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शुक्रवार, 1 मई 2020

मिली थी उस मनस्वी से



मिट्टी के मटके-सी, 
जीवन चाक पर रखा करती, 
समय की अगन से,
 सद्भावना-सी निखरा करती, 
साँझ  ढले तारों से,
ढेरों बातें किया करती, 
 संयम संजीदगी की, 
 अर्धांगिनी बन नित संवरा करती। 

जेष्ठ महीने की,
 मध्य दोपहरी में टूटी टाटियों के,
छप्पर को बँधा करती,
सहती चिलचिलाती तेज धूप,
निर्मम लू के,
 थपेड़ों से देह अपनी सेका करती। 

पति न परिवार, 
न समाज का था संबल,
कुलटा नाम,
 पाकर बेवा शहीद की हर्षाई,
एक बार मिली थी
 उस सबला मनस्वी से,
 अंतस में,
 आशीष का सागर भर लायी। 

शब्दों का पंडाल,
 घटनाओं का लिए बैठी थी रेला,
आँगन के एक कोने में, 
मुद्दतों से लाचारी ढो रहा था ठेला,
पेट में छिपी भूख के, 
अनकहे अनगिनत नागफ़नी-सी,
 ज़िंदगी के थे कई अनुत्तरित प्रश्न !

©अनीता सैनी  'दीप्ति'

16 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीय सर सुंदर समीक्षा हेतु.
      सादर

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  2. पति न परिवार,
    न समाज का था संबल,
    कुलटा नाम,
    पाकर बेवा शहीद की हर्षाई,
    उफ्फ!!!
    दिल चीरकर निकलती मार्मिक भावाभिव्यक्ति...
    क्यों नहीं समझ पाते हैं समाज के लोग उस बेवा के टूटी आशाओं को क्यों परिवार भी कुलटा कह उसके नासूर में नश्वर चुभोता है सचमुच ये सवाल एक संवेदनशील कवि मन में ही उठते हैं ...बाकी तो संवेदना को ताक पर लगा ऐसी जिंदगियों से उनकी बची-खुची साँसे खीचने पर तुले होते हैं।
    बहुत ही भावपूर्ण हृदयस्पर्शी सृजन।

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    उत्तर
    1. सुंदर सारगर्भित समीक्षा हेतु तहे दिल से आभार आदरणीया दीदी. स्नेह आशीर्वाद बनाये रखे.
      सादर

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  3. उत्तर
    1. बहुत-बहुत शुक्रिया प्रिय सखी सुंदर समीक्षा हेतु.
      सादर आभार

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  4. एक अबला का दर्द अभिव्यक्त करने में सक्षम है आपकी रचना..
    साथ ही कुछ अनुत्तरित प्रश्न हैं जिनके उत्तर जिस दिन मिल जाएंंगे ..समाज में स्त्री के अस्तित्व उपेक्षा भी बंद हो जाएगी ।
    हृदयस्पर्शी सृजन ।

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    उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीया मीना दीदी. रचना की इतनी मनमोहक समीक्षा पढ़कर बहुत ख़ुशी हुई. आपका प्रोत्साहन सदैव मेरे साथ है.
      स्नेह आशीर्वाद बनाये रखे.

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  5. बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति सखी !

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    उत्तर
    1. सस्नेह आभार प्रिय सखी उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
      सादर

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  6. रचना में दबी हुई चीख़ मार्मिकता के साथ महसूस होती है। एक संघर्षशील विधवा स्त्री का शब्दचित्र उकेरती रचना सोई हुई संवेदना को जगाती है और कविता की अंतरकथा के पात्र के साथ पाठक की सहानुभूति जुड़ जाती है। उत्कृष्ट सृजन।





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    1. सादर आभार आदरणीय सर सुंदर सारगर्भित समीक्षा हेतु.
      मनोबल बढ़ाने हेतु तहे दिल से आभार.
      सादर

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  7. उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीया दीदी उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
      सादर

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  8. ऐसे कई प्रश्नों के उत्तर समाज नहीं देता ... बहुत निर्दयी होता है ...
    ये जवाब खुद ही ढूँढने होते हैं ... लड़ना होता है अपने लिए ...

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    1. सादर आभार आदरणीया सर सारगर्भित समीक्षा हेतु.
      आशीर्वाद बनाये रखे.

      हटाएं

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