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मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

ख़ामोश होते रिश्तें



                                                    
 सिसक    रहा    सन्नाटा, 
ख़ामोशियों  की गुहार  यही , 
रिक्त   हो  रही   सासों  का ,
 क्या  यही    हिसाब    दोगे ? 


  बेज़ुबान   शब्दों   को ,
  कब जुबान दोगे ? 
 जल रहे अंहकार में  रिश्ते   , 
 मानवता  की  ममता  क्या,  यही   सिला    दोगे  ?


   ठिठुर  रहे  जज़्बात ,
सपनों  का    जला   अलाव , 
स्वार्थ   का   जामा  पहन  ,
 उष्ण  की  करे  पुकार, 
ठिठुर  रहे   ममत्व  को  क्या,  यूँ   हीं  ठुकरा  दोगे  ?


रजत   मेखला   की  कालिख ,
मन   में   मचाये  उत्पात, 
अंजानी  अँजुली   ढूंढ  रहा  मन ,
खुलवा  सकू   रिस्तों   का  बंद ,
ओझल सी इन  राहों  में   क्या,  यूँ   हीं   ठुकरा    दोगे ? 


उफान  आते  आदतन  से,  
रिस्तों   को  चख  कर   देखा, 
व्यवहार  की  लवणता  परखे ,
  दीन  की  हालत  देख  क्या,   यूँ  ही  ठुकरा  तो  न  दोगे  ?
   
                         -अनीता 

2 टिप्‍पणियां:

आदरणीय/आदरणीया, स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद,