मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

सत्य क़ैद क्यों है?


तुम जूझ रहे हो स्वयं से, 
या उलझे हो,
भ्रम के मकड़जाल में,    
सात्विक अस्तित्त्व के,   
कठोर धरातल पर बैठे हो,  
या इंसान की देह पर, 
ज़िंदा लाश की तरह, 
यों ही लदे हो, 
या ढो रहे हो स्वयं को,
मर रही मानवता पर 
क्योंकि तुम सत्य हो
चेहरा अपना छिपाये हो, 
या बार-बार दम तोड़ते,
यथार्थ का सामर्थ्य हो, 
तलाशते हो पहचान,  
क्योंकि तुम सत्य हो
कभी रौंदे जाते हो,
रहस्य की तरह,  
अनगिनत अनचीह्नी, 
उठती आवाज़ो से, 
 किये जाते हो प्रभावहीन, 
असामयिक खोखले,
 उसूलों की अरदास पर,   
 चिल्ला नहीं सकते,
झूठ की तरह तुम, 
क्योंकि तुम स्वयं में,
पूर्णता का एहसास हो, 
फैल नहीं सकते,
 फ़रेब की तरह, 
क्योंकि तुम सत्य हो
 सूर्य की अनंत आभा की तरह

© अनीता सैनी 

26 टिप्‍पणियां:

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

बहुत ही अच्छी कविता |बधाई अनीता जी

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

समकालीन चिंतन को विचारोत्तेजक शैली में अभिव्यक्त किया है. समाज में बढ़ता जीवन मूल्यों का ह्रास निस्संदेह अब आक्रोश भरने लगा है जो अब गंभीर चिंता का विषय है.
रचना में भावात्मक पक्ष मुखर प्रतीत होता है.

मुकेश सैनी ने कहा…

तुम जूझ रहे हो स्वयं से, 
या उलझे हो,
भ्रम के मकड़जाल में,    
सात्विक अस्तित्त्व के,   
कठोर धरातल पर या, 
इंसान की देह पर, 
ज़िंदा लाश की तरह, 
यों ही लदे हो या, 
 ढो रहे हो स्वयं को,
मर रही मानवता पर 
क्योंकि तुम सत्य हो।
बहुत ही सुन्दर कहा अनीता लिखती रहो..

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 11 फरवरी 2020 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Unchaiyaan.blogpost.in ने कहा…

क्योंकि तुम सत्य हो सूर्य की तरह स्वयं में पूर्णता का एहसास हो तुम फैल नहीं सकते फरेब की तरह ,क्योंकि तुम सत्य हो
सूर्य की अनंत आभा की तरह बेहतरीन प्रस्तुति अनीता जी

SUJATA PRIYE ने कहा…

बेहतरीन सृजन सखी अनीता जी। बहुत-बहुत बधाई।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (12-02-2020) को    "भारत में जनतन्त्र"  (चर्चा अंक -3609)    पर भी होगी। 
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
 --
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

गोपेश मोहन जैसवाल ने कहा…

बहुत सुन्दर अनीता !
सत्य तो - 'सहज पके सो मीठा होय' जैसा होता है. उसके न तो चमत्कार होते हैं और न ही उसमें चमक-दमक होती है. किन्तु उसका प्रकाश आत्मा को आलोकित करता है और मनुष्य का पशुत्व समाप्त कर उसे मानव बनाता है.

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा ने कहा…

बेहतरीन रचना। सत्य की सत्यता और अक्षुण्णता को सुंदर तरीके से बयाँ करती इस लेखन हेतु बधाई व शुभकामनाएँ ।

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सर
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार आदरणीय रचना का मर्म स्पष्ट करती सुन्दर समीक्षा हेतु.
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया आपका
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार आदरणीय दीदी मंच पर मेरे लेखन को मान देने हेतु.
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार आदरणीय दीदी जी सुन्दर समीक्षा हेतु.
सादर स्नेह

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार सखी उत्साहवर्धन हेतु.
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार आदरणीय चर्चामंच पर मेरी रचना को स्थान देने हेतु.
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार आदरणीय सर आपकी समीक्षा ने रचना को और सुन्दर बना दिया. अपना आशीर्वाद बनाये रखे.
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार आदरणीय सर सारगर्भित समीक्षा से रचना को नवाज़ने हेतु. आशीर्वाद बनाये रखे.
सादर

Kamini Sinha ने कहा…

क्योंकि तुम स्वयं में,
पूर्णता का एहसास हो,
फैल नहीं सकते,
फ़रेब की तरह,
क्योंकि तुम सत्य हो
सूर्य की अनंत आभा की तरह
वाह !! बहुत ही सुंदर सृजन अनीता जी ,स्नेह

Onkar ने कहा…

बहुत ही सुंदर

मन की वीणा ने कहा…

स्तरीय सटीक सार्थक सृजन ।

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार आदरणीय दीदी उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार आदरणीय
प्रणाम

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार आदरणीय दीदी उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
सादर

Anchal Pandey ने कहा…

बहुत खूब लिखा आपने आदरणीया मैम।
सादर प्रणाम।

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया आँचल जी
सादर