शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

ज़िंदगी


 मृगमरीचिका-सा भ्रम जाल फैलाती 
कभी धूप-सी जलाती है ज़िंदगी।
 बरसात बन भिगोती है कभी 
पेड़-सा आसरा बनती है ज़िंदगी।

सँकरी गलियों के मोड़-सी लगती 
 राह दिखाती है हाथ बढ़ाती हुई।
घनघोर निराशा में पीठ थपथपाती 
 तुम्हारी परछाई-सी है ज़िंदगी।

 दिवस को धकेलती-सी लगती 
 साँझ ढले लुटाती है अपनत्त्व।
कभी हर दिन का हिसाब माँगती
 फिर अँधरे में गुम हो जाती है ज़िंदगी।

 कभी आघात की बौछार करती 
 कभी अनुभव की सौग़ात थमाती
 तुहिन कणों-सी चमक लिए आती 
 दामन में सिमट हर्षाती है ज़िंदगी।

 दिनभर की बनती है थकान  
कभी अनायास मुस्कुराने लगती  
 तुम्हारे आने की आहट लिए  
अरमान बन खिल जाती है ज़िंदगी।


©अनीता सैनी 'दीप्ति'

31 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. आभारी हूँ सर। आपकी प्रतिक्रिया से रचना को प्रवाह मिला।
      सादर प्रणाम

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  2. जीवन के विभिुन्न रूपों का अच्छा चित्रण किया है आपने।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया सर आशीर्वाद बनाए रखे।

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  3. बहुत खूबसूरत सृजन । हर बन्ध पर वाह ही निकलता है अन्तर्मन से । जिन्दगी के उतार-चढाव को दर्शाती अनुपम रचना ।

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    1. आभारी हूँ मीना दी आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाती है।
      स्नेह आशीर्वाद बनाए रखे।

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  4. दिवस को धकेलती-सी लगती
    कभी साँझ ढले लुटाती है अपनत्त्व।
    कभी हर दिन का हिसाब माँगती
    अँधरे में गुम हो जाती है ज़िंदगी।

    बहुत ही सुंदर सृजन अनीता जी

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    1. तहे दिल से आभार कामिनी दीदी मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु ।

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  5. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति, अनिता दी।

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    1. सादर आभार आदरणीय ज्योति बहन उत्साहवर्धन करती प्रतिक्रिया हेतु।

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  6. दिनभर की बनती है थकान
    कभी अनायास मुस्कुराने लगती
    तुम्हारे आने की आहट लिए
    अरमान बन खिल जाती है ज़िंदगी।

    बहुत ही सुन्दर अभिवयक्ति अनीता |

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  7. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (09-08-2020) को     "भाँति-भाँति के रंग"  (चर्चा अंक-3788)     पर भी होगी। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

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    1. सादर आभार आदरणीय सर चर्चामंच पर स्थान देने हेतु ।
      सादर

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  8. ज़िंदगी के विभिन्न आयाम दर्शाने का उत्तम प्रयास है। ज़िंदगी को कविता में समेटना सहज नहीं है सबका अपना-अपना नज़रिया है उसे समझने का फिर भी कवयित्री ने संक्षेप में ज़िंदगी की कश्मकश को शब्दों में पिरोने का विचारणीय एहसास अभिव्यक्त किया है।

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    1. आभारी हूँ आदरणीय सर सुंदर सारगर्भित प्रतिक्रिया से रचना का मर्मस्पष्ट करने हेतु। मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु सादर आभार।
      सादर प्रणाम

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  9. वाह!सुंदर भावाभिव्यक्ति सखी ।

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    1. तहे दिल से आभार आदरणीय दी इस अपार स्नेह हेतु।

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  10. कभी आघात की बौछार करती
    कभी अनुभव की सौग़ात थमाती
    तुहिन कणों-सी चमक लिए आती
    दामन में सिमट हर्षाती है ज़िंदगी।

    बहुत सुंदर रचना

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    1. सादर आभार अनुज मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु।
      सादर

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  11. बहुत ही सुन्दर

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  12. बहुत ही सुन्दर है

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  13. सँकरी गलियों के मोड़-सी लगती
    राह दिखाती है हाथ बढ़ाती हुई।
    घनघोर निराशा में पीठ थपथपाती
    तुम्हारी परछाई-सी है ज़िंदगी।
    वाह!!!!
    कोई अपना जब अपनी जिन्दगी बन जाय
    तो आसान हो जाती है जिन्दगी
    फिर प्यार मनुहार और इंतजार में
    यूँ ही गुजर जाती है जिंदगी
    बहुत ही भावपूर्ण.... अपनों की यादों और मन के भावों को इतनी खूबसूरती से सजाना कोई आपसे सीखे।

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    1. सादर आभार आदरणीय सुधा दीदी सारगर्भित समीक्षा से रचना को प्रवाह मिला।
      स्नेह आशीर्वाद बनाए रखे।

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  14. वाह! बहुत सुंदरता से जिंदगी का फलसफा बयाँ किया प्रिय अनिता आपने , सही है तुषार कणों सी है ज़िंदगी कभी लुभाती कभी भार है ज़िंदगी ।
    अभिनव सृजन।

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    1. तहे दिल से आभार आदरणीय कुसुम दीदी अपनी मोहक प्रतिक्रिया से सृजन में जान डालने हेतु। आपके आने से अत्यंत ख़ुशी हुई।स्नेह आशीर्वाद बनाए रखे।

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  15. उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीय सर मनोबल बढ़ाने हेतु।
      सादर

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anitasaini.poetry@gmail.com