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गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

सिया पुकारे हे रघुनंदन


दृष्टि पटल से पलक उठी जब
गिरती-उठती करती वंदन ।
याद हृदय  में उन लम्हों की 
शीतल सुरभित बनती चंदन ।।

सजे सपने तुषार-कणों से 
गूँथ जीवन के मुक्ताहार ।
कुसुम खिला है मन-उपवन में  
मधुकर गुंजन मधुर मल्हार।
यादें हुई तिरोहित सहचर 
अंतर कंपित सोहे स्पंदन ।।

जीवन में प्रारब्ध है कठिन 
अनभिज्ञ सुध हिया में जागी ।
मूरत पी पलकन ने बाँधी
कैसी गहन लगन है लागी ।
जले पतंगे-सा ये जीवन ।
जन्म-जन्म का साथी बंधन ।।

नैनों से मोती झर जाते
भेद हिया के आप ही कहते 
जलती निशि की शीतल काया।
झुलसे पैर शलभ के कहते 
मन विकल वृक्ष-लतिकाओं का  
सिया पुकारे हे रघुनंदन ।।

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

13 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार (10-04-2020) को "तप रे मधुर-मधुर मन!" (चर्चा अंक-3667) पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।

    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

    आप भी सादर आमंत्रित है

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    1. सादर आभार आदरणीया मीना दीदी मेरे नवगीत को चर्चा में स्थान देने हेतु.
      सादर

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज गुरुवार 09 एप्रिल 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीय सर संध्या दैनिक में मेरे नवगीत को स्थान देने हेतु.
      सादर

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  3. बहुत सुंदर रचना अनीता जी

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  4. वाह!!!
    बहुत ही सुन्दर लाजवाब नवगीत...
    जीवन में प्रारब्ध है कठिन
    अनभिज्ञ सुध हिया में जागी ।
    मूरत पी पलकन ने बाँधी
    कैसी गहन लगन है लागी ।
    जले पतंगे-सा ये जीवन ।
    जन्म-जन्म का साथी बंधन

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  5. वाह!!!
    बहुत ही सुन्दर लाजवाब नवगीत...
    जीवन में प्रारब्ध है कठिन
    अनभिज्ञ सुध हिया में जागी ।
    मूरत पी पलकन ने बाँधी
    कैसी गहन लगन है लागी ।
    जले पतंगे-सा ये जीवन ।
    जन्म-जन्म का साथी बंधन

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    1. सादर आभार आदरणीया दीदी उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
      सादर

      हटाएं

anitasaini.poetry@gmail.com