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सोमवार, 29 अप्रैल 2019

वो अब मुस्कुराने लगी



संस्कारों का पहन गहना 
बड़ी  शान  से चलने लगी 
समेटे होठों की मुस्कान
 गीत प्रीत के गाने लगी 

इंतज़ार में सिमटे  दिन
 वही रात गुजरने लगी 
पहरेदार वह देश का 
यही सोच वह मुस्कुराने लगी 

गुरुर से धड़कता सीना
 झलका आँखों से  पानी 
  क्या कहेगा समाज ?
यही से शुरू हुई  वह  कहानी 

सुशील और शालीनता  की जद्दोजेहद
  मन  में  लिए लाखों  सवाल 
  दर्श रूप का दिखा आईना
 उभर  आई  एक  मिशाल 

  परवाह करने का दिखावा
 उस का रहा  बेबुनियाद 
बहुत सताती उस की  परवाह 
वह मन का रहा अवसाद 

 संस्कारों  का  पहन  गहना 
 मन  ही  मन  मुरझाई 
फबता  नहीं  तुम  पर  
 हँसती   मेरी   परछाई   

पग - पग पर  इम्तिहान 
   एक    दिन  बिखर  गई  
ख़ोज  रही  खोई  पहचान 
 किया क़त्ल उनका का 
जब थी वह अंजान 

  भाव मन के  उकेरे
  मौन  शब्दों का मुखर  बखान 
हृदय  प्रवाह  में   प्रेम  गंगा 
कविता संग  खिली  मुस्कान |

- अनीता सैनी 

28 टिप्‍पणियां:



  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना 1 मई 2019 के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (01-05-2019) को "संस्कारों का गहना" (चर्चा अंक-3322) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. सहृदय आभार आदरणीय चर्चा में स्थान देने के लिए
      सादर

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 30/04/2019 की बुलेटिन, " राष्ट्रीय बीमारी का राष्ट्रीय उपचार - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    उत्तर
    1. सहृदय आभार आदरणीय ब्लॉग बुलेटिन में स्थान देने के लिए
      सादर

      हटाएं
  4. बहुत खूब प्रिय अनीता | तुम्हारी ये रचना बहुत खास है |
    तुमने इसमें अपनी रचनात्मकता के बिना जी रही सैनिक की पत्नी के मनोभावों को बखूबी दर्शाया है | संस्कार हमें दुनिया में पहचान तो दिलाते हैं साथ में अपनों में बहुत नाम भी दिलाते हैं , पर एक कसक भीतर व्याप्त रहती है जो किसी रचनात्मक शौक के साथ पूरी होती है --
    संस्कारों का पहन गहना
    मन ही मन मुरझाई
    फबता नहीं तुम पर
    हँसती मेरी परछाई
    इसके बाद जो शौक कविता का हो तो बहुत कुछ बदल देता है जीवन में | दर्द की जगह हंसी आ जाती है और शब्द अपने आप बोलते है | सचमुच सैनिक पति की अनुपस्थिति में युमने सुघड़ता से घर और बच्चे सँभालते हुए जिस प्रतिबद्धता और समर्पण से ब्लॉग को संभाल रखा है | अंत में --कविता संग खिली मुस्कान-- यही तो इस शौक की पूर्ति से उत्पन्न आनन्द का सार है | ढेरों शुभकामनायें और प्यार | यूँ ही कविता के संग हंसती रहना और नये नये गीत रचना |🌷🌷🌷🌷🌷💐💐🌹🌷💐🌺🌻🌼🌸🥀🌹🌷---
    \\

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    1. प्रिय सखी रेणु जी सस्नेह आभार आप का इतनी अच्छी समीक्षा के लिए
      सादर

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  5. अनुपम औ अद्वितीय भावाभिव्यक्ति सुखद औ सराहनीय है।
    जी सादर धन्यवाद उत्कृष्ट चिंतन चित्रण निमित्त । सुप्रभातम् जय श्री कृष्ण राधे राधे जी ।🙏 👏 🙏

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  6. वाह!!प्रिय सखी ,बहुत सुंदर लिखती हैं आप!

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    1. सस्नेह आभार प्रिय सखी शुभा जी
      सादर

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  7. सैनिक की संगीनी के मन का भाव बखूबी उकेरा है आपने। शुभकामनाएं ।

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  8. बहुत पसंद आई आपकी रचना और रचना में प्रयुक्त उपमाएं भी।

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  9. उत्तर
    1. सस्नेह आभार प्रिय सखी सुमन जी
      सादर

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  10. बहुत ही प्यारी रचना ,अंतर्मन की दशा को दर्शाता सुंदर अभिव्यक्ति सखी ,स्नेह

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    1. सस्नेह आभार प्रिय सखी कामिनी जी
      सादर

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  11. संस्कारों का पहन गहना
    मन ही मन मुरझाई
    फबता नहीं तुम पर
    हँसती मेरी परछाई
    बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना सखी 👌

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आदरणीय/आदरणीया, स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद,