शनिवार, 17 अगस्त 2019

हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम



हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम,
पीढ़ियों से अर्जित संस्कारों की शबनम हैं हम |

  सजा इन्हीं का मुकुट,  
शीश  पर ,
हया का ओढ़ा  है  घूँघट 
मन  पर ,
छलकाती हैं करुणा,
नित नभ नूतन पर,
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम |

 रस्म-ओ-रिवाज के नाज़ुक बँधन से,
 बँधे  हैं  हमारे  हर बँधन,
मातृत्व को  धारणकर ,
ममता को निखारा है हमने , 
धरा-सा कलेजा ,
सृष्टि-सा रुप निखारा है हमने,
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम |

हम पर टिका है, 
नारी के नारीत्व का विश्वास,
अच्छे होने का उठाया है बीड़ा,
हमने  अपने सर, 
मान देती हैं  मर्यादा को,
परम्परावादी विशुद्ध प्रेम, 
  परिवार पहला  दायित्व  है हमारा, 
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम |

 कँधों पर हमारे  टिका है, 
समाज की अच्छाई का स्तम्भ,
हृदय जलाकर दिखाती हैं,
रौशनी समाज के भविष्य को, 
त्याग के तल पर जलाती हैं,
 दीप स्नेह का ,
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं  हम |

अच्छा लगता है ,
हमें रिश्तों में घुल-मिल जाना ,
नहीं अच्छा लगता,   
मन से बेलगाम हो जाना,
देख  रही  हैं   हम,
 बेलगाम  मन  का अंजाम,
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं  हम |

#अनीता सैनी 

50 टिप्‍पणियां:

Unchaiyaan.blogpost.in ने कहा…

हां अच्छी लड़कियां हैं हम ,कंधों पर टिका है
समाज की अच्छाई का स्तम्भ,हृदय जलाकर दिखाती हैं
रोशनी समाज के भविष्य को ......बेहतरीन प्रस्तुति

मुकेश सैनी ने कहा…

वाह क्या खूब लिखा है

Meena Bhardwaj ने कहा…

अभिभूत हूँ इस सृजन को पढ़ कर ..गरिमामयी और उत्कृष्ट भावाभिव्यक्ति अनु ।

मन की वीणा ने कहा…

समाज में संतुलन बनाए रखने के लिए ये अच्छी लड़कियां सदा त्याग और संयम से अच्छे वातावरण का निर्माण करती हैं ।
बहुत सुंदर लिखा है आपने
पुरूषों से होड़ के चक्कर में सदा उनकी जद्दोजहद नजर अंदाज करते हुवे नारी हमेशा अपने ही दुखों को सर्वोपरि कर देखती रही है पर आपकी यह रचना संयम का सुंदर संदेश दे रही है ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (19-08-2019) को "ऊधौ कहियो जाय" (चर्चा अंक- 3429) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 18 अगस्त 2019 को साझा की गई है........."सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद

Subodh Sinha ने कहा…

नहीं अच्छा लगता बेलगाम हो जाना,
देख रही हैं हम,
बेलगाम होने का अंजाम,
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम | ... अक़्सर "बेलगाम" होने को ही आज़ादी और आधुनिकता का मापदण्ड माना जाता है।
कई दफ़ा तो भले तन सामाजिक घूँघट में होता है , पर मन बेलगाम मटरगश्ती करता है और उसे आज़ादख्याली का ज़ामा पहना दिया जाता है।
ये बस मेरी सोच भर ही है शायद ....

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार दी जी
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

आभार आभार का
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

तहे दिल से आभार दी |उत्साहवर्धन के लिए
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

तहे दिल से आभार कुसुम दी जी |आप की समीक्षा सार्थकता होती |निष्पक्ष दृस्टि कोण के लिए |आभार आप का
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय चर्चा मंच पर स्थान देने के लिए
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार दी रचना को मुखरित मौन स्थान देने के लिए
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय उत्साहवर्धन के लिए |आप की समीक्षा हमेशा अनमोल होती है |ज्यादा कुछ नहीं जानती बस कल एक रचना पढ़ी थी |उस का प्रति उतर देने के मन हुआ |सब के अपने कायदे क़ानून है अपनी सोच है |उसी के साथ अपनी राह चुनते है |
बहुत बहुत शुक्रिया आप का अनमोल विचार साजा करने के लिए |
सादर

