृजन।

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    उत्तर
    1. आभारी हूँ आदरणीय कुसुम दी जी आपकी समीक्षा मेरा संबल है। स्नेह आशीर्वाद बनाए रखें।
      सादर

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  6. बहुत सारगर्भित और सुंदर । वाकई अपनी हर उलझन सुलझाने मे कामयाब है आज की औरतें, उन्होंने अपने को बहुत सशक्त किया है । सुंदर सराहनीय रचना ।

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    उत्तर
    1. आभारी हूँ आदरणीय जिज्ञासा दी जी आपकी प्रतिक्रिया से मेरा उत्साह द्विगुणित हुआ।
      आशीर्वाद बनाए रखें।
      सादर

      हटाएं
  7. उम्दा अभिव्यक्ति ! समय बदल रहा है

    जवाब देंहटाएं
  8. उपेक्षाओं के परकोटे को तोड़
    रिक्तता की अनुभूति उन्हें
    ऊर्जावान
    और अधिक ऊर्जावान बनाती है।
    बिल्कुल सही कहा आपने!अब अधिकतर महिलाएँ बेचारी बनना नहीं बल्कि सशक्त बनना पसन्द करती हैं!
    बहुत ही उम्दा रचना!

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    उत्तर
    1. आभारी हूँ प्रिय मनीषा जी आपकी प्रतिक्रिया मेरा संबल है। बहुत सारा स्नेह आपको।
      सादर

      हटाएं
  9. बहुत बढियां अभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं
  10. उत्तर
    1. आभारी हूँ आदरणीय उर्मिला दी जी आपकी प्रतिक्रिया से मेरा उत्साह द्विगुणित हुआ।
      आशीर्वाद बनाए रखें।
      सादर

      हटाएं
  11. तर्कशील ओरतें ...
    खुद से सम्वाद करती, अपनी जगह बनाती बहुत कुछ करती और छोडती हैं ... पर अपनी जगह बनाती अहिं ... संघर्ष लम्बा होता है पर सफल होता है ... आपकी रचनाओं की धार पैनी हो रही है ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आभारी हूँ आदरणीय सर मनोबल बढ़ाती सारगर्भित हेतु। आशीर्वाद बनाए रखें।
      सादर

      हटाएं
  12. तर्कशील औरतों ने
    भटकाव को पहलू में
    बिठाना छोड़ दिया है।
    सही कहा समय की माँग भी यही थी फिर औरतें कब तक भटकती...आज की नारी अपनी परिभाषा आप ही गढ़ रही है

    संस्कार रुपी रंगीन पट्टियों का
    आँखों पर आवरण नहीं करती
    बहुत सटीक एवं सारगर्भित सृजन
    वाह !!!

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    उत्तर
    1. आभारी हूँ आदरणीय सुधा दी जी आपकी प्रतिक्रिया से उत्साह द्विगुणित हुआ।
      आपको बहुत सारा स्नेह

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  13. बहुत ख़ूब !
    हमारी स्वयं-सिद्धा नायिकाओं को लीक, परंपरा और तथाकथित लाज-लज्जा-शील-सतीत्व-मर्यादा की पुरुष-निर्मित अवधारणाओं को तोड़ना ही होगा.

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हार्दिक आभार आदरणीय सर आपकी प्रतिक्रिया सृजन को सार्थक बनाती है। अत्यंत हर्ष हुआ मेरा
      उत्साह द्विगुणित हुआ। आशीर्वाद बनाए रखें।
      सादर

      हटाएं