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शनिवार, 10 अगस्त 2019

क़ुबूल नहीं मोहब्बत में शर्त




मनमाँगी मुराद पर मनाया  मन को मैंने,
जीवन के हर पड़ाव पर,
पतझड़ के पहलू में बैठ, 
बहार के  इंतज़ार  में  बहलाया मन को मैंने |

परखते हैं लोग पग-पग पर, 
यही दस्तूर है ज़माने का आज, 
इसी दस्तूर को  पावन कह,
 प्रेम का मरहम, लगाया मन को मैंने |

क़ुबूल  नहीं मोहब्बत में शर्त, 
इसी शर्त पर समझाया मन को मैंने ,
मोहब्बत को महक  कह,
मायूसी को महका, गुमराह किया मन को मैंने |

ज़ख़्म जिगर  पर जड़े  बेइंतिहा,
हर ज़ख़्म   को सहलाया मैंने,
महफ़िल सजा सरगम  की, 
प्रीत के नग़्मे  कह,
 ख़ामोशी से सुलाया  मन को मैंने |

वक़्त का बदलता चेहरा ,
गुज़रते  लम्हात  को  दिखा,
 जज़्बात  के जमावड़े को ज़िंदगी से,
जादूगर कह,
 फिर   मिलाया   मन को  मैंने |

- अनीता सैनी 

22 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 10/08/2019 की बुलेटिन, "मुद्रा स्फीति के बढ़ते रुझानों - दाल, चावल, दही, और सलाद “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. अप्रतिम सृजन अनु ! हृदयस्पर्शी सृजन ।

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  3. "मोहब्बत को महक कह,
    मायूसी को महका, गुमराह किया मन को मैंने"
    वाह! क्या बात कही है!

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  4. परखते हैं लोग पग-पग पर,
    यही दस्तूर है ज़माने का आज,
    इसी दस्तूर को पावन कह,
    प्रेम का मरहम, लगाया मन को मैंने |बहुत सुंदर अभिव्यक्ति प्रिय अनिता जी

    जवाब देंहटाएं
  5. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
    १२ अगस्त २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  6. ऐसे ही बहलाते बहलाते मन समझ जायेगा समर्पण की राह पर चल पड़ेगा..

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  7. मुहब्बत की महक के सामने मन को सम्हाना आसान कहाँ होता है ...
    बहुत भावपूर्ण ...

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  8. ज़ख़्म जिगर पर जड़े बेइंतिहा,
    हर ज़ख़्म को सहलाया मैंने,
    महफ़िल सजा संगम की,
    प्रीत के नग़्मे कह,
    ख़ामोशी से सुलाया मन को मैंने |
    बहुत ही भावपूर्ण लाजवाब सृजन...

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    उत्तर
    1. तहे दिल से आभार दी |आप की समीक्षा हमेशा ही उत्साहवर्धन रही है |
      सादर स्नेह

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