मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

कुछ पल ठहर पथिक

 

 कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


  सिक्कों की खनक शोहरत की चमक छोड़ 

  मन को दे कुछ पल विश्राम  तुम 

न दौड़ बेसुध, पथ अंगारों-सा जलता है

मृगतृष्णा न जगा बेचैनी दौड़ाएगी

धीरज धर राह शीतल हो जाएगी।


कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


छँट जाएँगे बादल काल के

काला कोहरा पक्षी बन उड़ जाएगा 

देख! घटाएँ उमड़-घुमड़कर आएँगीं  

 शीतल जल बरसाएगी बरखा-रानी 

जोहड़ ताल-तलैया नहर-नदियाँ भर जाएँगीं।


 कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


घायल हैं मुरझाए हैं  उलझन में हैं सुमन 

देख! डालिया फूल पत्तों से लद जाएगी 

धरा के आँचल पर लहराएगा लहरिया 

सावन-भादों न बना नयनों को हिम्मत रख  

अंतस में नवाँकुर प्रीत के खिलजाएँगे।


कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

17 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ पल ठहर पति .....
    बेहतरीन भाव सृजन। संदेशपरक रचना। बहुत-बहुत शुभकामनाएँ आदरणीया अनीता सैनी जी। ।।।।

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  2. आपने ठीक कहा अनीता जी। निरंतर दौड़ते चले जाने से उत्तम है मध्य में कुछ पल ठहरना और अपने तन के साथ-साथ मन को भी विश्राम देना।

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  3. सावन-भादों न बना नयनों को हिम्मत रख

    अंतस में नवाँकुर प्रीत के खिलजाएगे।

    धैर्य धारण करने की प्रेरणा देता सुंदर सृजन प्रिय अनीता

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  4. जीवन की राह में कुछ पलों को रुक जाना लम्बे समय को आसानी से पार कर लेना भी है ...
    बहुत ही भावपूर्ण रचना है ...

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  5. सही लिखा है जब मन भ्रमित होकर बेबजह दौड़ता है तो कुछ पल रुक कर आगे का लक्ष्य निर्धारित करना श्रेष्ठ कर होता है।
    सुंदर सार्थक सृजन।
    आशाके दरीचे खोलता सा ।

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  6. कुछ पल ठहर पथिक



    डगर कठिन है गंतव्य दूर तेरा।

    बेहतरीन रचना सखी।

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  7. कुछ पल ठहर पथिक
    डगर कठिन है गंतव्य दूर तेरा।
    जीवन की धूप-छाँव को उकेरता सुन्दर शब्दचित्र अनीता जी!

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  8. सही कहा आपने ,थोड़ा ठहरने से मंजिल के बारे में सही सटीक वस्तु स्थिति का पता लगेगा और मंजिल आसानी से मिल जाएगी । सुंदर रचना ।

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  9. बहुत सुन्दर।
    --
    श्री राम नवमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
    --
    मित्रों पिछले तीन दिनों से मेरी तबियत ठीक नहीं है।
    खुुद को कमरे में कैद कर रखा है।

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  10. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 25-04-2021) को
    "धुआँ धुआँ सा आसमाँ क्यूँ है" (चर्चा अंक- 4047)
    पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.


    "मीना भारद्वाज"

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    1. कृपया शुक्रवार के स्थान पर रविवार पढ़े । धन्यवाद.

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  11. दिल को छूती बहुत सुंदर रचना।

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  12. छँट जाएँगे बादल काल के
    काला कोहरा पक्षी बन उड़ जाएगा
    देख! घटाएँ उमड़-घुमड़कर आएँगीं
    शीतल जल बरसाएगी बरखा-रानी
    आँधी कोहरे अँधेरे तूफानों से भरे जीवन से डर कर भागना उचित नहीं....समय हमेशा एक समान नहीं रहता..कुछ पल बाद सब बदलना है...परिवर्तन प्रकृति का नियम जो है...जीवन पथ पर चलने वाले हे मन पथिक थोड़ा ठहर ये अंधेरा छटने वाला है...और पुनः सब ठीक हो जायेगा.. विपरीत समय में मन को ढ़ाँढस बंधाती सुन्दर कृति हेतु बधाई एवं शुभकामनाएं अनीता जी!

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  13. जीवन की कठिन राह में पल दो पल का विश्राम यात्रा को सरल बना देता है, सुंदर सृजन !

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  14. कुछ पल ठहर पथिक
    डगर कठिन है गंतव्य दूर तेरा।

    Bilkul sahi farmaya hai
    Dhairya dharan karne wala vyakti Jivan Me Safal Hota Hai
    Ek behtarin Rachna aadarniy Anita ji

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  15. आस कुसुम से पल्लवित-पुष्पित अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक आभार ।

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anitasaini.poetry@gmail.com