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गुरुवार, जुलाई 15

पगलां माही कांकर चुभया 



 पगलां माही कांकर चुभया 

 जूती बांध्य बैर पीया।

 छागळ पाणी छळके आपे 

थकया सांध्य पैर पीया।।


कुआँ जोहड़ा ताळ-तळेया

बावड़ थारी जोव बाट

बाड़ करेला पीळा पड़ ग्यो 

 सून डागळ ढ़ाळी खाट

मिश्री बरगी  बातां थारी 

नींद  होई गैर पीया।।


धरती सीने डाबड़ धँसती 

 खिल्य कुंचा कोरा फूळ 

मृगतृष्णा मंथ मरु धरा री

खेळ घणेरो खेल्य धूळ 

डूह ऊपर झूंड झूलस्या

थान्ह पुकार कैर पीया।।


 रात सुहाणी शीतळ माटी 

ठौर ढूंढ़ रया बरखाण 

दूज चाँद सो सोवे मुखड़ो

आभ तारक सो अभिमाण 

छाँव प्रीत री बणी खेजड़ी 

चाल्य पथ पर लैर पीया।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति '

रविवार, जुलाई 11

शब्द


 घनिष्ठ तारतम्यता ही कहेंगे 

अशोक के पेड़ का सहचर होना 

 कोयल गौरेया का ढेरों शब्द चोंच में दबाकर लाना 

मीठे स्वर में प्रतिदिन सुबह आस-पास फैलाना 

मन की प्रवृत्ति ही है कि वह 

रखता है शब्दों का लेखा-जोखा

शब्दों का संचय प्रेम को प्राप्त करने जैसा ही है

मौन, मौन ही मौन,मौन में मुखर हुए शब्द

तब तक ही शब्द रहते हैं जब तक कि 

एहसास शून्य से संश्लिष्ट हो नहीं गढ़ता एक चेहरा 

चेहरा बनते ही चिपक जाता है हृदय की भित्ति से 

साँसें छलनी बन छनतीं हैं 

स्वयं के गढ़े सुविधा में पगे विचारों को 

विचारों का तेज शब्दों से छवि गढ़ता है

छवि के प्रति पनपती है प्रीत ज्यों मीरा की। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, जुलाई 9

रुठ्या सावण भादो


बदळी गरजी मेह न बरसो 

घाम घूमतो फिरे गळी  

तेज़ ताप-स्यूँ तपती काया 

जिवड़ो जोवे छाँव भळी।।


रीत प्रीत रा झूलस्या पग

आभे ज्वाला बरस रही 

बेला बूटा बाजर सुख्या

मूँग-मोठ ने चैन नही 

पावस बाट जोवता हलधर

कठ रुठ्यो तू इंद्र बळी।।


तारा ढळती रात सोवणी 

मरु धरा री धधके गोद 

सूनी खाटा उड़ती माट्टी 

पाखी पाणी खोज्य होद 

ताल-तलैया रित्या पोखर

नीर वाहिनी रूठ चळी।।


हूँक हुँकारे पपयो पी की 

कोयल मीठा बोल्य बोळ 

नाचे पंख पसार मोरनी

सावण भादु है अणमोळ 

बादळ  बदळे वेश घणेरा

सब के मन में आस पळी।।


@अनीता सैनी  'दीप्ति'

सोमवार, जुलाई 5

संघर्ष





 अमृत कलश से छलकती 

अमृत्व के लिबास में लिपटी 

किसी की धड़कन तो किसी की

सांसें बन जीवन में डोलती 

 धरा के नयनों से उतर 

 कपोलों से लुढ़ककर बोलती 

मिट्टी के कण-कण को बींधती

जिजीविषा की कहानी गढ़ती

साँवली सूरत सन्नाटा ओढ़े

थकती न हारती मंद-मंद मुस्कुराती

चराचर के बीचोबीच पालथी मार बैठी 

ऐसे ही एक संघर्ष की बूँद को

 मैंने अमृतपान करते देखा।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, जुलाई 2

वाकपटु


  [ वाकपटु ]

 बार-बार वर्दी क्यों छिपाती है, माँ ?

मेरे पहनने पर प्रतिबंध 

 इतना क्यों घबराती है, माँ ?

मोह में बँधी है इसलिए या 

किनारा अकेलेपन से करती है, माँ ?


ऊहापोह में उलझी, है उदास

कुछ कहती नहीं क्यों है ख़ामोश

विचारों की साँकल से जड़ी ज़बान 

 कल्पना के पँख पर सवार इच्छाएँ 

क्यों उड़न भरने से रोकतीं हैं, माँ ? 


