शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

पन्ना धाय के आँसू



पन्ना धाय तुम्हारे आँसुओं से भीगे,
 खुरदरे मोटे इतिहास के पन्ने, 
जिनमें सीलन मिलती है आज भी,
कर्तव्यनिष्ठा राष्ट्रप्रेम की


उदय सिंह क़िले के ठीक पीछे,
 झील में झिलमिलाता प्रतिबिम्ब त्याग का,
ओस की बूँदों-सा झरता वात्सल्य भाव,
पवन के झोंको संग फैलाती महक ममता की

ज़िक्र मिलता है ममत्व में सिमटी, 
तुम्हारे भीगे आँचल की मौन कोर का,  
 पुत्र की लोमहर्षक करुण-कथा का,  
  लोकगाथा  तुम्हारे अपूर्व बलिदान की

चित्तौड़ के क़िले की ऊँची सूनी दीवारों में,
गूँजता तुम्हारा कोमल कारुणिक रुदन,
 सिसकियों में बेटे चंदन की बहती पीड़ा,
 दिलाती याद अनूठे स्वामिभक्ति की

उनींदे स्वप्न में सतायी होगी याद,  
तुम्हें बेटे की किलकारी की,  
काटी होगी गहरी काली रात, 
तुमने अपने ही भाव दासत्व की

पराग-सा मधुमय फलता-फूलता,  
खिलखिलाते  महकते  उदयपुर संग,  
धाय माँ के दूध की ऋणी बन इतराती आज भी,    
अजर-अमर अजब दास्ताँ क़ुर्बानी की

©अनीता सैनी 

24 टिप्‍पणियां:

  1. प्रिय अनीता,अपनों के खून से सने राजपूती इतिहास के गलियारों में ले जाती ,तुम्हारी ये रचना शब्द दर शब्द आत्मा को कंपित कर गई। पन्ना धाय भारतीय नारी का
    वो अमरचरित्र है, जिसकी आभा क्षत्राणियों से तनिक भी कम नहीं। जहाँ राजपूत रानियां अपने पति- पुत्रों को तिलक लगाकर और तलवार थमाकर रण
    के लिए विदा करती थी , वहीं पन्ना धाय ने दुनिया में किसी को भी कानोंकान खबर ना होने दी और अपने इकलौते जिगर के टुकड़े को बलिवेदी पर सुला दिया। कितने मर्मांतक रहे होंगें वो पल एक जननी के लिए जब उसने ये निर्णय लिया होगा, जब उसे अपने बेटे से बढ़कर चितौड़ के राजवंश की सुरक्षा और राष्ट्र का भविष्य नज़र आ रहा था। उस लोमहर्षक घटना की कल्पना करके कांपती अपनी आत्मा को उसने ना जाने कैसे संभाला होगा । अपने इस ज़ज़्बे के लिए इतिहास पन्ना धाय का ऋणी रहेगा और साथ में स्वामीभक्ति की दुर्लभ मिसाल भी ।तुमने हृदयस्पर्श करने वाली रचना लिख दी, जिसे पढ़कर मन बहुत भावुक हो गया और उस वीरांगना के इस निश्चल और निस्वार्थ बलिदान को स्मरण कर इसके आगे नत हो गया । तुम्हें बहुत बहुत शुभकामनायें और साधुवाद इस भावपूर्ण सृजन के लिए।

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    1. सादर आभार आदरणीया रेणु दीदी सुन्दर सारगर्भित एवं रचना का मर्म स्पष्ट करती समीक्षा हेतु. अपने स्नेह सानिध्य और आशीर्वाद बनाये रखे.
      सादर

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    2. आदरणीया रेणु दीदी ने अपनी विस्तृत टिप्पणी में भावुकता को गुणात्मक धार दे दी है। किसी भी रचना का गहन विश्लेषण करने में आदरणीय रेणु दीदी अपनी अलग छवि प्रस्तुत करतीं हैं जो पाठक और रचनाकार दोनों को दिशा दिखाता है।

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    3. सही कहा आदरणीय सर आपने आदरणीय रेणु दीदी का समीक्षा करने में जवाब नहीं.
      सादर

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  2. उदय सिंह व महाराणा प्रताभ आज भी हमारे आन बान शान के प्रतीक हैं।
    पन्ना धाय के बलिदान को कौन भूल सकता है।
    बेटे के बलिदान का दर्द एक माँ को अवश्य ही हुआ होगा।
    इस स्थिति को बहुत अच्छे शब्द मिल गए।

    आइयेगा- प्रार्थना

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    1. सादर आभार आदरणीय उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.

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  3. बहुत ही मार्मिक रचना अनीता बहन।
    परंतु मेरा सवाल यह है कि आज हम ऐसे बलिदानी महान आत्माओं की राह पर क्यों नहीं है। नैतिक शिक्षा की वे पुस्तकें कहाँँ गुम हो गई हैं, जिसमें पन्नाधाय जैसी पात्र का चरित्र चित्रण है। हमारे बच्चे इन्हें भूलते जा रहे हैं और यदि हम अपने बलिदानी लोगों को जिस दिन पूरी तरह से भूल जाएंगे, हमारी पहचान भी समाप्त हो जाएगी, हमारा संस्कार समाप्त हो जाएगा, हमारी सभ्यता समाप्त हो जाएगी, हमारी संस्कृति समाप्त हो जाएगी।
    सादर...

