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मंगलवार, अप्रैल 2

विज्ञान की महिमा


                                                      
पत्थर के पेड़ हरे होंगे, 
मानव  ज्ञान  की  राह  चला, 
धरा  का  सीना  छलनीकर,  
लेने  उस  की     थाह  चला |

न पतझड़,न वसंत  का इंतज़ार, 
 धरा  का  दामन  होगा  भरा, 
      फूलों का होगा ढेर, 
  दर्द  में  डूबी  होगी  धरा |

भँवरों के भिनभिनाने का भार, 
न फूलों को लेना होगा, 
फूलों को अपना अस्तित्त्व, 
ताक पर रख  देना  होगा |

रंगों में   लिपटे  होंगे फूल, 
नज़ारों   में  होगी  रंगीनियत,  
    फूल  होगें  पत्थर के, 
न  होगी  फूलों  में  मासूमियत |

फूलों  से  सुन्दर  फूल  होगें पर, 
फूलों  में  वो  ख़ुशबू  न  रहेगी, 
पत्थर  की   वरमाला  होगी, 
पत्थर  से  फ़िर  सेज   सजेगी |

आवतों  ने बुना जाल, 
बुद्धि की  यही  कलाकारी, 
विज्ञान-यान  पर सवार मानव, 
खोज है यह चमत्कारी |

दौड़ रहा मस्तिष्क मानव का, 
 हृदय पर की सवारी, 
शीतलता की राहत होगी, 
प्रगति की आयी बारी |

धरा को पत्थर-फूल से सजाया, 
सूरज-चाँद पर  जाने की  तैयारी, 
मानव  चला  प्रगति  की  राह, 
विज्ञान  की  यह   महिमा  सारी |
  
           - अनीता सैनी 

19 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब ......, सुन्दर सृजन अनीता जी 👌👌

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  2. बेहतरीन प्रस्तुति सखी

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  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति, अनिता दी।

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (03-04-2019) को "मौसम सुहाना हो गया है" (चर्चा अंक-3294) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    उत्तर
    1. सहृदय आभार आदरणीय चर्चा में स्थान देने के लिए
      सादर

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  5. दमदार¡ आने वाले दिनों का भयावह चित्रण सखी दुखद पर चिंतन परक।
    बहुत सार्थक।

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  6. बहुत खूब। पत्थर के पेड़ हरे होंगे। क्या बात है। सार्थक रचना। सादर।

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  7. सहृदय आभार आदरणीय
    सादर

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  8. प्रिय अनिता --ज्ञान और विज्ञानं के तर्क प्रस्तुत करती सशक्त रचना |सब कुछ पत्थर का होगा तो कहाँ मन भी लचीला रहेगा | वह भी तो पत्थर का होगा | सार्थक रचना के लिए शुभकामनायें |

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