शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

खेतीहर अब रो रहा,



जब से अपने देश में, आया पूँजीवाद।
कहर काल का पड़ गया, निर्धन है लाचार।।
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खेतीहर अब रो रहा, पसरा अत्याचार।
धनपतियों के साथ में, देश हुआ लाचार।।
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खेतीहर अब मल रहा, अपने खाली हाथ।
लाचारी को लाँघता, ढूँढे सुख का साथ।।
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चौमासे की झड़ी में, खिले चमन में फूल।
पानी-पानी सब जगह, उड़े कहाँ से धूल।।
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अपना भारत देश है, सभी तरह समृद्ध।
अब भी है परिवार के, मुखिया सारे वृद्ध।।
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होता है विज्ञान का, कुदरत से जब मेल।
सुख से सारे लोग तब, खेलें  अपना खेल।।

- अनीता सैनी 

22 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

सुन्दर और सामयिक दोहे

मन की वीणा ने कहा…

बहुत सुंदर ! सार्थक दोहे हुत शानदार सृजन।

Onkar ने कहा…

सार्थक दोहे

Unchaiyaan.blogpost.in ने कहा…

सार्थक सामयिक दोहे।

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

तहे दिल से आभार दी जी
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

शुक्रिया सर
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

शुक्रिया दी जी
सादर

शुभा ने कहा…

वाह!!,सखी ,बहुत सुंदर और सार्थक दोहे ।

Meena Bhardwaj ने कहा…

उत्कृष्ट भावों को समेटे बहुत सुन्दर दोहे ।

अनीता सैनी ने कहा…

शुक्रिया बहना
सादर स्नेह

अनीता सैनी ने कहा…

शुक्रिया प्रिय दी जी
सादर स्नेह

dr.zafar ने कहा…

वर्तमान की स्तिथि का सजीव चित्रण,
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

शुक्रिया सर
सादर

Anuradha chauhan ने कहा…

बहुत सुंदर और सार्थक दोहे सखी

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार प्रिय सखी
सादर

विश्वमोहन ने कहा…

बहुत बढ़िया और प्रासंगिक।

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय
प्रणाम
सादर

Sudha devrani ने कहा…

लाजवाब दोहे...
वाह!!!

अनीता सैनी ने कहा…

सस्नेह आभार दी जी
प्रणाम
सादर

रेणु ने कहा…

जीवन के अलग अलग रंगों को परिभाषित करते भावपूर्ण दोहे प्रिय अनीता, जो तुम्हारे लेखन की विशिष्ठ पहचान हैं । हार्दिक बधाई ।

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया दी जी
सादर स्नेह