Powered By Blogger

गुरुवार, जुलाई 15

पगलां माही कांकर चुभया 



 पगलां माही कांकर चुभया 

 जूती बांध्य बैर पीया।

 छागल पाणी छलके आपे 

थकया सांध्य पैर पीया।।


कुआँ जोहड़ा ताल-तलैया

बावड़ थारी जोव बाट

बाड़ करेला पीला पड़ ग्यो 

 सून डागल ढ़ाळी खाट

मिश्री बरगी  बातां थारी 

नींद  होई गैर पीया।।


धरती सीने डाबड़ धँसती 

 खिल्य कुंचा कोरा फूल

मृगतृष्णा मंथ मरु धरा री

खेल घनेरो खेल्य धूल

डूह ऊपर झूंड झूलस्या

थान्ह पुकार कैर पीया।।


 रात सुहानी शीतल माटी 

ठौर ढूंढ़ रया बरखान

दूज चाँद सो सोवे मुखड़ो

आभ तारक सो अभिमान

छाँव प्रीत री बनी खेजड़ी 

चाल्य पथ पर लैर पीया।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति '

40 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (16-07-2021) को "चारु चंद्र की चंचल किरणें" (चर्चा अंक- 4127) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आभारी हूँ आदरणीय मीना दी चर्चामंच पर मुझे स्थान देने हेतु।
      सादर

      हटाएं
  2. कुआँ जोहड़ा ताल-तलैया

    बावड़ थारी जोव बाट

    बाड़ करेला पीला पड़ ग्यो

    सून डागल डाली खाट

    मिश्री बरगी बातां थारी

    नींद होई गैर पीया।। बेहद ख़ूबसूरत रचना राजस्थानी मिठास लिए - - भावों को बड़ी सहजता से आंचलिक शब्दों में पिरोया है आपने, हमेशा की तरह मुग्ध करती रचना।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आभारी हूँ आदरणीय शांतनु जी सर आपने मारवाड़ी की मिठास को समझा कुछ हिंदी से मिलती जुलती है।
      आशीर्वाद बनाए रखे।
      सादर

      हटाएं
  3. उत्तर
    1. जी शुक्रिया थान पसंद आई।
      घणों घणों आभार।
      सादर

      हटाएं
  4. थोड़ा थोड़ा समझ पाई। लेकिन आंचलिक भाषा की मिठास ने सराबोर कर दिया । 👌👌👌

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. दिल से आभारी हूँ आदरणीय संगीता दी जी समझ सकती हूँ आपकी कसमकस।सच दिल से आभार आप पधारे बड़ी ख़ुशी हुई।
      आशीर्वाद बनाए रखे।
      सादर

      हटाएं
  5. राजस्थान के आँचल की महक लिए ...
    बहुत ही भावपूर्ण सम्व्बेदंशील रचना है ... दिल को छूती है ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आभारी हूँ आदरणीय नासवा जी सर आपकी प्रतिक्रिया हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाती है।
      सादर

      हटाएं
  6. वाह!! अद्भुत !!
    पगला माही कांकर चुभ गया...
    मरु माटी की सुगंध समेटे , अहसासों को शब्दों में बांधती
    सुंदर मारवाड़ी लोक गीत।👌👌
    चाँद तुम्हारे म्हारे आँगणे ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. ध्वन्यर्थ भीतर कहीं गहरे में उतर आया । निज लय-ताल में... अति सुन्दर ।

      हटाएं
    2. आदरणीय कुसुम दी जी आदरणीय अमृता दी जी दोनों का दिल की गहराइयों से अनेको आभार।
      आप दोनों की प्रतिक्रिया संबल है मेरा।
      स्नेह आशीर्वाद बनाए रखे।
      सादर

      हटाएं
  7. जितना समझ आया, एक अच्छी रचना

    जवाब देंहटाएं
  8. वाह, बहुत ही सुन्दर रचना अनीता जी! यद्यपि रचना का कुछ प्रतिशत भाग मेरे लिए बोधगम्य नहीं था, तथापि यह तो जान ही सका हूँ कि काव्यात्मक सुंदरता श्लाघनीय है।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सहृदय आभार आदरणीय सर आपका आशीर्वाद अनमोल है।
      संबल बाँधती प्रतिक्रिया हेतु बहुत बहुत शुक्रिया।
      यों ही आशीर्वाद बनाए रखे।
      सादर

