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गुरुवार, जनवरी 1

आत्मा का दर्द


आत्मा का दर्द / 
✍️ अनीता सैनी
…..

मैं
दिन और रात
दोनों करवटों का साक्षी हूँ।

नींद
मेरे भीतर
रास्ता खोजती है,
पर
दर्द
हर दरवाज़े पर
जागता मिलता है।

तभी
अंदर की सबसे गहरी परत में,
बिछा
और वहीं
सबसे ज़्यादा जागता हूँ।

अँधेरे की दरारों में छिपा,
हर साँस के साथ
पहर गिनता
देह के भीतर
एक और मौन
रख देता हूँ।

मेरे न सोने से
चुप्पी जन्म लेती है—
रक्त में घुलती है
धीरे, बहुत धीरे,
जैसे
कोई रंग
जिसे किसी ने देख तो लिया
पर नाम नहीं दिया।

आह!
थकान देह तक आते-आते
मुड़ जाती है।
नींद
मुझे
पहचानने से
इन्कार कर देती है
और
रक्त में
जो मीठा था,
धीरे-धीरे
उतर जाता है।



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