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शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

ज़िंदगी की किताब



वक़्त  ने   लिखे  अल्फ़ाज़,

ज़िंदगी  की नज़्म  बन  गयी, 

सीने में दबा, साँसों ने लिया संभाल, 

अनुभवों  की  किताब  बन गयी  |


होठों की मुस्कान, 

न भीगे  नम आँखों से,ख़ुशी का आवरण गढ़ गयी,

शब्दों को सींचा स्नेह से,

दर्द में डूबी मोहब्बत,अल्फ़ाज़ में सिमट गयी |


गुज़रे   वक़्त   को, 

आँखों  में किया बंद, लफ़्ज़ ज़िंदगी पढ़ती गयी , 

मिली  मंज़िल  मनचाही, 

हिम्मत  साँसों  में  ढलती गयी  |


 संघर्ष  के  पन्नों  पर, 

अमिट उम्मीद की मसी  फैल  गयी , 

सुख  खिला  संतोष  में,

इंसानियत  की  नींव  रखती   गयी  |


न हृदय को पड़ी,  मैं की  मार, 

न अंहकार से  हुई  तक़रार,

मिली चंद साँसें  उसी  को  जीवन वार,

ज़िंदगी अल्फ़ाज़  में  सिमटी  किताब  बन  गयी |

                

            -  अनीता सैनी 

32 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ख़ूबसूरत है ज़िन्दगी की किताब जो पढ़ना का अंदाज़ सीख गया उसीको ज़िन्दगी का रसमय और संगीतमय होने का एहसास होता है.
    सुन्दर रचना.

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  2. वाह क्या खूब लिखा है |
    बहुत सुन्दर

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  3. सबसे बड़ा ज्ञान दे जाती हैं ये जिंदगी की किताब ,बस उसे समझना आना चाहिए ,बहुत ही सुंदर रचना

    जवाब देंहटाएं
  4. सुन्दर भाव पूर्ण अभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं
  5. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (08-07-2019) को "चिट्ठों की किताब" (चर्चा अंक- 3390) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. सहृदय आभार आदरणीय चर्चा मंच पर स्थान देने हेतु
      प्रणाम
      सादर

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  6. गहरे भाव समेटे बहुत सुंदर सृजन जिंदगी की किताब ¡¡

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    उत्तर
    1. सस्नेह आभार प्रिय कुसुम दी जी
      प्रणाम
      सादर

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  7. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
    ८ जुलाई २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    1. सस्नेह आभार प्रिय श्वेता दी जी,हमक़दम में मेरी रचना को स्थान देने हेतु
      सादर

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  8. बहुत ही सुन्दर सार्थक रचना...
    न हृदय को पड़ी, मैं की मार,
    न अंहकार से हुई तक़रार,
    मिली चंद साँसें उसी को जीवन वार,
    ज़िंदगी किताब बनती गयी |

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    उत्तर
    1. सस्नेह आभार प्रिय दी जी
      प्रणाम
      सादर

      हटाएं
  9. संघर्ष के पन्नों पर,
    अमिट उम्मीद की मसी फैल गयी ,
    सुख खिला संतोष में,
    इंसानियत की नींव रखती गयी |बेहतरीन रचना सखी 👌👌

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    1. सस्नेह आभार प्रिय सखी अनुराधा जी
      सादर

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  10. बहुत सुंदर और भावपूर्ण रचना।

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    1. सहृदय आभार आदरणीय, उत्साहवर्धन हेतु
      प्रणाम
      सादर

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  11. वक़्त ने लिखे अल्फ़ाज़,
    ज़िंदगी की नज़्म बन गयी,
    सीने में दबा, साँसों ने लिया संभाल,
    अनुभवों की किताब बन गयी
    उत्कृष्ट सृजनात्मकता... बेहद खूबसूरत 👌👌

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  12. बहुत अच्छी रचना.
    पढ़कर ऐसा लगा कि
    आज तक मेरी पढ़ी हुई आपकी रचनाओं में ..
    यह सर्वोत्तम है.
    साझा करने हेतु अनेकानेक आभार.

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    उत्तर
    1. आप का ब्लॉग पर स्वागत है आदरणीय, बहुत अच्छा लगा आप ने मार्गदर्शन किया,तहे दिल से आभार आप का
      आप का आशीर्वाद हमेशा बना रहे
      प्रणाम
      सादर

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