Powered By Blogger
अभिधा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अभिधा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, अगस्त 20

अभिधा बन रहूँ सृष्टि के साथ



नित्य निश्छल आगमन हो प्रीत का 
हों न छल-कपट कमसिन काया  के ,
कल्लोल कपट से क्रोधे न निर्मल उर,  
न बढ़े कसैलेपन से जग में तक़रार,  
 अमूल्य मानव जीवन  मिला मुझे, 
क्यों करूँ कलुषित कुंठा का शृंगार |

सहज सरल शब्द चित्त में मेरे, 
बरबस  मुस्काऊँ  इनके  साथ, 
 टटकी टहनी बन बरगद की, 
लहराऊँ फ़ज़ा में थामूँ  हवा का  हाथ  |

 बनूँ  प्रीत  पवन  के  पैरों  की, 
इठलाऊँ इतराऊँ गगन के साथ ,
समा अकिंचन धरा के कण-कण में,
बनूँ सृष्टि की प्रीत का बहता-सा भावार्थ  |

सृष्टि-सा मुस्कुराये मन मेरा, 
मिली चाँद-सितारों की सौग़ात,
 पल्लवित हुआ प्रकृति से प्रेम गहरा, 
सौम्य स्निग्ध स्नेह की हुई रिमझिम बरसात |

मर्म मानव धर्म का धारणकर, 
आल्हादित हो धरा  का  थामूँ  हाथ,
शालीन शब्दों का करूँ मुखर बख़ान,
 अभिधा  बन रहूँ सदा-सदा सृष्टि  के साथ |

- अनीता सैनी