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शनिवार, 13 अप्रैल 2019

सृष्टि की प्रीत



पीड़ा   सृष्टि  की   आँखों   में  झलकी 
सांसों  से  किया  उस का  तिरस्कार 
अल्हड़   हंसी   दौड़ी   हृदय   में 
मनु   सृष्टि  का  जीवन   आधार 

बुना    ख़्वाब  धरा  का 
अधरों  से    दिया  रूप  साकार 
बेचैनी  हृदय  पर  डोली  
क्षितिज  ढले न आया  प्रभाकर  
 ढली  शाम   हुए   दीदार 

थक   हार  कर  बैठा   प्रभाकर  
सृष्टि  ने  किया  स्नेह  से  सत्कार 
बिन  वज़ह  जताता  हूँ  क्रोध 
बहुत  आता  है  मनु  पर  प्यार 

अनायास   ही  खिलखिला  उठी 
न  कर प्रभाकर  मन  पर  वार 
काम  घनेरे  दर  पर  मेरे 
मनु  अपने  कर्मों  का  हक़दार 

विदा   हुआ शशि 
कलेज़े   से  लग   किया   दीदार 
बरसाना   स्नेह  की  चाँदनी 
मनु   शतरूपा  के  जीवन  में
 न   हो  अब   कोई    तक़रार |

- अनीता सैनी 

21 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत सुंदर अभिव्यक्ति अप्रतिम अनुपम।

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (15-04-2019) को "भीम राव अम्बेदकर" (चर्चा अंक-3306) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    - अनीता सैनी

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  3. चांद प्रतीक है प्रेम का और जहाँ प्रेम हो शीतल चांदनी तो बरसेगी ही ...
    सुन्दर रचना ...

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  4. बहुत खूबसूरत रचना सखी.. 👌 👌 👌

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    1. प्रिय सखी सुधा आप को बहुत सा स्नेह और तहे दिल से आभार
      सादर

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  5. बहुत सुंदर सृष्टि की प्रीत...सारगर्भित गूढ़ मनभावों से सजी रचना प्रिय अनिता...👍

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    1. प्रिय श्वेता जी आप का तहे दिल से आभार
      सादर

      हटाएं

आदरणीय/आदरणीया, स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद,