पगलां माही कांकर चुभया
जूती बांध्य बैर पीया।
छागळ पाणी छळके आपे
थकया सांध्य पैर पीया।।
कुआँ जोहड़ा ताळ-तळेया
बावड़ थारी जोव बाट
बाड़ करेला पीळा पड़ ग्यो
सून डागळ ढ़ाळी खाट
मिश्री बरगी बातां थारी
नींद होई गैर पीया।।
धरती सीने डाबड़ धँसती
खिल्य कुंचा कोरा फूळ
मृगतृष्णा मंथ मरु धरा री
खेळ घणेरो खेल्य धूळ
डूह ऊपर झूंड झूलस्या
थान्ह पुकार कैर पीया।।
रात सुहाणी शीतळ माटी
ठौर ढूंढ़ रया बरखाण
दूज चाँद सो सोवे मुखड़ो
आभ तारक सो अभिमाण
छाँव प्रीत री बणी खेजड़ी
चाल्य पथ पर लैर पीया।।
@अनीता सैनी 'दीप्ति '