रविवार, 13 अक्तूबर 2019

उस मोड़ पर



 उस मोड़ पर
 जहाँ 
 टूटने लगता है
 बदन 
छूटने लगता है 
हाथ  
देह और दुनिया से
उस वक़्त 
उन कुछ ही लम्हों में 
उमड़ पड़ता है 
सैलाब 
यादों का 
 उस बवंडर में उड़ते  
नज़र आते हैं 
अनुभव
 बटोही की तरह राह नापता 
वक़्त 
रेत-सी फिसलती 
साँसें 
विचलित हो डोलती हैं 
तभी 
अतीत की 
 उजली धूप में   
उसी पल हृदय थामना 
चाहता है  
हाथ 
भविष्य का 
 अँकुरित हुए उस 
परिणाम के 
साथ
 र्तमान करता है 
छीना-झपटी 
एक पल के अपने अस्तित्त्व के 
साथ |

© अनीता सैनी 

16 टिप्‍पणियां:

लोकेश नदीश ने कहा…

बेहद शानदार रचना

Meena Bhardwaj ने कहा…

अतीत की
उजली धूप में
उसी पल हृदय थामना
चाहता है
हाथ
भविष्य का
अँकुरित हुए उस
परिणाम के
साथ....,
बेहतरीन और लाजवाब भावाभिव्यक्ति अनीता जी ।

Neeraj Kumar ने कहा…

अंत और अनंत की, भूत,वर्तमान और भविष्य के अटल और निरंतर सत्य की हृदयस्पर्शी व्याख्या की है आपने अनिता जी ! बस लाजवाब!

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

जी नमस्ते,


आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (14-10-2019) को "बुरी नज़र वाले" (चर्चा अंक- 3488) पर भी होगी।


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रवीन्द्र सिंह यादव

Kamini Sinha ने कहा…

हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति बहन

मुकेश सैनी ने कहा…

बहुत बढ़िया |

मन की वीणा ने कहा…

बहुत गहन होती है आपकी रचनाएं, अद्भुत तरह से भावों को लिखना और दिल तक उतरना, सचमुच अप्रतिम अभिव्यक्ति।

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार आदरणीय लोकेश जी
प्रणाम

अनीता सैनी ने कहा…

सादर नमन आदरणीय मीना दी जी. आभारी हूँ आपके अपार स्नेह और सानिध्य की.

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार आदरणीय नीरज जी. बहुत बहुत शुक्रिया आपका रचना का सार्थक मर्म समीक्षा में उकेरने और रचना को समझने में और सहूलियत प्रदान करने हेतु.

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार आदरणीय रवीन्दर जी मेरी रचना को चर्चामंच पर स्थान देने हेतु.
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सादर आभार प्रिय कामिनी दी.सुन्दर समीक्षा और अपार स्नेह हेतु.
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत सारा आभार आदरणीया कुसुम दी जी।
आपकी टिप्पणी मेरी रचना का मान बढ़ाती है। आपसे मिला प्रोत्साहन मुझे नई ऊर्जा से भरता है।
सादर आभार आपका दी।

अनीता सैनी ने कहा…

वो शब्दों में कलेजा परोसते रहे
बर्खुरदार शब्दों में उलझ गये
दुआ सलाम में गुज़र गये पहर ज़िंदगी के
अब वो पहर पहलू में बैठने से मुकर गये... वक़्त मिले तो ग़ौर फ़रमाइएगा ज़नाब इस दिपावली घर की चौखट लगियेगा.
सादर प्रणाम

Anuradha chauhan ने कहा…

छूटने लगता है
हाथ
देह और दुनिया से
उस वक़्त
उन कुछ ही लम्हों में
उमड़ पड़ता है
सैलाब
यादों का
उस बवंडर में उड़ते
नज़र आते हैं बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति सखी

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत आभार आदरणीय
सादर