रविवार, 25 अगस्त 2019

अंत:सलिला



 रेत के मरुस्थल-सा, 
 हृदय पर होता विस्तार, 
खो जाती है  जिसमें, 
स्नेह की कृश-धार, 
दरक जाती है, 
 इंसानियत, 
बंजर होते हैं, 
 चित्त के भाव, 
जज़्बात  में नमी, 
एहसास में होती, 
अपनेपन की कमी, 
तब दरारों से, 
झाँकने लगता है दर्द, 
असीम पीड़ा, 
अपनों की रुसवाई, 
और अंतहीन तन्हाई में, 
कठोर चित्त के धरातल पर, 
बिखर जाता है, 
 मर्म वफ़ाई का, 
अश्रु बन लुढ़कती है, 
पावन प्रीत,
 अंत:सलिला की गहराई  में, 
कुरेदने से मिलते हैं,  
अपार स्नेह नीर के स्रोत  
पनपती  है, 
अनदेखी अनकही, 
बँधुत्व की  पीर, 
अंत:सलिला-सा है, 
चंचल चित्त, 
फिर भी रौंदते हैं, 
प्रतिपल स्वार्थ में, 
अनगिनत पथरीले पैर, 
वक़्त की उड़ती धूल से, 
फिर भर उठते हैं, 
वे  रिसते  हुये  घाव, 
निरीह और उदार |

# अनीता सैनी 

27 टिप्‍पणियां:

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

वाह ! बहुत ख़ूब !
कमाल की रचना. हमारे भीतर बहती भावों की नदी अर्थात अन्तःसलिला का ख़ूबसूरत ज़िक्र करती रचना विश्व बंधुत्व का विराट दर्शन प्रस्तुत करती है.
बधाई एवं षुभकामनाएँ.
लिखते रहिए.

विभा रानी श्रीवास्तव 'दंतमुक्ता' ने कहा…

सिक्के के दूसरे पहलू को उम्दा उकेरा गया
शुभकामनाएं

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (26-08-2019) को "ढाल दो साँचे में लोहा है गरम" (चर्चा अंक- 3439) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Meena Bhardwaj ने कहा…

बेहतरीन और लाजवाब सृजनात्मकता अनु । बहुत सुन्दर ।

Anuradha chauhan ने कहा…

बेहद खूबसूरत रचना प्रिय सखी

रेणु ने कहा…

मनमोहक शीर्षक को सार्थक करती रचना प्रिय अनीता, जो मन की हर विसंगति को दरकिनार कर अनुराग की गहन कामना भित्र संजोये है। बहुत प्यारी है भावों की ये अंतःसलिला!!!! 👌👌👌👌👌👌

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

रेत के मरुस्थल-सा,
हृदय पर होता विस्तार,
खो जाती है जिसमें,
स्नेह की कृश-धार,


ik aaah....

hmm..bahut hi saarthak rchnaa bni he\

bdhaayi swikaare

दिगंबर नासवा ने कहा…

अन्तः करण को उद्वेलित करती ... सरल सरिता बहती विराट सागर में विलीन होते भाव ... बहुत सुन्दर ...

मन की वीणा ने कहा…

ये अंत:सलिला के अपार स्नेह नीर के स्रोत छुपे हैं कहीं तुझ में, मुझ में, हम सभी में। बस उसे आवरण से निकालने का दायित्व या तो समय के पास है या फिर परिस्थितियों की चोट उसे मुखरित करती है।

बहुत सुंदर भावपूर्ण काव्य, सुंदर शब्द संयोजन जो भावों को स्पष्ट करने में पूर्ण समर्थ ।
वाह रचना।

Sweta sinha ने कहा…

अंतःसलिला यह शब्द ही स्वयं में अर्थ से परिपूर्ण है।
अंतर्मन के भावों के कोमल उद्गार व्यक्त करती बहचत सुंदर अभिव्यक्ति अनु।

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

षुभकामनाएँ=शुभकामनाएँ

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया सर
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

तहे दिल से आभार दी जी
प्रणाम
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार दी
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार दी
प्रणाम

अनीता सैनी ने कहा…

तहे दिल से आभार दी जी
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया बहना
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

तहे दिल से आभार आदरणीय
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

तहे दिल से आभार दी जी
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

तहे दिल से आभार दी जी
सादर

VenuS "ज़ोया" ने कहा…

फिर भी रौंदते हैं,
प्रतिपल स्वार्थ में,
अनगिनत पत्थरीले पैर,
वक़्त की उड़ती धूल से,
फिर भर उठते हैं,
वे रिसते हुये घाव,

bahutttt hi gehrii rchnaaa....hmmm

bdhayi ik sarthak rchna rchne ke liye..


aur ik khaas bat...aapne jis tasweer ka chayan kiyaa he..ye mere ghar ke bahut paas he...Canola ke khet ..Husser area me...:)..bahut h manmohak hote hain

~Sudha Singh vyaghr~ ने कहा…

सुंदर मनोभावों से सजी एक बेहतरीन रचना 👌 👌 बधाई हो 💐

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार सखी
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार बहना
सादर

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा ने कहा…

सत्य की परख कराती सुन्दर रचना। स्वार्थ की चक्की में रिश्तों और अपनेपन का पिस जाना अत्यंत ही दुखद और असह्य होता है। अन्तः धारा फूट पड़ती है डूब जाता है मन क्षोभ की झील में ।
बहुत-बहुत शुभकामनाएँ ।

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय उत्साहवर्धन समीक्षा हेतु
प्रणाम
सादर