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बुधवार, 12 सितंबर 2018

तलब मन्जिल की



सीने  में  सिसक रही,
सिद्दत उसे पाने  की,
कदम लङखङा रहें,
चाहत रही  गले लगाने  की,
होसले  कब  डगमगाये  ?
रफ्तार रहीं,
आसमा  को  छूने  की।

न मंजिल के निशां होते,
न  कदमों में मुकाम होता,
गर  राहों में कांटे न होते,
न  मिलती तपती धूप,
न कदमों को गति मिलती,
न मंजिल की तलब होती।

गर मिल जाती सूकू  की छाँव,
बहता शीतल जल,
मिल जाती सफ़र में नाँव,
न होती यह महफ़िल,
न थिरकते  यह पाँव।

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