सोमवार, 28 सितंबर 2020

भ्रम का भार


उसके रुँधे कण्ठ में पानी नहीं था 
शर्म स्वयं का खोजती अस्तित्व 
चित्त से उलझ कोलाहल में लीन 
भावबोध से भटक शब्द बन चुकी थी।

शब्द मौन साधे स्वर की खोज में 
दरकती चुप्पी संग सन्नाटे से मिला 
उधार के शब्दों ने शब्द माँगे भाव से भीगे 
हृदय के कपाट पर चाहत मलने के लिए।

चोट के अनंत निशान नवाँकुर से उभरे 
कुछ व्यर्थ के शब्द बिखरे मन आँगन में 
अर्थ के नुकीले दाँत प्रभाव में खिसियाए 
निंदा के ठहरे होंठ भी द्वेष में थिरके।

घाव बबूल के काँटों से गहरे पड़े मन में 
शब्द सहमे चित्त का उद्गार बिका बाज़ार में 
देख जीवन लकीरों का टूटा डेढ़ापन 
भ्रम का भार तड़प-तड़पकर रोया।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

16 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (29-9 -2020 ) को "सीख" (चर्चा अंक-3839) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय कामिनी दी चर्चामंच पर स्थान देने हेतु।

      हटाएं
  2. चोट के अनंत निशान दरख़्त से उभरे
    कुछ व्यर्थ के शब्द बिखरे मन आँगन में
    अर्थ के नुकीले दाँत प्रभाव में खिसियाए
    निंदा के ठहरे होंठ भी द्वेष में थिरके।

    भावों में गूढ़ता लिए हृदयस्पर्शी सृजन .अत्यंत सुन्दर ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. तहे दिल से आभार आदरणीय मीना दी मनोबल बढ़ाने हेतु।आपकी प्रतिक्रिया मेरा संबल है।

      हटाएं
  3. घाव बबूल के काँटों से गहरे पड़े मन में
    शब्द सहमे चित्त का उद्गार बिका बाज़ार ',,,,, बहुत भावपूर्ण रचना मेरे अन्तर मन को हिला गई ।आदरणीया प्रणाम

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीय दी मनोबल बढ़ाने हेतु।

      हटाएं
  4. उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीय सर मनोबल बढ़ाने हेतु।

      हटाएं
  5. अनीता, मैं भावों की भूलभुलैयों में भटक जाता हूँ.
    इमानदारी से कहूं तो न तो मुझे कबीर की उलटवासियाँ समझ में आती हैं और न ही रहस्य का आवरण लिए आधुनिक गूढ़ कविताएँ.
    मैं इस कविता की तारीफ़ या आलोचना, कुछ भी करने में असमर्थ हूँ.

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीय सर निवेदन है एक बार फिर पढ़े फिर भी ...।
      सादर प्रणाम

      हटाएं
  6. उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीय सर मनोबल बढ़ाने हेतु।

      हटाएं
  7. मन में उठते भावों से आड़ोलित लेखनी, शब्दों का संसार रचती मन की ऊहापोह का सुंदर ताना बाना।
    सुंदर सृजन ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. तहे दिल से आभार आदरणीय कुसुम दी मनोबल बढ़ाने हेतु।

      हटाएं
  8. बहुत सुंदर रचना,दिल को झकझोर दिया अपने।

    भ्रम का भार तड़प-तड़पकर रोया।
    निरुत्तर।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आभारी हूँ आदरणीय जफ़र जी। मनोबल बढ़ाने हेतु सादर आभार।

      हटाएं

anitasaini.poetry@gmail.com