रविवार, 26 मई 2019

क्यों बदलें हम



                                                

                                                                                
शालीनता की परिभाषा, 
 कानों में चुभने  लगी, 
गाँधी के देश में गाँधीगीरी की,  
परिपाटी पनपने  लगी, 
ख़ामोशी से ताकती निगाहें, 
गौण होती इंसानियत, 
बड़प्पन का मुखौटा, 
मुखौटे में  दम तोड़ता पिंजर |

ख़्वाहिशों  से  जूझता  मन, 
मन  में  सूक्ष्म  बीज ख़्वाहिशों के, 
ख़्वाहिशों  से  पनपती  लापरवाही, 
लापरवाही  का न्यौता  घटना और  हादसों को, 
हादसों का शिकार बनते, 
अंजान और बेख़बर लोग, 
जिन्हें अगले पल का, 
 आभास मात्र भी नहीं |

मन  में  होने वाली ग्लानि, 
 धुल  जाती  वक़्त  के साथ, 
   तन  की कल्मषता  गंगा  स्नान  से, 
कितना आसान, 
तन और मन को साफ़ रखना |

वक़्त के साथ यह परिपाटी, 
 लगा  रही    दौड़, 
 क्यों बदलें  हम ?
सामने वाला क्यों नहीं? 
 शालीनता में छिपा अहंकार, 
ख़ामोशी में छिपा द्वेष, 
द्वेष मन के साथ, 
 निगल जाता   तन को, 
अपने हों  या  पराये, 
 एक  ही  नज़र  से ताकता |
  

   - अनीता सैनी 

24 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (27-05-2019) को "खुजली कान के पीछे की" (चर्चा अंक- 3348) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Jyoti Dehliwal ने कहा…

सही कहा अनिता दी कि हमने हमारे हिसाब से शालीनता की परिभाषा को बदल दिया हैं। सुंदर अभिव्यक्ति।

Anuradha chauhan ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन रचना सखी 👌

विश्वमोहन ने कहा…

मेरे हिसाब से अहंकार में छिपी शालीनता नही, शालीनता में छिपा अहंकार इस कविता की कथावस्तु है। बढ़िया कविता।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 26/05/2019 की बुलेटिन, " लिपस्टिक के दाग - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

मानवीय संवेदना को झकझोरती चिंतनपरक अभिव्यक्ति जिसमें वर्तमान सामाजिक अवस्था पर करारा प्रहार किया गया है।

रेणु ने कहा…

अपने हिसाब से शालीनता का आवरण ओढ़े लोगों पर व्यंगात्मक रचना प्रिय अनीता |छद्म आचरण से समाज में सौहार्द और आपसी भाईचारे को ठेस पहुंची है | हार्दिक शुभकामनायें |

अमित निश्छल ने कहा…

वक़्त के साथ यह परिपाटी
लगा रही दौड़
क्यों बदले हम ?
सामने वाला क्यों नहीं?
शालीनता में छिपा अहंकार
ख़ामोशी में छिपा द्वेष
द्वेष मन के साथ
निगल जाता तन को
अपने हों या पराये
एक ही नज़र से ताकता...
अद्भुत। यथार्थतः सत्य अभिव्यक्ति आदरणीया।
और कुछ कहने को बचा ही नहीं। सहृदय नमन।

शुभा ने कहा…

वाह!प्रिय सखी ,बहुत सुंदर लिखती हैं आप !
वैसे यहाँँ सभी आवरण में ढके हैं ।

Onkar ने कहा…

सुन्दर रचना

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय चर्चा मंच पर स्थान देने के लिए
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

प्रिय ज्योति बहन बहुत बहुत शुक्रिया आप का
सस्नेह
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

तहे दिल से आभार प्रिय सखी
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय ब्लॉग बुलेटिन में स्थान देने के लिए
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया प्रिय रेणु दी जी
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार प्रिय सखी शुभा जी
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

जी बहुत बहुत शुक्रिया
सादर

Kamini Sinha ने कहा…

बहुत सुंदर .... सखी

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार प्रिय कामिनी बहन
सादर स्नेह

संजय भास्‍कर ने कहा…

... बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार भास्कर भाई
प्रणाम
सादर