कल्लोल कपट से क्रोधे न निर्मल उर,
न बढ़े कसैलेपन से जग में तक़रार,
न बढ़े कसैलेपन से जग में तक़रार,
अमूल्य मानव जीवन मिला मुझे,
क्यों करूँ कलुषित कुंठा का शृंगार |
सहज सरल शब्द चित्त में मेरे,
बरबस मुस्काऊँ इनके साथ,
टटकी टहनी बन बरगद की,
लहराऊँ फ़ज़ा में थामूँ हवा का हाथ |
बनूँ प्रीत पवन के पैरों की,
इठलाऊँ इतराऊँ गगन के साथ ,
समा अकिंचन धरा के कण-कण में,
बनूँ सृष्टि की प्रीत का बहता-सा भावार्थ |
सृष्टि-सा मुस्कुराये मन मेरा,
मिली चाँद-सितारों की सौग़ात,
पल्लवित हुआ प्रकृति से प्रेम गहरा,
सौम्य स्निग्ध स्नेह की हुई रिमझिम बरसात |
मर्म मानव धर्म का धारणकर,
आल्हादित हो धरा का थामूँ हाथ,
आल्हादित हो धरा का थामूँ हाथ,
शालीन शब्दों का करूँ मुखर बख़ान,
अभिधा बन रहूँ सदा-सदा सृष्टि के साथ |
- अनीता सैनी