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सोमवार, 19 जुलाई 2021

समय दरिया



 समय दरिया में डूब न जाऊँ माझी

पनाह पतवार में जीवन पार लगाना है 

भावनाओं के ज्वार-भाटे से टकरा

अंधकार के आँगन में दीप जलाना है।


शांत लहरों पर तैरते पाखी के पंख

परमार्थ के अलौकिक तेज से बिखरे 

चेतना की चमक से चमकती काया

उस पाहुन को  घरौंदे में पहुँचाना है।


चराचर की गिरह से मुक्त हुए हैं स्वप्न

शून्य के पहलू में बैठ लाड़ लड़ाना है 

अंतस छिपी इच्छाओं का हाथ बँटाते

आवरण श्वेत जलजात से करना है।


नदी के गहरे में बहुत गहरे में उतर

अनगढ़ पत्थरों पर कविता को गढ़ते

 सीपी-से सत्कर्म कर्मों को पहनाकर 

झरे मृदुल वाणी ऐसा वृक्ष लगाना है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

31 टिप्‍पणियां:

  1. वाह , अद्भुत संकल्प ।
    मन की गहराई में उतर न जाने क्या क्या गढ़ना है ।
    गहन सृजन

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    उत्तर
    1. अनंत आभार आदरणीया संगीता दी जी ऊर्जावान प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ।
      स्नेह आशीर्वाद बनाए रखे।
      सादर नमस्कार।

      हटाएं
  2. गहन भाव रचना।
    मृदुल वाणी झरते वृक्ष अनोखी व्यंजना,
    अभिनव सृजन।
    बहुत सुंदर।

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    उत्तर
    1. दिल से आभार आदरणीया कुसुम दी जी आपकी प्रतिक्रिया संबल है मेरा।
      स्नेह आशीर्वाद बनाए रखे।
      सादर

      हटाएं
  3. सीपी-से सत्कर्म कर्मों को पहनाकर
    झरे मृदुल वाणी ऐसा वृक्ष लगाना है।
    वसुधैव कुटुम्बकम् जैसे संकल्प के साथ गहन चिंतन लिए अनूठी भावासिक्त रचना ।

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    उत्तर
    1. दिल से आभार आदरणीया मीना दी जी सारगर्भित प्रतिक्रिया से सृजन को सार्थकता प्राप्त हुई।
      स्नेह आशीर्वाद बनाए रखे।
      सादर

      हटाएं
  4. शांत लहरों पर तैरते पाखी के पंख

    परमार्थ के अलौकिक तेज से बिखरे

    चेतना की चमक से चमकती काया

    उस पाहुन को घरौंदे में पहुँचाना है।

    बहुत सुन्दर रचना

    जवाब देंहटाएं
  5. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (20-7-21) को "प्राकृतिक सुषमा"(चर्चा अंक- 4131) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    --
    कामिनी सिन्हा

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    उत्तर
    1. आभारी हूँ कामिनी दी चर्चामंच पर स्थान देने हेतु।
      सादर

      हटाएं
  6. उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सर।
      सादर

      हटाएं
  7. उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सर।
      सादर

      हटाएं
  8. अंधकार में दीप जला दो
    चैतन्यता का कर्मठता से मेल करा दो
    पहुँचे जन-जन तक शुचि भाव मेरे
    लेखनी को पावन वृक्ष बना दो।
    ----
    अत्यंत सुंदर लोककल्याण के भाव लिए सुंदर सृजन।

    सस्नेह।

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    उत्तर
    1. आपकी लिखी पंक्तियाँ सराहनीय है ऊर्जावान प्रतिक्रिया हेतु दिल से आभार।
      सादर

      हटाएं
  9. बेहतरीन रचना सखी।

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  10. सुंदर और अनुपम सृजन।

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    उत्तर
    1. आभारी हूँ आदरणीय संदीप जी आप आए सृजन सार्थक हुआ।
      सादर नमस्कार।

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  11. चराचर की गिरह से मुक्त हुए हैं स्वप्न

    शून्य के पहलू में बैठ लाड़ लड़ाना है

    अंतस छिपी इच्छाओं का हाथ बँटाते

    आवरण श्वेत जलजात से करना है।
    Amazing and Really Very beautiful✨✨✨

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  12. सुंदर चिंतन तथा गूढ़ मनन । संतुष्टि तथा प्रेरणा का भाव प्रतिपादित करती सुंदर रचना।

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    उत्तर
    1. अनंत आभार आदरणीया जिज्ञासा दी जी आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ।
      सादर

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  13. वाह अनीता ! बहुत सुन्दर !
    अपने सर पर तुमने बहुत सारी ज़िम्मेदारियाँ ओढ़ ली हैं.
    कभी इन ओढी हुई ज़िम्मेदारियों से पीछा छुड़ा कर ख़ुद को मौज-मस्ती के खुले आकाश में उड़ने दो !

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    उत्तर
    1. आभारी हूँ सर आपका आशीर्वाद मिला।
      अत्यंत हर्ष हुआ आपकी प्रतिक्रिया मिली।
      हमें पता ही नहीं चलता कब हम अपने चारों और अपने विचारों का आवरण गढ़ने लगते है उनसे बाहर निकलना असहज लगता है फिर धीरे-धीरे उन्हीं के साथ जीने की आदत हो जाती है और आदत एक दिन में नहीं छुटती।
      सादर प्रणाम सर।

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  14. उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सर।
      सादर

      हटाएं
  15. सुंदर बिम्बों और प्रतीकों में गुँथे गए सुकोमल भाव उलझनों-भरे जीवन की विभिन्न परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य पर तत्त्वबोध को प्रधानता के साथ उभार रहे हैं। प्रकृति से जुड़े जीवन के तत्त्व चिंतन के केन्द्र में आकर शांत रस के शांति पथ में ढलते नज़र आते हैं।
    सुंदर रचना।

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    उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीय रवीन्द्र जी सर आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया से सृजन को सार्थकता मिली।
      मनोबल बढ़ाने हेतु बहुत बहुत शुक्रिया।
      आशीर्वाद बनाए रखे।
      सादर

      हटाएं
  16. बहुत सुन्दर !
    अभी बहुत चुनौतियाँ बाक़ी हैं.
    अभी विश्राम कहाँ?
    Miles to go before I sleep.

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