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा ने कहा…

बेहतरीन कृति । लड़कियों को प्रेरित करती और समाज को संबोधित सुंदर लेखन।

अमित निश्छल ने कहा…

अद्भुत सृजन। आपकी इस रचना की जितनी भी प्रशंसा की जाय, कम है दीदी। एक-एक शब्द भावानुभूतियों में ऐसा पिरोया है, महसूस हो रहा कि काव्यात्मक रचना नहीं यथार्थतः जीवंत देख रहा हूँ। अनुपम कृति। सादर नमन है आपको🙏🏻🙏🏻🙏🏻।

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय |आप की समीक्षा से रचना में निखार आया
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार अनुज |आप की समीक्षा से रचना को नया आयाम मिला |हमेशा ख़ुश रहो
सादर

दिगंबर नासवा ने कहा…

समाज से पूछे या स्वयं के मन में उठते कुछ प्रश्न ... उत्तर जिनका कहाँ छुपा है ... समय के गर्भ में ... या इन लड़कियों के मन में ...
बहुत लाजवाब ... अनुपम भाव समेटे कमल की रचना ...

Alaknanda Singh ने कहा…

परम्परावादी विशुद्ध प्रेम,
परिवार पहला दायित्व है हमारा,
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम |...बहुत खूब ल‍िखा अनीता जी... अभी बहुत कुछ कहना बाकी है ... ल‍िखते जाइये ... बहुत खूब

Neeraj Kumar ने कहा…

वाह... बेहतरीन रचना !

deepshikhaaj ने कहा…

बहुत प्यारी रचना सखी।

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत-बहुत शुक्रिया सर
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार बहना
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

शुक्रिया सर
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार बहना
सादर

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन हर एक पल को अमर बनाते हैं चित्र - विश्व फोटोग्राफी दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में गुरुवार 22 अगस्त 2019 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत सुंदर रचना
उम्दा अभिव्यक्ति

Sudha devrani ने कहा…

रस्मोरिवाज के नाज़ुक बँधन से,
बँधे हैं हमारे हर बँधन,
मातृत्व को धारणकर ,
ममता को निखारा है हमने ,
धरा-सा कलेजा ,
सृष्टि-सा रुप निखारा है हमने,
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम |
आधुनिकता और पाश्चात्य से प्रेरित आज नारी अपनी इस विशिष्टता को खोती नजर आ रही है....
बहुत ही लाजवाब सृजन है आपका अनीता जी
ये सब अच्छाइयां ही नारी को विशिष्ट बनाती है

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

बहुत सुंदर !

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया सर
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत अच्छा लगता है दी जब आप से सराहना मिलती है
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार प्रिय दी जी
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय
सादर

गोपेश मोहन जैसवाल ने कहा…

अच्छी लड़कियों !
कभी-कभार अपने बारे में भी सोच लिया करो,
कभी बाग़ में तितली बन कर फूलों की महक ले लिया करो.
कभी पंछी बनकर खुले आसमान में उड़ लिया करो.
कभी त्याग-बलिदान, समर्पण, ममता, कर्तव्य और बंधन जैसे भारी-भरकम शब्दों से मुक्त होकर भी देखो और सपने देखने से परहेज़ मत करो.
ऐसे दो-चार लम्हे जी लेने में क्या हर्ज़ है?
तुम प्रायिश्चित करके फिर से अच्छी लड़की बन जाना.

विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा…

सिक्के का दो रुख... आपकी टिप्पणी समाज/व्यवस्था पर अच्छा व्यंग्य है ... जहाँ शोषित है नारी वहाँ उसे अपनी बेड़ियों को जरूर तोड़ देना चाहिए... जहाँ खुश है वहाँ बंधन कैद नहीं लग सकता

सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सही कहा दी आप ने ख़ुशी के बँधन कैद नहीं होते जरुरी नहीं सभी को बँधन बेड़िया लगे |

विभा रानी श्रीवास्तव ने कहा…

सच में अच्छा होना आसान नहीं हो सकता... बस अच्छे होने का मान-सम्मान-स्नेह-अधिकार बना रहे...