      हटाएं
  9. बावपूर्ण रचना
    बहुत सुंदर

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय ज्योति खरे सर जी।
      आशीर्वाद बनाए रखे।
      सादर

      हटाएं
  10. कुआँ जोहड़ा ताल-तलैया

    बावड़ थारी जोव बाट

    बाड़ करेला पीला पड़ ग्यो

    सून डागल ढ़ाळी खाट

    मिश्री बरगी बातां थारी

    नींद होई गैर पीया।।यह पंक्तियाँ बहुत सुंदर लगी। अद्भुत रचना सखी।

    जवाब देंहटाएं
  11. थोड़ा समझ आया और बहुत कुछ समझ नहीं आया। अगर हिंदी भावानुवाद भी साथ साथ दिया होता तो हम जैसे पाठकों के लिए भी शायद अच्छा रहता। बहरहाल जो समझ आया उससे यह एक विरह की कविता लग रही है। सुन्दर। उम्मीद है जल्दी ही इसका हिंदी अनुवाद पढने को भी मिलेगा, अनीता जी।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सादर नमस्कार विकास जी।
      माफ़ी चाहती हूँ। मैं आपसे ही सृजन का हिंदी भावार्थ करने में आज में स्वयं का अक्षम पाती हूँ। नहीं समझ आता कहाँ से शुरु करुँ।
      आप ब्लॉग पर पधारे अत्यंत हर्ष हुआ। मारवाड़ी को आपने समझने का प्रयास किया। इससे हर्ष की बात और क्या होगी।ब्लॉग पर आते रहें।
      सादर

      हटाएं
  12. सूर्यमल्ल मिश्रण तथा कन्हैयालाल सेठिया जी के बाद राजस्थानी भाषा में काव्य-रचनाएं बहुत कम हो रही हैं जिससे इस सुंदर एवं मीठी भाषा का आस्वादन इसके अपने भाषा-भाषी ही नहीं कर पा रहे हैं। आप राजस्थानी भाषा में इतना सराहनीय रचना-कर्म कर रही हैं, यह अपने आप में ही बहुत बड़ी बात है। शेखावाटी बोली में रचित आपकी यह काव्य-रचना हृदयस्पर्शी है, इसमें कोई संदेह नहीं।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सादर नमस्कार आदरणीय जितेंद्र माथुर जी सर।
      मेरे लिखे नवगीत में शेखावाटी की माटी की ख़ुशबू को महसूस कर सारगर्भित रुप में बाँधा आप का बहुत बहुत आभार।
      राजस्थान भाषा से आपका लगाव सराहनीय है।
      आपकी ऊर्जावान प्रतिक्रिया से सृजन को सार्थकता मिली।
      बहुत बहुत शुक्रिया आपका।
      सादर

      हटाएं
  13. सुंदर लोकभाषा का रसास्वादन कराया आपने अनीता जी, समझ काम आई,परंतु भ2 बहुत अच्छा लगा, आपको हार्दिक बधाई।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. दिल से आभार आदरणीया जिज्ञासा दी जी मनोबल बढ़ाने हेतु।
      स्नेह आशीर्वाद बनाए रखे।
      सादर

      हटाएं
  14. अनीता, तुम्हारे मारवाड़ी गीत बहुत सुन्दर होते हैं.
    इन में पहाड़ी नदी सा संगीत का प्रवाह होता है.
    मेरे अनुरोध पर तुम सरल हिंदी में ऐसे गीतों का भावार्थ दे दिया करो या कम से कम कठिन शब्दों के अर्थ तो अवश्य ही दे दिया करो.

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सादर आभार सर।
      आशीर्वाद बनाए रखे।
      माफ़ी चाहती हूँ आपको कविता पढ़ने में परेशानी हुई।
      कुछ भावार्थ और कठिन शब्दों अवश्य लिखूँगी।
      मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु बहुत बहुत शुक्रिया।
      सादर

      हटाएं
  15. वाह!प्रिय अनीता ,मन आनंदित हो गया पढकर ।बहुत ही खूबसूरत सृजन ।लोकभाषा की मधुरता की बात ही कुछ और है ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आभारी हूँ दी सृजन सार्थक हुआ आपकी प्रतिक्रिया मिली।
      स्नेह आशीर्वाद बनाए रखे।
      सादर

      हटाएं
    2. बहुत अच्छा

      हटाएं