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    1. सादर आभार आदरणीय शशि भाई सारगर्भित समीक्षा हेतु.
      सही कहा आपने समाज में मानवीय मूल्यों का दायरा सिकुड़ सा गया है.स्वार्थ की बेड़िया में लिपटा मानव सर्वहित की भावना से परे स्वयं सुख को महत्व देने लगा है. बदलते परिवेश में जरुरी है संवेदना का होना. सराहना से परे है आप की समीक्षा.
      सादर प्रणाम

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  4. बलिदान और त्याग तो सबने देखा एक पल में पन्ना धाय अमर हो गयी इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में नाम छप गया ....हो भी क्यों न ।भला ऐसा कौन कर सकता है....पर उस नारी मन की क्या उस माँ का क्या कैसे जी पायी होगी वह आगे का जीवन.....
    रचना की ये पंक्तियाँँ दिल के पार पहुँच गयी
    उनींदे स्वप्न में सतायी होगी याद,
    तुम्हें बेटे की किलकारी की,
    काटी होगी गहरी काली रात,
    तुमने अपने ही भाव दासत्व की।
    हाँ ! दासत्व भाव .....
    बहुत ही मर्मस्पर्शी, भावपूर्ण सृजन
    लाजवाब....बहुत ही लाजवाब।

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    1. सादर आभार आदरणीया सुधा दीदी मेरे मन की बात को विस्तार देने और सारगर्भित समीक्षा हेतु.मनोबल बढ़ाती सुन्दर समीक्षा से यों ही मार्गदर्शन करते रहे.
      सादर स्नेह

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  5. पन्ना धाय के बलिदान का बहुत ही हृदयस्पर्शी चित्रण किया है प्रिय सखी आपने । एक-एक पंक्ति हृदय को अंदर तक स्पर्श कर गई ।

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  6. पन्ना धाय के अभूतपूर्व त्याग और कठोर ऐतिहासिक फ़ैसले को आज लोक जीवन में सराहा तो जाता है किंतु दिल पर पत्थर रखकर उन्होंने शेष जीवन अपनी ममता को क्या कहकर शांत किया होगा, कुछ ऐसे ही भाव लेकर पन्ना धाय के चरित्र के भावुक पक्ष को उकेरती रचना पाठक के दिल-ओ-दिमाग़ पर गहरा असर करती है। स्वामिभक्ति का ऐसा उदाहरण दुर्लभ है जो राजस्थान के इतिहास की महान धरोहर है। ऐसे दबे हुए ऐतिहासिक चरित्र हमें गर्वोन्नत करते हैं जहाँ राज्य के प्रति निष्ठा और कर्तव्य सर्वोपरि था एक माँ के लिये। राज्य के कुल दीपक को बचाने हेतु अपने बेटे को एक क्रूर आततायी की तलवार का शिकार होने के लिये सौंपना एक माँ के लिये निस्संदेह असमंजस से भरा फ़ैसला नहीं रहा होगा। आज उस दृश्य को सोचकर शरीर में सिहरन दौड़ जाती है।

    पन्ना धाय हमेशा याद की जातीं रहेंगी संकट की घड़ी में उनके त्वरित फ़ैसला लेने की क्षमता और ममता के प्रणम्य बलिदान के लिये।

    रचना पाठक को भावुकता से जोड़ती है और अंत में पन्ना धाय के प्रति असीम श्रद्धा से भरती है। शैली में जहाँ सामान्य शिल्पगत शव्दावली का प्रयोग है वहीं भावपक्ष प्रभावी है।

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    1. सादर आभार आदरणीय सर सारगर्भित एवं रचना का मर्म स्पष्ट करती सुन्दर समीक्षा हेतु. अपना आशीर्वाद यों ही बनाये रखे.
      सादर

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  7. बेहतरीन सृजन सखी।वीरों ,शब्दों और क्षत्रियों की गाथाएँ तो सभी बोलते हैं परन्तु कुछ विशिष्ठ लोगों के त्याग और वलिदान की ओर कम लोगों का ही धयान जाता है।वीर माता के पुत्र वलिदान को कोटिशः नमन।

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    1. सस्नेह आभार सखी उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
      सादर

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  8. निःशब्द करती लेखनी आपकी भावपूर्ण सृजन .... बधाई सहित अनंत शुभकामनाएं

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    1. तहे दिल से आभार आदरणीय दीदी इतनी सुन्दर समीक्षा हेतु.
      सादर

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  9. " पराग "जैसे शब्द जिससे सिर्फ प्रेम और अनुराग के भाव उमरते हैं ,इतने रूमानी शब्द से इतनी हृदयस्पर्शी रचना ,इतिहास की सबसे मार्मिक घटना का वर्णन ,सादर नमन हैं आपकी लेखनी को अनीता जी

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    1. तहे दिल से आभार आदरणीय दीदी उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
      सादर

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  10. निशब्द करती प्रस्तुति आपकी!! छंद मुक्त काव्य की किसी भी श्रेणी में उत्कृष्टता का सुंदर संगम।
    हृदय को दहला देने वाली घटना राजस्थान के इतिहास का वो सुनहरी पन्ना है ,जो चंदन के रक्त से लिखा गया , एक माँ का ऐसा पहलू जो शायद विश्व की सबसे रोंगटे खड़े करने वाली घटना थी ।
    जिसने इतिहास बदल दिया ,चंदन होता तो महाराणा प्रताप सा शूरवीर इतिहास की स्वर्णिम धरोवर उदयसिंग के साथ ही समाप्त हो गई होती ।
    पन्ना अमर हो गयी हमेशा के लिए साथ ही दिया एक ऐसा रत्न जो उनके हृदय के खून से सिंचित हो परवान चढ़ा।
    पन्ना धाय को कोटिश:नमन।
    आपको अद्भुत सृजन के लिए
    साधुवाद।

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    1. सादर आभार आदरणीय कुसुम दीदी रचना का मर्म स्पष्ट करती सारगर्भित समीक्षा हेतु. अपना स्नेह आशीर्वाद यों ही बनाये रखे.
      सादर

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  11. इतिहास को उकेरती मार्मिक रचना । बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ ।

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