अनीता सैनी ने कहा…

सुन्दर समीक्षा के लिए आभार सर
सादर

मन की वीणा ने कहा…

एक उच्च स्तरीय प्रस्तुति के लिए मेरे मनोभाव।
अच्छी लड़कियां ना बनाई जाती है, ना बनती है ,वो बस अंदर के संस्कारों से अच्छी होती है ।
वो जानती है कि उनकी ये अच्छाई सामाज और परिवार का शांति सूत्र है ,
वो क्षणिक सुख के लिए पुरे परिवार को दांव पर नहीं लगाती
वो जानती हैं अच्छी तरह त्याग ,सेवा ,समर्पण सहिष्णुता
सिर्फ आदर्श शब्द मात्र नहीं होते ये तो व्यवहार का शृंगार होते हैं ।जब आप अच्छे होते हो तो अपवाद स्वरूप ही कोई आपसे बुरा रहता है ।
हां अति हो तो ये इतनी भी कमजोर नहीं कि अपना अस्तित्व साबित न कर पाएं।
और अच्छाई कोई चुनरी नहीं कि कुछ देर उठा दो और जब चाहे प्रायश्चित कर फिर पहन लो।
और ना ये थोपा हुवा संबोधन है ये आत्मा से निकली आवाज है जो हमारे बुजुर्गो के मुंह से आशीर्वाद बन उन अच्छी लड़कियों का संबल है ।

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार प्रिये कुसुम दी जी
लाज़बाब समीक्षा
प्रणाम
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार आदरणीया विभा दी जी
प्रणाम
सादर

Anuradha chauhan ने कहा…

मान देती हैं मर्यादा को,
परम्परावादी विशुद्ध प्रेम,
परिवार पहला दायित्व है हमारा,
हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम |बेहतरीन प्रस्तुति सखी

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार दी जी
सादर

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

'हाँ हम अच्छी लड़कियाँ हैं हम' एक विचार है जो भारतीय जीवन दर्शन और जीवन शैली का शानदार रूप है। परंपरावादी सोच में समय-समय पर अनेक समयानुकूल परिवर्तन और संशोधन होते रहे हैं। समाज का ताना-बाना अपनी जड़ें मज़बूती से जमाये रखे इसके लिये ज़रूरी है आपकी इस कविता में व्यक्त किये गये विचारों को आत्मसात करना किया जाय।

मन मारकर अगर अच्छी लडकियाँ होने का यदि ढोंग किया गया हो तो मूल्य आधारित सामाजिक जीवन की मान्यताएँ पाखंडी नज़र आने लगती हैं अतः आज के विघटनकारी समाज में अच्छी लड़कियाँ होने का एहसास बनाये रखना एक गंभीर चुनौती है जिसे आपकी अभिव्यक्ति सकारात्मक रुख़ देती नज़र आती है।

वर्तमान परिवेश में भारत की लड़कियाँ इस दौर से गुज़र रही हैं कि पुरुषसत्ता से संचालित समाज में वे अपने लिये अनुकूल माहौल और जीवन के समस्त आयामों को कैसे खुलकर जियें। और अब ऐसा महसूस किया जाने लेगा है कि पितृसत्तात्मक समाज स्त्री को उसका समुचित स्थान देने का मन बनाने लगा है।

बहुत अच्छी समाजोपयोगी रखना है आपकी और भी लिखते रहिए ऐसे सामाजिक विषयों पर।

बधाई एवं शुभकामनाएँ।

sanu shukla ने कहा…

बहुत खूब कहा ...

अनीता सैनी ने कहा…

ब्लॉग पर आप का हार्दिक स्वागत है सुन्दर समीक्षा के लिये तहे दिल से आभार आप का
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सादर नमन सर
आपकी विस्तृत अर्थपूर्ण प्रतिक्रिया ने मेरे लेखन को जिस तरह सराहा है वह प्रशंसा से परे है, मुझे यह कविता लिखते समय अनुमान नहीं था कि आप जैसे प्रबुद्ध जनों का इतना अपार स्नेह और आशीर्वाद मिलेगा |
मेरी कोशिश होगी अपने लेखन में लगातार सुधार |
आप सबका सहयोग एवं समर्थन यों ही मिलता रहे |
सादर