रविवार, 29 दिसंबर 2019

तुहिन-कण की अकुलाहट




 ओस की बूँदों ने अपनी असमंजसता, 
सस्नेह सजल भोर को सुनायी,  
रजत-कण के व्याकुल हृदय में कहाँ से,  
अवाँछित ज्वाला सुलग आयी ? 

जुगनू-सी चमकती थी चतुर्दिश,  
प्रीत की उज्ज्वल हीरों-सी कनियाँ,  
घास के घरोंदों पर रहती थीं बिखरीं,  
शबनम की मोतियों-सी लड़ियाँ |

निशा के अंतिम पहर की पाहुन बन,  
कभी नभ के तारों-सी जगमगायी, 
फूल-पत्तों की अँजुरी में विराजित, 
उपवन की शोभा सूर्याभा देख अकुलायी | 

वृक्ष की टहनियों से झाँकती पल-पल, 
प्रयत्नशील प्रभात के प्रथम पहर में मुस्कुरायी,  
तुहिन-कण की बूँदें मेरी हथेली में समा, 
सहर्ष स्वाभिमान से सृष्टि में यों हर्षायी |

©अनीता सैनी 

12 टिप्‍पणियां:

  1. वाह!प्रिय सखी ,बेहतरीन ।

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    1. सादर आभार आदरणीया दीदी जी उत्साहवर्दिक समीक्षा हेतु.

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  2. बेहद खूबसूरत रचना सखी

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  3. वृक्ष की टहनियों से झाँकती पल-पल,
    प्रयत्नशील प्रभात के प्रथम पहर में मुस्कुरायी,
    तुहिन-कण की बूँदें मेरी हथेली में समा,
    सहर्ष स्वाभिमान से सृष्टि में हर्षायी |
    बहुत सुंदर प्रिय अनीता| सद्भाव्नों से परिपूर्ण सुंदर सृजन | नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई | आगत वर्ष तुम्हारे लिए विशेष उपलब्धियों और शुभता भरा हो यही कामना है |

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    1. सादर आभार आदरणीया रेणु दीदी जी सुन्दर समीक्षा हेतु.

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  4. फूल-पत्तों की अँजुरी में विराजित,
    उपवन की शोभा सूर्याभा देख अकुलायी |
    बहुत सुन्दर अनीता जी...

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (31-12-2019) को    "भारत की जयकार"     (चर्चा अंक-3566)  पर भी होगी।--
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय चर्चामंच पर मेरी प्रस्तुति को स्थान देने के लिये.
      सादर

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anitasaini.poetry@gmail.com