सोमवार, 30 सितंबर 2019

जलमग्न हुए आशियाने



कहाँ से आये ये  काले बादल,  
किसने गुनाह की गुहार लगायी,  
जलमग्न हुए आशियाने, 
ज़िंदगियों ने चीख़-चीख़कर पुकार लगायी |

बरस रही क्यों घटा अधीर, 
विहग गान से क्यों मेघ ने काली बदरी बरसायी, 
चिर पथिक थे गाँव के वे  ग्वाले, 
क्यों उनको  भ्रम से भटकी राह दिखायी |

मूक-बधिर बने बेबस दर्द सारे, 
देख-सुन अरदास मन में झिरमिरायी, 
पथरा  गयी  पलकें ओ पालनहार !
क्यों प्रशासन ने सुध-बुद्ध गँवायी |

मनुहार माँगती गूँजती प्राण-वंशी, 
थक-हार दीप असुवन से जला, 
पल ने पलकों में उम्मीद थमायी, 
कहा विहंगम ने मधुर स्वप्न में यामिनी से, 
उफनती  सजल सरिता को सवेरे ने राह दिखायी |

© अनीता सैनी 

27 टिप्‍पणियां:

मुकेश सैनी ने कहा…

Bahut khub ji

Nitish Tiwary ने कहा…

बहुत सुंदर पंक्तियाँ।

लोकेश नदीश ने कहा…

बहुत उम्दा

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 01 अक्टूबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (02-10-2019) को    "बापू जी का जन्मदिन"    (चर्चा अंक- 3476)     पर भी होगी। 
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
 --
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

Meena Bhardwaj ने कहा…

बेहतरीन और हृदयस्पर्शी सृजन अनु ।

Sudha devrani ने कहा…

बहुत सुन्दर समसामयिक हृदयस्पर्शी सृजन...

मूक-बधिर बने बेबस दर्द सारे,
देख-सुन अरदास मन में झिरमिरायी,
पथरा गयी पलकें ओ पालनहार !
क्यों प्रशासन ने सुध-बुद्ध गँवायी |

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

साहित्य का धर्म है पीड़ित पक्ष के साथ खड़े होकर जवाबदेह को ललकारना.
प्रस्तुत रचना आधी-अधूरी बात कहती नज़र आती है. खुलकर पीड़ित मानवता के पक्ष को सशक्त शब्दों में अभिव्यक्त करना समय की माँग है.
यथार्थपरक चिंतन स्पष्ट दिशा दिखाता है.
सुन्दर संदेश देती रचना के लिये बधाई एवं शुभकामनाएँ.
लिखते रहिए.

अनीता सैनी ने कहा…

तहे दिल से आभार आदरणीय सुन्दर समीक्षा हेतु |कृपया अपना स्पस्टीकरण दे और मेरा मार्गदर्शन करें कि कहाँ आप को आधी-अधूरी बात नजर आयी कृपया खुलकर अपना विचार रखे |
सादर

मन की वीणा ने कहा…

हृदय द्रवित करती सामायिक पीड़ा या आपदा का बहुत स्पष्ट सा खाका खिंचती सार्थक रचना ।
उस पर प्रसाशन और जिम्मेदार लोगों का लापरवाही भरा अमानुषिक व्यवहार बहुत कष्टप्रद है।
सुंदर विवेचनात्मक अभिव्यक्ति।

Kamini Sinha ने कहा…

मूक-बधिर बने बेबस दर्द सारे,
देख-सुन अरदास मन में झिरमिरायी,
पथरा गयी पलकें ओ पालनहार !
क्यों प्रशासन ने सुध-बुद्ध गँवायी |

बेहद मार्मिक , सत्य को उजागर करती रचना

अमित निश्छल ने कहा…

बहुत बढ़िया। अच्छी रचना।

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

"कहा विहंगम ने मधुर स्वप्न में यामिनी से,
उफनती सजल सरिता को सवेरे ने राह दिखायी |"

कृपया इन पंक्तियों पर ध्यान दीजिए।
एक ययार्थवादी रचना में व्यक्ति-आधारित समस्यामूलक विषय का अंत काल्पनिक या फिर क़ुदरत के हवाले छोड़ देना सन्देश को अस्पष्ट करता है।
सब कुछ क़ुदरत के हवाले हो तो फिर मानव - निर्मित विपदाओं का हल हमें सोचने की कोई आवश्यकता नहीं है परन्तु आज के अत्याधुनिक तकनीकी युग में पृथ्वी पर समस्याओं का जनक मानव ही है अतः उनका हल क़ुदरत के हवाले छोड़ना एक मासूम कवयित्री कैसे स्वीकार कर रही है ?

रेणु ने कहा…

प्रिय अनीता , सम सामयिक मार्मिक विषय पर कविमन की ये करुण पुकार -- आपदा पीड़ितों का दर्द बखूबी बयान करती है |

अनीता सैनी ने कहा…

Thanks ji

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय चर्चामंच पर स्थान देने के लिए
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

तहे दिल से आभार मीना दी
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया दी
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार अनुज
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार प्रिय रेणु दी जी सादर आभार सुन्दर समीक्षा के लिए
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार प्रिय कामिनी दी जी
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

नमन आदरणीया कुसुम दी जी
हाँ आजकल प्रशासन अपनी जवाबदेही निभाने में कोताही कर रहा है इसलिए देश में बेचैनी का माहौल है |
हमारा दायित्व है समस्या पर सवाल उठाना ताकि व्यवस्था सोने का आडंबर न करे |
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

आदरणीय रवीन्द्र जी सादर प्रणाम 🙏 )
साहित्य जगत में आपके नाम से कौन परिचित नहीं है, मेरी रचना को आप की समीक्षा मिलना,मेरे लिये बहुत ही गौरव करने वाला पल है आपकी सारगर्भित समीक्षा मेरे लिये सराहना से परे है इसके लिये आपका तहेदिल से आभार |
परन्तु मैं आपके इस विचार से सहमत नहीं हूँ कि एक यथार्थवादी रचना का अंत हम काल्पनिक रुप से नहीं कर सकते आप ही इसका हेतु बताइये और मेरा मार्गदर्शन करें |मेरी रचना में मैंने किसी ठोस घटना को समेटने का प्रयास नहीं किया बल्कि उस घटना को माध्यम बना समाज में सकारात्मकता का प्रवाह किया है परिवेश से परेशान या कहें नकारात्मकता से आहत समाज को एक सकारात्मक राह दिखाने का प्रयास किया है |इन पंक्तियों में हम कह सकते हैं कि एक पक्षी यामिनी के स्वप्न में आता है जैसे-कहा विहंगम ने मधुर स्वप्न में यामिनी से, 
उफनती सजल सरिता को सवेरे ने राह दिखायी |मैं सिर्फ़ अपनी पंक्तियों में आशा का संचार करना चाहती थी |
आपसे मार्गदर्शन की उम्मीद रखते हुए |
आभार 
सादर

Anuradha chauhan ने कहा…

कहाँ से आये ये काले बादल,
किसने गुनाह की गुहार लगायी,
जलमग्न हुए आशियाने,
ज़िंदगियों ने चीख़-चीख़कर पुकार लगायी |
बेहद हृदयस्पर्शी रचना सखी 👌

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार बहना सुन्दर समीक्षा हेतु
सादर