मौन का पड़ाव / अनीता सैनी
…….
उसकी
शिथिल पड़ती जुबान…
पर तुम उस एकांत को
छू नहीं सकते
जहाँ देह नहीं,
भाव
आख़िरी साँस भरते हैं।
वहाँ
शब्द नहीं,
केवल भावों की
अथाह गहराइयाँ हैं,
जिन्हें
कहा नहीं,
बल्कि
जिया जाता है।
स्त्रियों की
डायरियाँ
कभी लिखी नहीं जातीं,
वे
खुलती हैं
नितांत एकांत में।
वहाँ
कल्पना ही नहीं,
स्मृति भी
चुप हो जाती है
क्योंकि
कुछ सच
इतने पूरे होते हैं
कि
उन्हें सँवारना
अपमान जैसा लगता है।
वे
आवाज़ नहीं माँगतीं,
मौन में
खुद को
सुरक्षित रख देती हैं।
उन पन्नों पर
आँसू नहीं,
सिर्फ अस्तित्व
धीरे-धीरे उतरता है।
अगर तुम वहाँ
सहानुभूति लेकर आए, तो
लौट जाओगे,
लेकिन अगर तुम
स्वयं को
उतारकर पढ़ोगे,
तो वहीं,
उस मौन में
ठहर जाओगे।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें