शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

टूटे पंखों से लिख दूँ मैं... नवगीत


टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।
पीर परायी धंरु हृदय पर,
छंद बहे रस की सरिता।

मर्मान्तक की पीड़ा लिख दूँ,
पूछ पवन संदेश बहे।
प्रीत लिखूँ छलकाते शशि को,
भानु-तपिश जो देख रहे,
जनमानस की हृदय वेदना,
अहं झूलती सृजन कहे।

पथ ईशान सारथी लिख दूँ,
उषा कलरव की सुनीता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

पात-पात पर यथार्थ लिख दूँ,
सृष्टि-अश्रु बनकर बहती।
लेख विनाश लिखूँ तांडव पर,
मानस की करुणा कहती, 
उद्धार पतित पथ का लिख दूँ, 
भाव-विभाव जहाँ रहती।

बाल-बोध मन सुरभित लिख दूँ,
मिट्टी की गंध अनीता ।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

©अनीता सैनी 

14 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (28-02-2020) को धर्म -मज़हब का मरम (चर्चाअंक -3625 ) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    *****
    आँचल पाण्डेय

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    1. सस्नेह आभार आँचल चर्चामंच पर स्थान देने हेतु.
      सादर

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  2. "मर्मान्तक की पीड़ा लिख दूँ,
    पूछ पवन संदेश बहे।
    प्रीत लिखूँ छलकाते शशि को,
    भानु-तपिश जो देख रहे..."
    --
    बहुत मार्मिक उद्गार।

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    उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीय सर उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
      सादर

      हटाएं
  3. बाल-बोध मन सुरभित लिख दूँ,
    मिट्टी की गंध अनीता ।
    टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
    बना लेखनी वह कविता।
    वाह!!!
    लाजवाब नवगीत....

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    1. सादर आभार आदरणीय दीदी सुंदर समीक्षा हेतु.
      सादर स्नेह

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  4. बहुत सुंदर सृजन।
    सुंदर शब्दावली।

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    उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीय दीदी सुंदर समीक्षा हेतु.
      सादर

      हटाएं
  5. पात-पात पर यथार्थ लिख दूँ,
    सृष्टि-अश्रु बनकर बहती।
    लेख विनाश लिखूँ तांडव पर,
    मानस की करुणा कहती,
    उद्धार पतित पथ का लिख दूँ,
    भाव-विभाव जहाँ रहती।
    मन को झकझोरती औत चेतना को जगाती आपकी इस रचना हेतु साधुवाद आदरणीया अनीता जी ।

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  6. उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीया दीदी सुंदर समीक्षा हेतु.
      सादर

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anitasaini.poetry@gmail.com