शनिवार, 9 मार्च 2019

ग़रीबी

                                             

            हवा  ही  ऐसी  चली ज़माने की, कि  बदनाम हो गयी,  
               अमीरी  बनी  सरताज़,  ग़रीबी  मोहताज़   हो  गयी |

            नशा  शोहरत का सर चढ़ गया  है  इस क़दर, 
           ग़रीबी की  हिमाक़त देखो यहाँ  सरेआम हो गयी |

             सदा  रौंदी   गई  कुचली गयी  अभावों के तले, 
            ग़रीबी मिटाने की कोशिशें  भी नाक़ाम हो गयीं |

            ऐसा भी न था कि ज़माना मिटा न सका मेरी हस्ती,  
             इत्तिफ़ाक़ ही ऐसा था,कुछ समा गयी मुझमें,
                           किसी को मैं निगल गयी  |

                                   - अनीता सैनी 
     

22 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-03-2019) को "पैसेंजर रेल गाड़ी" (चर्चा अंक-3269) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

संजय भास्‍कर ने कहा…

सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना !

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय चर्चा में मुझे स्थान देने के लिए
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय उत्साहवर्धन टिप्णी के लिए
सादर

Onkar ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति

अनीता सैनी ने कहा…

आभार आदरणीय
सादर

Anuradha chauhan ने कहा…

सदा रौंदी गई कुचली गई अभावों के तले
ग़रीबी मिटाने की कोशिशें भी नाक़ाम हो बेहतरीन प्रस्तुति सखी

अनीता सैनी ने कहा…

स्नेह आभार सखी
सादर

विश्वमोहन ने कहा…

वाह!

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय
प्रणाम
सादर

Sweta sinha ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
११ मार्च २०१९ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

अनीता सैनी ने कहा…

आभार श्वेता जी
सादर

दिगंबर नासवा ने कहा…

अभिशाप है गरीबी अपने आप में ...
मेरा मेरा का भाव ही है अब ... गरीब को नहीं सोचता ... सार्थक रचना ...

Kamini Sinha ने कहा…

वाह !!बहुत खूब सखी

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार सखी
सादर

Sudha devrani ने कहा…

सदा रौंदी गई कुचली गई अभावों के तले
ग़रीबी मिटाने की कोशिशें भी नाक़ाम हो गई
बहुत सुन्दर ...सार्थक...सटीक....
वाह!!!

अनीता सैनी ने कहा…

आभार आदरणीया
सादर

https://www.kavibhyankar.blogger.com ने कहा…

बहुत सुन्दर बिटिया अनिता सैनी

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार चाचा जी
तहे दिल से आभार उत्साहवर्धन टिप्णी के लिए
सादर नमन

मुकेश सैनी ने कहा…

हवा ही ऐसी चली ज़माने की, कि बदनाम हो गई
अमीरी बनी सरताज़, गरीबी मोहताज़ हो गई .....
बहुत सुंदर अनिता जी।

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय
सादर नमन