खुला आसमां पर्वत की छाँव

प्रकृति संग,

 साथ पंछियों का भाता बहुत 

चाँद-सितारों से मिलकर बतियाना 

 बड़े होते अंगजात देख 

क्यों अधीर हो जाती है,  माँ ?


प्रीत के लबादे में लिपटी 

वर्दी खूँटी पर टंगी बुलाती है

 सितारे कतारबद्ध जड़े हों कंधे पर

 ऐसे विचार पर विचारकर

वाकपटु कह 

 क्यों उद्विग्न हो जाती है, माँ ?


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, जून 19

भँवरजाल


रीत-प्रीत रा उलझ्या धागा

लिपट्या मन के चारु मेर

लाज-शर्म पीढ़े पर बैठी 

झाँझर-झूमर बाँधे बेर ।।


जेठ दुपहरी ओढ़ आँधी 

बदरी भरके लाव नीर 

 माया नगरी राचे भूरो

छाजा नीचे लिखे पीर 

आतो-जातो शूल बिंधतो 

मरु तपे विधना रो फेर।।


टिब्बे ओट में सूरज छिपियो

साँझ करती पाटा राज

ढलती छाया धरा गोद में

अंबर लाली ढोंव काज

पोखर ऊपर नन्हा चुज्जा

पाखी झूम लगाव टेर।।


एक डोर बंध्यो है जिवड़ो

सांस सींचता दिवस ढलो

पूर्णिमा रा पहर पावणा

शरद चाँदनी साथ भलो

तारा रांची रात सोवणी

उगे सूर उजालो लेर।।


@अनिता सैनी 'दीप्ति' 

मंगलवार, जून 15

घुट्टी



उतावलेपन में डूबी इच्छाएँ
दौड़ती हैं
बेसब्री-सी भूख की तरह
 प्रसिद्धि के लिबास में
आत्मीयता की ख़ुशबू में सनी 
पिलाने मर्म-स्पर्शिनी
उफनते क्षणिक विचारों की
घोंटी हुई पारदर्शी घुट्टी
और तुम हो कि
निर्बोध बालक की तरह
भीगे कपासी फाहे को
होठों में दबाए
तत्पर ही रहते हो पीने को
अवचेतन में अनुरक्त हैं 
विवेक और बुद्धि 
चिलचिलाती धूप का अंगवस्त्र 
कंधों पर रहता है तुम्हारे
फिर भी 
नहीं खुलती आँखें तुम्हारी
भविष्य की पलकों के भार से
अनजान हो तुम
उस अँकुरित बीज की तरह
जिसका छिलका अभी भी
रक्षा हेतु उसके शीश पर है
वैसे ही हो तुम
कोमल बहुत ही कोमल
नवजात शिशु की तरह
तभी तुम्हें प्रतिदिन पिलाते हैं
भ्रमिक विचारों की घोंटी हुई घुट्टी।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, जून 7

धूलभरे दिनों में



धूलभरे दिनों में
न जाने हर कोई क्यों था रुठा ?
बदहवासी में सोए स्वप्न
शून्य की गोद में समर्पित आत्मा
नींद की प्रीत ने हर किसी को था लूटा
चेतन-अवचेतन के हिंडोले पर
मनायमान मुखर हो झूलता जीवन
मिट्टी की काया मिट्टी को अर्पित
पानी की बूँदों को तरसती हवा
समीप ही धूसर रंगों में सना बैठा था भानु
पलकों पर रेत के कणों की परत
हल्की हँसी मूछों को देता ताव
हुक़्क़े संग धुएँ को प्रगल्भयता से गढ़ता
अंबार मेघों का सजाए एकटक निहारता
साँसें बाँट रहा था उधार।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, जून 2

मौन प्रभाती



पाखी मन व्याकुल है साथी 
खोई-खोई मौन प्रभाती।
भोर धूप की चुनरी ओढ़े 
विकल रश्मियाँ लिखती पाती।।

मसि छिटकी ज्यूँ मेघ हाथ से
पूछ रहे हैं शब्द कुशलता
नूतन कलियाँ खिले आस-सी
मीत तरु संग साथ विचरता
सुषमा ओट छिपी अवगुंठन 
गगरी भर मधु रस बरसाती।।
 
 पटल याद के सजते बूटे
 छींट प्रीत छिटकाती उजले
रंग कसूमल बिखरी सुधियाँ
पीर तूलिका उर से फिसले
स्वप्न नयन में नित-नित भरती
रात  चाँद की जलती बाती।।

शीतल झोंका ले पुरवाई
उलझे-उलझे से भाव खड़े
कुसुम पात सजते मन मुक्ता 
भावों के गहने रतन जड़े 
भीगी पलकें पथ निहारे 
अँजुरी तारों से भर जाती।।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'