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मंगलवार, फ़रवरी 10

जीवन का हस्ताक्षर


जीवन का हस्ताक्षर
✍️ अनीता सैनी
….
बहुत सुंदर संयोग है,
या कहूँ
अर्थ से भरी हुई नियति।

पीछे पलट कर
न देखने की चाह के बावजूद
समय
ख़ुद पलट कर
सामने आ खड़ा होता है।

ठीक उसी तारीख़ के साथ।
7 फ़रवरी, शनिवार
वह दिन
जब किसी नन्ही उँगली ने
मेरी उँगली थामी थी।

और दो दशक बाद
ठीक उसी शनिवार
7 फ़रवरी को
‘खरोंच’
मेरे जीवन में
प्रवेश करती है।

होनी कहती है-

यह कोई
सुंदर संयोग नहीं
जीवन का
अपना हस्ताक्षर है।

पर आप मुझे शुभकामनाएँ कह सकते हैं।
 बच्चों को खूब आशीर्वाद 💐

मंगलवार, जनवरी 27

ख़ाली किनारे


ख़ाली किनारे
✍️ अनीता सैनी
……..
यहाँ इस
समाज नाम की
चारदीवारी में
किसी न किसी को
कुछ न कुछ बचाने का ज़िम्मा
चुपचाप सौंप दिया जाता है।

कोई घर बचाता है,
कोई बच्चों की साँसों में
अपना समय घोल देता है।

कोई रिश्तों की डोर
कसकर थामे रहता है,
तो कोई
पिता की पगड़ी।

कोई धर्म बचाता है,
कोई संस्कार।

हर कंधा
एक भारी गठरी ढोता है,
जिसे उतारने की अनुमति
उसे नहीं होती।

शायद इसलिए,
कि उतारने से पहले
उठाना सिखाया गया था।

कोई जागता है,
पर पूरा नहीं।

कोई चलता है,
पर पाँव अपने नहीं लगते।

और कोई
अपनी ही देह में
पराए मन पाले बैठा है।

वह निषेध
मिटाया नहीं गया,
काट दिया गया।

और 
कटे हुए स्थान पर
कोई खालीपन नहीं,
एक खुरदुरा किनारा रह गया।

वहीं
अर्थ बार-बार ठिठकता है,
रुक-रुक कर गिरता है।

और सच
वह बस उतना ही होता है,
जितना
किसी दूसरे की पीड़ा को
छूते हुए
उँगलियों में
थोड़ी देर ठहर जाए
उससे आगे नहीं।

यहाँ
अकेलापन भी
पूरा नहीं खुलता।

वह लड़खड़ाता हुआ आता है,
कुछ अपने पास रखता है,
कुछ अँधेरे में छोड़ देता है
शायद इसलिए
कि अँधेरा भी
किसी का अपना होता है।

पर मैं
शायद बहुत सौभाग्यशाली हूँ।

मेरे हिस्से
कुछ भी नहीं आया
न धर्म,
न समाज,
न घर,
न रिश्ता,
न परंपरा।

मुझे सिर्फ़
ख़ुद को बचाना था।


बुधवार, जनवरी 21

मौन का पड़ाव



मौन का पड़ाव / अनीता सैनी
…….
उसकी
शिथिल पड़ती जुबान…

पर तुम उस एकांत को
छू नहीं सकते
जहाँ देह नहीं,
भाव
आख़िरी साँस भरते हैं।

वहाँ
शब्द नहीं,
केवल भावों की
अथाह गहराइयाँ हैं,
जिन्हें
कहा नहीं,
बल्कि
जिया जाता है।

स्त्रियों की
डायरियाँ
कभी लिखी नहीं जातीं,
वे
खुलती हैं
नितांत एकांत में।

वहाँ
कल्पना ही नहीं,
स्मृति भी
चुप हो जाती है
क्योंकि
कुछ सच
इतने पूरे होते हैं
कि
उन्हें सँवारना
अपमान जैसा लगता है।

वे
आवाज़ नहीं माँगतीं,
मौन में
खुद को
सुरक्षित रख देती हैं।

उन पन्नों पर
आँसू नहीं,
सिर्फ अस्तित्व
धीरे-धीरे उतरता है।

अगर तुम वहाँ
सहानुभूति लेकर आए, तो
लौट जाओगे,
लेकिन अगर तुम
स्वयं को
उतारकर पढ़ोगे,
तो वहीं,
उस मौन में
ठहर जाओगे।



रविवार, जनवरी 4

उस ओर


उस ओर 

✍️ अनीता सैनी

……

अगर तुम 
ले जा सकते हो,
तो
ले चलो 
उस शोर के पार
जहाँ दुनिया
अपने जूतों की आवाज़
दरवाज़े पर उतार देती है,
और पत्तों की ओट से
धूप
धीरे-धीरे
मन को छू जाती है।

ले चलो 
उस ऊँचाई पर
जहाँ स्त्री
एक प्रश्न नहीं,
एक उत्तर लगती है।
उन रास्तों पर ले चलो 
जहाँ हर सरसराहट
कोई कथा नहीं रचती है,
केवल
एक स्वीकार बनकर
मन में उतर जाती है।

ले चलो 
वहाँ
जहाँ पहली बारिश
धरती को
उसके नाम से पुकारती है,
और मिट्टी
अपनी स्मृति में
सुगंध भर लेती है,
जहाँ आशा
हल की मूठ थामे
फिर से खड़ी हो जाती है।

ले चलो 
उस साँझ के द्वार जो देहरी पर
थकान रखवा देती है,
जहाँ स्पर्श ही भाषा है,
 शब्द
थककर चुप हो जाएँ
और चुप्पी
सबकी साझा भाषा बन जाए।

गुरुवार, जनवरी 1

आत्मा का दर्द


आत्मा का दर्द / 
✍️ अनीता सैनी
…..

मैं
दिन और रात
दोनों करवटों का साक्षी हूँ।

नींद
मेरे भीतर
रास्ता खोजती है,
पर
दर्द
हर दरवाज़े पर
जागता मिलता है।

तभी
अंदर की सबसे गहरी परत में,
बिछा
और वहीं
सबसे ज़्यादा जागता हूँ।

अँधेरे की दरारों में छिपा,
हर साँस के साथ
पहर गिनता
देह के भीतर
एक और मौन
रख देता हूँ।

मेरे न सोने से
चुप्पी जन्म लेती है—
रक्त में घुलती है
धीरे, बहुत धीरे,
जैसे
कोई रंग
जिसे किसी ने देख तो लिया
पर नाम नहीं दिया।

आह!
थकान देह तक आते-आते
मुड़ जाती है।
नींद
मुझे
पहचानने से
इन्कार कर देती है
और
रक्त में
जो मीठा था,
धीरे-धीरे
उतर जाता है।