समर्थक/Followers

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

सायली छंद




सभ्यता
मायूस हुई
दहलीज पर बैठी
तोड़  रही
 दम ।


परिवार
बिखर  रहें
फ़ैला  अकेला  पन
बेचैन  मनुष्य
सिमटा ।


बेखबर
बिलखता  इंसान
इंसानियत  खो  रहा
बन  बैठा
हैवान  ।


ख्वाब
दिल  के
आँखों  में  सँजोयें
काजल  से
छुपायें ।


शब्दों
में   संजोई
बिखर  रही  जिंदगी
फिर  एक
हुई।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आदरणीय/आदरणीया, स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद,