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शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

ऐसा नहीं वक़्त सज्दे में झुका था




घटाओं के बदले तेवर,  
वे  तोहमत हवाओं पर लगाती थीं, 
दुहरा आसमां  झुका नहीं जज़्बातों से,   
वक़्त ने वक़्त से धोखा किया,वक़्त सज्दे में नहीं था |

गिरोह बना रहे  विश्व पटल पर, 
बादलों को बाँटने का वो दस्तूर  पुराना  था, 
संघर्ष के पड़ाव पर सूख जाती है विचारों की नमी, 
लम्हात को पता था वो भविष्य के दरिया में गहरा उतरा था |

आहट से बेख़बर वो बरबस मुस्कुराता बहुत था, 
कब किस राह से गुज़रेगा साँसों का कारवाँ,वो तारों से पूछता था,  
बेख़बर था वो देख जमघट काफ़िरो का, 
बुन रहा जाल ज़ालिमों के जलजले से,दोष उसी लम्हे का था |

हाहाकार हसरतों का सुना,बादलों के उसी दयार  में, 
 इंसानों के जंगल में भटके विचारों को हाँक रहा समय था, 
गूंगे-बहरों  की भगदड़ में फ़ाक़े बिताकर मर गया वह, 
ऐसा नहीं सज्दे में झुका था,जाने जलसा कब हुआ था ?

- अनीता सैनी 

26 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
    २३ सितंबर २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    1. सहृदय आभार श्वेता दी हमक़दम में मुझे स्थान देने के लिए
      सादर

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  2. गूंगे-बहरों की भगदड़ में फ़ाक़े बिताकर मर गया वह,
    ऐसा नहीं सज्दे में झुका था,जाने जलसा कब हुआ था ?

    लाजबाब.... सृजन सखी

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    1. बहुत बहुत आभार कामिनी दी सुन्दर समीक्षा के लिये |अपना सानिध्य यूँ ही बनाये रखे |
      सादर

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  3. संघर्ष के पड़ाव पर सूख जाती है विचारों की नमी,
    लम्हात को पता था वो भविष्य के दरिया में गहरा उतरा था |
    वाह!!!!
    बहुत लाजवाब ...

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    1. बहुत बहुत आभार सुधा दी मनोबल बढ़ाने के लिये, आप का साथ मेरे लेखन को निखारता है |
      स्नेह यूँ ही बनाये रखे
      सादर

      हटाएं
  4. वाह! एक विशिष्ट रचना जो विश्वस्तरीय चिंतन और मंसूबों पर हमारा ध्यान केन्द्रित करती है यह कहते हुए कि हम भेड़चाल से इतर अपना दिलोदिमाग़ भी इस्तेमाल करें ताकि भावी पीढ़ियों को सुनहला भविष्य सौंपा जा सके.
    कविता के शानदार बिम्ब चमत्कृत करनेवाले हैं. भाव, शब्द-विन्यास और भाषा-सौंदर्य में नवीनता और मौलिकता की ताज़गी महसूस की जा सकती है.
    बधाई एवं शुभकामनाएँ.
    लिखते रहिए.

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीय सुंदर समीक्षा हेतु |आप की समीक्षा हमेशा मेरा मनोबल बढ़ती है और सुंदर समीक्षा से रचना का मान बढ़ाने के लिये आप का तहे दिल से आभार सादर

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  5. बहुत ही लाजवाब! विराट विचारों का अद्भुत समन्वय, विचारोंत्तेजक रचना मंथन देती ।

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    1. ढेर सारा आभार कुसुम दी मनमोहक समीक्षा के लिये |
      आपकी प्रतिक्रिया मुझे दिशा दिखाती है |
      आप का स्नेह यूँ ही बना रहे...
      सादर

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  6. वक़्त ने वक़्त से धोखा किया,वक़्त सज्दे में नहीं था |
    ...वाह...भावों और शब्दों का लाज़वाब संयोजन।

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    1. सहृदय आभार आदरणीय उत्साहवर्धक समीक्षा के लिये |
      ब्लॉग पर आप का हार्दिक स्वागत है सर
      सादर

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  7. बहुत ही सुन्दर रचना सखी

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    1. सस्नेह आभार बहना उत्साहवर्धन समीक्षा हेतु
      सादर

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  8. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (25-09-2019) को    "होगा दूर कलंक"  (चर्चा अंक- 3469)     पर भी होगी। --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
     --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

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    1. सहृदय आभार आदरणीय चर्चामंच पर मुझे स्थान देने के लिए
      सादर

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  9. बहुत सुन्दर अनीता जी.
    दुष्यंत कुमार की बात को आपने अपने अंदाज़ से आगे बढाया है.

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीय गोपेश जी सुन्दर एवं उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु आप की समीका से रचना को प्रवाह मिला |निशब्द हूँ आप की सुन्दर समीक्षा से...
      आप का मार्गदर्शन यूँ ही मिलता रहे..
      प्रणाम
      सादर

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  10. उत्तर
    1. सहृदय आभार आदरणीय उत्साहवर्धक समीका हेतु
      सादर

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  11. बहुत सुंदर और सार्थक प्रस्तुति

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