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मंगलवार, 12 मार्च 2019

विरह गीत




                                                           

प्रीत री  लौ जलाये  बैठी 
धड़कन  चौखट लांघ  गई  
धड़क  रहो  है  हिवड़ो बैरी 
हृदय    बेचैनी   डोल   रही 


रुठ   रही  है  खुशियाँ  पीउजी 
  गौरी    हँसना   भूल  गई 
अब  पधारो  पिया   प्रदेश 
गौरी   थारी  बोल   रही 


अब के फ़ागुन लौट आवों तुम 
झील  सी  अंखियां   रीत   गई 
ओढ़े   बैठी  प्रीत  री  चुनड़ 
हाथों   में   मेहंदी  घोल  रही 


बह  गया   काजल आँखों  का 
दर्द   में   अंखियां   डूब   गई 
सिसक   रहे  घर  द्वार  पीउजी 
  सांसें   धीरज  तोल  रही |

         - अनीता सैनी

36 टिप्‍पणियां:

  1. अति सुन्दर पति वियोग में नारी वेदना का हार्दिक वर्णन

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    1. सहृदय आभार आदरणीय नारायण की
      सादर नमन

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति सखी

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  3. उत्तर
    1. सहृदय आभार आदरणीय विश्वमोहन जी
      सादर नमन

      हटाएं
  4. आज सलिल वर्मा जी ले कर आयें हैं ब्लॉग बुलेटिन की २३५० वीं बुलेटिन ... तो पढ़ना न भूलें ...

    तेरा, तेरह, अंधविश्वास और ब्लॉग-बुलेटिन " , में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. सहृदय आभार आदरणीय ब्लॉग-बुलेटिन में मुझे स्थान देने के लिए
      सादर नमन

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  5. वाह बहुत सुन्दर सखी मारवाड़ी शब्दों का बहुत सुंदर प्रयोग
    कविता के भाव मुखरित करते ।
    सोणी है चोखी है।

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    1. सस्नेह आभार सखी
      थान घणों घणों राम राम 🙏🙏

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  6. अंतस को छूती बहुत सुंदर प्रस्तुति..

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  7. राजस्थान की माटी की भीगी सी महक लिए मनमोहक कृति ! अप्रतिम रचना सखी !

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  8. बह गया काजल आँखों का
    दर्द में अंखियां डूब गई
    --------------------------

    क्या बात है क्या बात है। हर पंक्ति लाजवाब। सादर।

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  9. वाह !!! बहुत खूब सखी ,विरहन के दर्द को बाखूबी शब्दों में पिरोया है.....

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  10. बहुत सुन्दर अनीता जी ! बिरहिन की पीड़ा, उसकी आतुर-प्रतीक्षा और पिया-संग होली खेलने की उसकी उत्कट अभिलाषा का सजीव और सुन्दर चित्रण किया है आपने. भाषा में आंचलिकता का पुट इस कविता को और भी सुन्दर बना देता है.

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  11. सस्नेह आभार आदरणीया पम्मी जी
    सादर नमन

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  12. अब के फ़ागुन लौट आवों तुम
    झील सी अंखियां रीत गई
    ओढ़े बैठी प्रीत री चुनड़
    हाथों में मेहंदी घोल रही .....
    जी बहुत सुंदर ।

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    1. जी आप ने पढ़ी रचना लिखना सार्थक हुआ
      बहुत सा स्नेह आप को
      आभार
      सादर

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  13. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  14. अब के फ़ागुन लौट आवों तुम
    झील सी अंखियां रीत गई
    ओढ़े बैठी प्रीत री चुनड़
    हाथों में मेहंदी घोल रही
    बहुत ही मर्मस्पर्शी सृजन प्रिय अनीता | प्रियतम की प्रतीक्षा में रत मन की चातक सरीखी पुकार और मनुहार मन को छू जाती है | पर --
    निष्ठुर प्रियतम ना जाने सखी
    इस हिय की विरहा पीर
    पल-पल छलके नैन गागरी
    ना कोई आन बंधावे धीर
    दिन बीते ये रैन कटे ना
    कंठ रुंधे बोल ना आवे
    फागुन आया ना आये साजन
    मोहे साज सिंगार ना भावे
    फूल खिले ये मन मुरझाया
    कोयल कूके दे जियरा चीर
    सुध बुध रही ना अपने तन की
    फिरूं खोई विकल अधीर
    सस्नेह बधाई इस भावपूर्ण सृजन के लिए

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    उत्तर
    1. सस्नेह आभार सखी
      होली की हार्दिक शुभकामनायें बहन
      बहुत ही सुन्दर टिप्णी के साथ उत्साहवर्धन बहन
      सादर

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आदरणीय/आदरणीया, स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद,